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उत्तर प्रदेश
ध्वस्तीकरण विवाद में नया मोड़ याकूब खां के परपोते फिरोज खां ने दिया बयान
Ratna Netam
6 Sept 2026 9:27 PM IST

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सहारनपुर। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित पुरानी मस्जिद को ध्वस्त किए जाने के बाद जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद और तेज हो गया है। अब **याकूब खां के परपोते फिरोज खां** ने पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए दावा किया है कि उनके बुजुर्गों ने यह जमीन मस्जिद के लिए दी थी। उन्होंने कहा कि परिवार ने इतने वर्षों में कभी इस जमीन पर अपना हक नहीं जताया, लेकिन जमीन और मस्जिद से जुड़े पुराने दस्तावेज उनके पास मौजूद हैं।
यह मामला अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा है। मस्जिद प्रबंधन की ओर से कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं, जबकि प्रशासन का कहना है कि सरकारी जमीन पर अनधिकृत कब्जे के मामले में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद कार्रवाई की गई।
फिरोज खां ने क्या कहा?
मस्जिद ध्वस्तीकरण के बाद याकूब खां के परपोते फिरोज खां ने परिवार का पक्ष सामने रखा। उनका कहना है कि जिस जमीन पर मस्जिद बनी थी, वह उनके पूर्वजों से जुड़ी थी और परिवार ने धार्मिक उद्देश्य के लिए जमीन दी थी। परिवार का दावा है कि उसके पास इससे संबंधित पुराने दस्तावेज भी मौजूद हैं।
फिरोज खां के मुताबिक, उनके परिवार ने इतने लंबे समय में कभी मस्जिद की जमीन पर व्यक्तिगत मालिकाना हक जताने या उसे वापस लेने की कोशिश नहीं की। उनका कहना है कि जमीन धार्मिक उपयोग के लिए दिए जाने के बाद परिवार ने उसे उसी रूप में देखा।
यही वजह है कि ध्वस्तीकरण के बाद अब परिवार खुलकर अपना पक्ष सामने रख रहा है।
याकूब खां और वहीद खां के नाम का दावा
मस्जिद की जमीन को लेकर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद भी दावा कर चुके हैं कि पुराने दस्तावेजों में जमीन की मिल्कियत **वहीद खां और याकूब खां** के नाम दर्ज होने के प्रमाण मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि सुनवाई के दौरान इससे संबंधित दस्तावेज भी पेश किए गए थे।
हालांकि प्रशासन और अदालत के सामने मामला अलग आधार पर चला। प्रशासन का पक्ष रहा कि कलेक्ट्रेट परिसर की संबंधित भूमि सरकारी है और मस्जिद का निर्माण अधिकृत नहीं था।
इस तरह एक तरफ परिवार और मस्जिद प्रबंधन पुराने दस्तावेजों के आधार पर अपना दावा रख रहे हैं, तो दूसरी तरफ प्रशासन सरकारी रिकॉर्ड और सार्वजनिक परिसर कानून के तहत हुई कार्रवाई का हवाला दे रहा है।
5 सितंबर को चला बुलडोजर
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को **5 सितंबर 2026** की सुबह प्रशासन ने ध्वस्त कर दिया था। कार्रवाई के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। कलेक्ट्रेट के प्रवेश द्वार बंद किए गए और बड़ी संख्या में पुलिस तथा सुरक्षा बलों को तैनात किया गया।
प्रशासन ने कहा कि अदालत के आदेशों के क्रम में कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद यह कदम उठाया गया।
मस्जिद पक्ष ने हालांकि कार्रवाई की प्रक्रिया और समय को लेकर सवाल उठाए हैं।
जनवरी 2025 से शुरू हुआ था विवाद
इस मस्जिद को लेकर कानूनी विवाद अचानक शुरू नहीं हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 2025 में मस्जिद के खिलाफ शिकायत सामने आई। इसके बाद मार्च 2025 में उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर कानून के तहत मामला सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में पहुंचा।
सिटी मजिस्ट्रेट ने **16 जुलाई 2026** को आदेश पारित करते हुए संबंधित कब्जे को अनधिकृत माना। इसके साथ बेदखली और **6.41 करोड़ रुपये से अधिक की क्षतिपूर्ति** का आदेश भी दिया गया।
जिला अदालत में पहुंचा था मस्जिद पक्ष
सिटी मजिस्ट्रेट के फैसले के खिलाफ मस्जिद प्रबंधन ने 20 जुलाई को जिला अदालत में अपील की। शुरुआती चरण में निचली अदालत के आदेश पर रोक लगी और मामले की सुनवाई आगे बढ़ी।
इसके बाद कई तारीखों पर सुनवाई हुई। **2 सितंबर 2026** को जिला अदालत ने अपील खारिज करते हुए सिटी मजिस्ट्रेट के निष्कर्ष को बरकरार रखा। इसके तीन दिन बाद प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी विवाद भी है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 2 सितंबर के जिला अदालत के आदेश में सीधे तौर पर नया ध्वस्तीकरण आदेश नहीं दिया गया था; उसने पहले के आदेश के खिलाफ अपील खारिज की थी। मस्जिद प्रबंधन इसी आधार पर प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है।
‘30 दिन का समय बाकी था’ का दावा
मस्जिद पक्ष और कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का आरोप है कि बेदखली से जुड़ी समयसीमा पूरी होने से पहले ही कार्रवाई कर दी गई। इमरान मसूद ने दावा किया कि संबंधित आदेश में 30 दिन का समय था और उस अवधि के बीच अपील के कारण स्टे भी रहा था।
प्रशासन का पक्ष इससे अलग है। अधिकारियों का कहना है कि अदालत से अपील खारिज होने के बाद निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की गई।
ऐसे में अब कानूनी लड़ाई का प्रमुख सवाल केवल जमीन के मालिकाना हक का नहीं, बल्कि कार्रवाई की प्रक्रिया और समयसीमा का भी है।
हाईकोर्ट जाने की तैयारी
मस्जिद प्रबंधन ने संकेत दिया है कि वह ध्वस्तीकरण के खिलाफ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। मस्जिद के मुतवल्ली तनवीर अहमद ने भी कार्रवाई की प्रक्रिया पर आपत्ति जताई है।
इमरान मसूद ने भी इस मामले को हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने की बात कही है। उनका कहना है कि जमीन के मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेज अदालत के सामने रखे जाएंगे।
ध्वस्तीकरण के बाद तेज हुई राजनीति
मस्जिद गिराए जाने के बाद मामला राजनीतिक रूप भी ले चुका है। समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और AIMIM समेत विपक्षी दलों के नेताओं ने कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। सपा प्रमुख अखिलेश यादव और AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने खास तौर पर सुबह के समय की गई कार्रवाई को लेकर सरकार से सवाल किए।
वहीं प्रशासन का कहना है कि मामला धार्मिक पहचान का नहीं बल्कि सरकारी जमीन पर अनधिकृत कब्जे और अदालत के आदेश के अनुपालन का है।
अब जमीन के दस्तावेज बने सबसे बड़ा मुद्दा
पूरे विवाद में अब याकूब खां के परिवार का दावा महत्वपूर्ण हो गया है। फिरोज खां का कहना है कि परिवार ने कभी जमीन पर अपना अधिकार जताकर मस्जिद के संचालन में हस्तक्षेप नहीं किया, क्योंकि उनके पूर्वजों ने जमीन धार्मिक उद्देश्य के लिए दी थी।
दूसरी ओर प्रशासनिक रिकॉर्ड में जमीन को सरकारी मानने का आधार अदालत के सामने रखा गया और निचली अदालत का निष्कर्ष जिला अदालत में भी बरकरार रहा।
अब यदि मामला हाईकोर्ट पहुंचता है तो पुराने दस्तावेज, सरकारी भूमि रिकॉर्ड, कब्जे की प्रकृति और प्रशासन द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया कानूनी बहस के प्रमुख बिंदु बन सकते हैं।
ध्वस्तीकरण के बाद भी खत्म नहीं हुआ विवाद
मस्जिद का ढांचा भले ही गिरा दिया गया हो, लेकिन इससे जुड़ा विवाद खत्म होता दिखाई नहीं दे रहा है। एक तरफ प्रशासन अपनी कार्रवाई को कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप बता रहा है, वहीं मस्जिद प्रबंधन और जमीन से जुड़े परिवार के सदस्य अपने दस्तावेजों के आधार पर प्रशासन के दावे को चुनौती दे रहे हैं।
याकूब खां के परपोते फिरोज खां के सामने आने के बाद इस विवाद में पारिवारिक और ऐतिहासिक दस्तावेजों का पहलू भी जुड़ गया है। अब आगे की कानूनी कार्यवाही से ही स्पष्ट होगा कि इन दावों को अदालत किस तरह देखती है और जमीन के मालिकाना हक तथा ध्वस्तीकरण की वैधानिकता पर अंतिम स्थिति क्या बनती है।
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