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Uttar Pradesh उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मिनिस्ट्री 2.0 में हाल ही में हुए कैबिनेट विस्तार को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। रविवार को मंत्री पद की शपथ लेने वाले छह भाजपा नेताओं में तीन OBC और दो दलित समुदाय से हैं, जबकि एक मंत्री ब्राह्मण समुदाय से शामिल किया गया है।
इस कैबिनेट विस्तार को राजनीतिक जानकार आगामी वर्ष होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं। माना जा रहा है कि यह कदम भाजपा की ओर से समाजवादी पार्टी के “PDA” (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) समीकरण को प्रभावित करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। समाजवादी पार्टी राज्य की राजनीति में PDA को अपने सामाजिक आधार के रूप में पेश करती रही है।
विस्तार के तहत जिन नेताओं को मंत्री पद की जिम्मेदारी मिली है, उनमें OBC वर्ग से भूपेंद्र चौधरी (जाट), कैलाश राजपूत (लोध) और हंसराज विश्वकर्मा (लोहार) शामिल हैं। वहीं दलित समुदाय से कृष्ण पासवान (पासी) और सुरेंद्र सिंह दलेर (वाल्मीकि) को मंत्री बनाया गया है। इसके अलावा छठे मंत्री के रूप में मनोज कुमार पांडे, जो ब्राह्मण समुदाय से आते हैं, को शामिल किया गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस कैबिनेट विस्तार के जरिए भाजपा ने सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की है, खासकर गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित मतदाताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दोनों समूहों की चुनावी भूमिका काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य में विभिन्न जातीय समूहों को प्रतिनिधित्व देना लंबे समय से राजनीतिक दलों की रणनीति का हिस्सा रहा है, लेकिन आगामी चुनावों के मद्देनजर इसे और अधिक महत्व दिया जा रहा है। भाजपा इस कदम के जरिए ग्रामीण और पिछड़े वर्गों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
वहीं विपक्षी दलों का आरोप है कि यह केवल चुनावी रणनीति है, जबकि सरकार का कहना है कि यह निर्णय सामाजिक संतुलन और सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की नीति के तहत लिया गया है।
इस कैबिनेट विस्तार के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरणों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह राजनीतिक रणनीति चुनावी नतीजों को किस हद तक प्रभावित करती है।





