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अफसरों के बंगले चमकदार, कर्मचारियों के जर्जर आवास बने खतरा

शाहजहांपुर। शहर की ऑफिसर कॉलोनी में अधिकारियों के लिए बने भव्य बंगलों की हर साल मरम्मत और रखरखाव पर बड़ी रकम खर्च की जाती है, लेकिन इन्हीं अधिकारियों के अधीन काम करने वाले कर्मचारियों के सरकारी आवासों की हालत लगातार खराब होती जा रही है। कई भवन जर्जर हो चुके हैं और बारिश के मौसम में कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। इसके बावजूद संबंधित विभागों की ओर से इन भवनों की मरम्मत या सुरक्षा को लेकर गंभीरता दिखाई नहीं दे रही है।
तेज बारिश के दौरान शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में कई पुराने तथा कमजोर मकान गिर चुके हैं। ऐसे में सरकारी कर्मचारियों के रहने के लिए बनाए गए जर्जर आवासों की स्थिति भी चिंता बढ़ा रही है। कई स्थानों पर दीवारों में दरारें पड़ चुकी हैं, छतें कमजोर हो गई हैं और प्लास्टर टूटकर गिर रहा है। कुछ भवनों की दीवारों में पेड़ तक उग आए हैं, जिससे उनकी मजबूती पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
कलक्ट्रेट के निकट स्थित शिक्षक कॉलोनी की हालत लंबे समय से खराब बताई जा रही है। यहां कई मकानों की दीवारों और छतों पर घास और छोटे पेड़ उग आए हैं। नमी और बरसात के कारण दीवारें लगातार कमजोर हो रही हैं। कुछ स्थानों पर प्लास्टर पूरी तरह झड़ चुका है और ईंटें बाहर दिखाई देने लगी हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बरसात के दौरान ऐसे भवनों में रहना जोखिम से खाली नहीं है। रात के समय यदि कोई हिस्सा अचानक गिर जाए तो बड़ा हादसा हो सकता है। इसके बावजूद भवनों की मरम्मत के लिए अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
शिक्षक कॉलोनी के साथ ही सदर थाने की दीवार की स्थिति भी खराब बताई जा रही है। दीवार कई स्थानों से कमजोर हो चुकी है और गिरने की आशंका बनी हुई है। लगातार बारिश और नमी से स्थिति और गंभीर हो गई है। यदि समय रहते इसकी मरम्मत नहीं कराई गई तो राहगीरों या आसपास मौजूद लोगों के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
सरकारी भवनों की हालत को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इनके रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी है। नगर निगम, विकास प्राधिकरण और संबंधित विभागों के बीच जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं होने से कई भवन वर्षों तक बिना मरम्मत के पड़े रहते हैं।
अधिकारियों के बंगलों में समय-समय पर रंगाई-पुताई, बिजली, पानी और अन्य व्यवस्थाओं पर खर्च किया जाता है। वहीं कर्मचारियों के सरकारी आवासों में कई मूलभूत सुविधाएं तक खराब हालत में हैं। इससे कर्मचारियों में भी नाराजगी बढ़ रही है।
कई कर्मचारियों का कहना है कि वे जर्जर मकानों में परिवार के साथ रहने को मजबूर हैं। बारिश के दौरान छत से पानी टपकता है और दीवारों में सीलन बढ़ जाती है। कुछ भवनों में बिजली की वायरिंग भी पुरानी हो चुकी है, जिससे शॉर्ट सर्किट का खतरा बना रहता है।
सरकारी कॉलोनियों में रहने वाले परिवारों की सबसे बड़ी चिंता बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर है। कमजोर दीवारों और छतों के कारण हर समय किसी दुर्घटना का डर बना रहता है।
बारिश के मौसम में खतरा और बढ़ जाता है। लगातार पानी पड़ने से पुराने भवनों की नींव और दीवारें कमजोर होती जाती हैं। यदि पहले से दरारें मौजूद हों तो उनके गिरने की संभावना भी बढ़ जाती है।
शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में हाल के दिनों में कई जर्जर मकानों के गिरने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इसके बावजूद सरकारी भवनों की स्थिति की समीक्षा के लिए कोई व्यापक अभियान दिखाई नहीं दे रहा है।
जरूरत इस बात की है कि सभी सरकारी कॉलोनियों और पुराने कार्यालय भवनों का तकनीकी निरीक्षण कराया जाए। जिन भवनों को तत्काल मरम्मत की जरूरत है, उनकी सूची बनाकर काम शुरू किया जाना चाहिए।
जो भवन रहने योग्य नहीं हैं, उन्हें खाली कराकर वहां रहने वाले कर्मचारियों और परिवारों को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट किया जाना चाहिए। केवल चेतावनी बोर्ड लगाकर जिम्मेदारी पूरी नहीं की जा सकती।
शिक्षक कॉलोनी में दीवारों पर उगे पेड़ इस बात का संकेत हैं कि लंबे समय से भवनों की देखरेख नहीं हुई है। पेड़ों की जड़ें दीवारों के अंदर तक फैलने से संरचना कमजोर हो सकती है।
इसी तरह सदर थाने की कमजोर दीवार भी गंभीर खतरा बनी हुई है। थाने में रोज बड़ी संख्या में लोग आते-जाते हैं। ऐसे में दीवार गिरने की स्थिति में बड़ा हादसा हो सकता है।
कर्मचारियों का कहना है कि कई बार संबंधित विभागों को मरम्मत के लिए जानकारी दी गई, लेकिन स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ। छोटे-मोटे काम जरूर किए जाते हैं, मगर भवनों की मूल समस्या जस की तस बनी रहती है।
पुराने सरकारी भवनों की नियमित जांच की व्यवस्था होनी चाहिए। बारिश से पहले विशेष अभियान चलाकर छत, दीवार, बिजली और जल निकासी व्यवस्था की जांच की जा सकती है।
सरकारी आवासों के रखरखाव पर बजट भी निर्धारित होता है। सवाल यह है कि यह बजट किन कामों पर खर्च हो रहा है और जर्जर भवनों तक इसका लाभ क्यों नहीं पहुंच पा रहा है।
अधिकारियों के बंगलों और कर्मचारियों के आवासों के बीच रखरखाव के स्तर में बड़ा अंतर भी सवालों के घेरे में है। यदि अधिकारियों के आवासों की नियमित मरम्मत हो सकती है तो कर्मचारियों के घरों की अनदेखी क्यों की जा रही है।
कर्मचारी संगठनों की ओर से भी इस मुद्दे को उठाए जाने की जरूरत है। यदि समय रहते मरम्मत नहीं हुई तो किसी हादसे के बाद जिम्मेदारी तय करना मुश्किल होगा।
शहर में कई सरकारी कॉलोनियां दशकों पुरानी हैं। इन भवनों की उम्र पूरी हो चुकी है और केवल सामान्य मरम्मत से काम नहीं चल सकता। कई भवनों का संरचनात्मक परीक्षण जरूरी है।
विशेषज्ञों से जांच कराने के बाद तय किया जाना चाहिए कि किन भवनों को मरम्मत से सुरक्षित बनाया जा सकता है और किन्हें तोड़कर नया निर्माण करना होगा।
फिलहाल स्थिति यह है कि अधिकारी आधुनिक सुविधाओं वाले बंगलों में रह रहे हैं, जबकि कई कर्मचारी जर्जर सरकारी आवासों में परिवार के साथ रहने को मजबूर हैं।
बारिश के मौसम में यह समस्या और गंभीर हो गई है। शिक्षक कॉलोनी की दीवारों में उगे पेड़ और सदर थाने की गिरने की कगार पर पहुंची दीवार प्रशासनिक लापरवाही की तस्वीर दिखा रही है।
यदि समय रहते इन भवनों की मरम्मत और सुरक्षा व्यवस्था नहीं की गई तो किसी भी दिन बड़ा हादसा हो सकता है। अब जरूरत है कि संबंधित विभाग जिम्मेदारी तय कर तत्काल जर्जर भवनों का सर्वे और मरम्मत शुरू करें।





