- Home
- /
- राज्य
- /
- उत्तर प्रदेश
- /
- दिवाली पर उल्लुओं की...

x
सहारनपुर: दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही उल्लुओं की सुरक्षा को लेकर वन विभाग सतर्क हो गया है। अंधविश्वास और कथित तांत्रिक अनुष्ठानों के नाम पर उल्लुओं का अवैध शिकार किए जाने की आशंका को देखते हुए जंगलों में निगरानी बढ़ाई जा रही है। वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत उल्लुओं का अवैध शिकार, पकड़ना और व्यापार करना दंडनीय अपराध है। दोषियों को जुर्माने के साथ जेल की सजा भी हो सकती है। सहारनपुर समेत विभिन्न वन क्षेत्रों में वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर विशेष सतर्कता बरती जा रही है।
हिंदू धार्मिक मान्यताओं में उल्लू को माता लक्ष्मी का वाहन माना जाता है। कुछ क्षेत्रों में अंधविश्वास के कारण दीपावली और अमावस्या की रात उल्लुओं को तांत्रिक गतिविधियों से जोड़ दिया जाता है। इसी वजह से त्योहार के आसपास इन पक्षियों को पकड़ने और उनकी तस्करी का खतरा बढ़ जाता है।
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े अधिकारियों और विशेषज्ञों का कहना है कि उल्लुओं के शिकार को लेकर फैली ऐसी मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसके बावजूद कुछ लोग धन प्राप्ति या कथित तांत्रिक सिद्धियों के लालच में इन पक्षियों को नुकसान पहुंचाते हैं। दीपावली से पहले वन विभाग की प्राथमिकता ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाना है। जंगलों और संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ाने के साथ संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने की आवश्यकता जताई गई है।
उत्तर प्रदेश के कई वन क्षेत्रों में उल्लुओं की सुरक्षा को लेकर विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। पीलीभीत टाइगर रिजर्व में भी दीपावली से पहले उल्लुओं के अवैध शिकार की आशंका को देखते हुए सतर्कता बढ़ाई गई है। वहीं महाराजगंज के सोहगीबरवा वन्यजीव प्रभाग में वनकर्मियों ने रात्रि गश्त तेज कर दी है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, उल्लू पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये चूहों और अन्य छोटे जीवों की आबादी नियंत्रित करने में सहायता करते हैं। विशेष रूप से कृषि क्षेत्रों में चूहों की संख्या सीमित रखने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
उल्लुओं की संख्या घटने से पर्यावरण का प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसलिए इन पक्षियों का संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी भी है। भारत में उल्लुओं की विभिन्न प्रजातियों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत कानूनी सुरक्षा प्राप्त है। संरक्षित प्रजातियों का अवैध शिकार करने पर अपराध की श्रेणी और संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुसार जुर्माना तथा कारावास की सजा हो सकती है।
अधिनियम की अनुसूची-एक से संबंधित गंभीर अपराधों में न्यूनतम तीन वर्ष से लेकर सात वर्ष तक कारावास और निर्धारित जुर्माने का प्रावधान है। हालांकि, वास्तविक दंड संबंधित प्रजाति और अपराध की प्रकृति पर निर्भर करता है। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों ने नागरिकों से अपील की है कि यदि किसी क्षेत्र में उल्लुओं को अवैध तरीके से पकड़ने, बेचने या उनका शिकार करने की जानकारी मिले तो तत्काल वन विभाग को सूचित करें।
दीपावली खुशियों और प्रकाश का पर्व है। ऐसे में अंधविश्वास के कारण किसी बेजुबान जीव की जान लेना न केवल गैरकानूनी है, बल्कि प्रकृति और पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक है। वन विभाग की बढ़ी सतर्कता से त्योहार के दौरान उल्लुओं और अन्य वन्यजीवों के अवैध शिकार पर रोक लगाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
Next Story





