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शराब में एथेनॉल की मात्रा बताएगा नया सेंसर, प्रयागराज के वैज्ञानिकों की नई तकनीक

प्रयागराज। शराब और अन्य पदार्थों में एथेनॉल की मौजूदगी का पता लगाने की दिशा में प्रयागराज के वैज्ञानिकों ने एक नया सेंसर विकसित किया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह सेंसर हवा में मौजूद एथेनॉल वाष्प को पहचानने में सक्षम है। सेंसर को अलग-अलग परिस्थितियों और संरचनाओं में जांचा गया, जिसमें दो प्रतिशत कैडमियम सल्फाइड मिलाकर तैयार किए गए सेंसर ने बेहतर परिणाम दिए। इस तकनीक को लेकर पेटेंट आवेदन भी दाखिल किया गया है।
इलाहाबाद डिग्री कॉलेज के भौतिक विज्ञान विभाग के डॉ. राम प्रताप के अनुसार शोध के दौरान सेंसर की कार्यक्षमता को अलग-अलग परिस्थितियों में परखा गया। वैज्ञानिकों ने यह जानने की कोशिश की कि सामग्री की संरचना में बदलाव करने पर एथेनॉल वाष्प के प्रति सेंसर की प्रतिक्रिया किस तरह बदलती है। परीक्षण में दो प्रतिशत कैडमियम सल्फाइड वाली संरचना से बेहतर परिणाम मिलने की बात सामने आई।
इस शोध का उद्देश्य एथेनॉल की पहचान के लिए ऐसी सेंसर तकनीक विकसित करना है जो गैस या वाष्प के रूप में मौजूद एथेनॉल को पहचान सके। सेंसर आधारित तकनीकों में आमतौर पर किसी विशेष गैस के संपर्क में आने पर संवेदनशील पदार्थ के विद्युत गुणों में होने वाले बदलाव को मापा जाता है। एथेनॉल सेंसर को लेकर दुनिया भर में लंबे समय से शोध चल रहा है और अलग-अलग नैनोमैटेरियल आधारित सेंसर विकसित किए जा चुके हैं। वैज्ञानिक साहित्य में ऐसे सेंसरों को तेज प्रतिक्रिया और संवेदनशीलता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक तैयार किए गए सेंसर की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता हवा में मौजूद एथेनॉल वाष्प को पहचानना है। किसी नमूने से निकलने वाली एथेनॉल वाष्प सेंसर के संपर्क में आने पर उसकी प्रतिक्रिया को रिकॉर्ड किया जा सकता है। इससे एथेनॉल की उपस्थिति का आकलन करने में मदद मिल सकती है। हालांकि किसी व्यावसायिक उपकरण के रूप में इसके इस्तेमाल से पहले प्रयोगशाला से बाहर बड़े स्तर पर परीक्षण और मानकीकरण जैसी प्रक्रियाएं जरूरी होंगी।
वैज्ञानिकों ने सेंसर तैयार करने के दौरान कैडमियम सल्फाइड की अलग-अलग मात्रा के प्रभाव का अध्ययन किया। इसमें दो प्रतिशत कैडमियम सल्फाइड वाले सेंसर के प्रदर्शन को सबसे बेहतर बताया गया। शोध के आधार पर यह समझने की कोशिश की गई कि सामग्री में किए गए बदलाव सेंसर की संवेदनशीलता और प्रतिक्रिया को किस तरह प्रभावित करते हैं।
इस तरह के सेंसरों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि एथेनॉल का उपयोग केवल मादक पेय पदार्थों तक सीमित नहीं है। इसका इस्तेमाल औद्योगिक प्रक्रियाओं, प्रयोगशालाओं, ईंधन, सैनिटाइजर और कई रासायनिक उत्पादों में किया जाता है। इसलिए एथेनॉल वाष्प की पहचान करने वाली तकनीक भविष्य में अलग-अलग क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती है। हालांकि इस विशेष सेंसर के व्यावहारिक उपयोगों और व्यावसायिक उपलब्धता को लेकर अभी आगे के परीक्षणों के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।
एथेनॉल वाष्प का पता लगाने वाले सेंसरों पर पहले भी कई अध्ययन किए गए हैं। उदाहरण के तौर पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट में भी एथेनॉल वाष्प की संवेदनशील पहचान से संबंधित प्रकाशित शोध का उल्लेख है। इससे पता चलता है कि प्रयागराज के वैज्ञानिक संस्थानों में गैस सेंसर और एथेनॉल डिटेक्शन पर शोध पहले से एक सक्रिय क्षेत्र रहा है।
नई तकनीक को लेकर शोधकर्ताओं ने पेटेंट आवेदन दाखिल किया है। पेटेंट की प्रक्रिया पूरी होने पर विकसित तकनीक से जुड़े बौद्धिक संपदा अधिकारों को संरक्षण मिल सकता है। शोध के निष्कर्ष को नीदरलैंड स्थित वैज्ञानिक प्रकाशन समूह एल्सेवियर से जुड़े जर्नल के हालिया अंक में प्रकाशित किए जाने की जानकारी दी गई है। हालांकि उपलब्ध सार्वजनिक खोज परिणामों में इस विशेष शोधपत्र और पेटेंट आवेदन का पूरा रिकॉर्ड स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हो सका है।
सेंसर के विकास में सबसे महत्वपूर्ण चुनौती उसकी संवेदनशीलता के साथ चयनात्मकता बनाए रखना होती है। वातावरण में एक ही समय पर कई तरह की गैसें और वाष्प मौजूद हो सकती हैं। ऐसे में सेंसर को इस तरह तैयार करना आवश्यक होता है कि वह लक्षित गैस के प्रति स्पष्ट प्रतिक्रिया दे और दूसरी गैसों के कारण मिलने वाले संकेत को न्यूनतम रखा जा सके। इसके अलावा तापमान, नमी और आसपास के वातावरण में बदलाव भी सेंसर के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकते हैं। इसी वजह से नई सेंसर तकनीकों को अलग-अलग परिस्थितियों में जांचा जाता है।
वैज्ञानिक शोधों में छोटे और पोर्टेबल सेंसर विकसित करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। ऐसे उपकरणों का फायदा यह है कि जांच के लिए हर बार बड़े प्रयोगशाला उपकरणों की आवश्यकता कम की जा सकती है। सेंसर तकनीक में आगे सुधार होने पर वास्तविक समय में गैस या वाष्प की पहचान करने वाले उपकरण तैयार किए जा सकते हैं।
प्रयागराज में विकसित इस सेंसर को लेकर शुरुआती परिणाम उत्साहजनक बताए गए हैं, लेकिन इसे व्यावहारिक स्तर पर इस्तेमाल करने से पहले और परीक्षण आवश्यक होंगे। खास तौर पर अलग-अलग एथेनॉल सांद्रता, तापमान, नमी और अन्य गैसों की मौजूदगी में इसके प्रदर्शन का व्यापक मूल्यांकन महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल दो प्रतिशत कैडमियम सल्फाइड के साथ तैयार सेंसर के बेहतर प्रदर्शन ने आगे के शोध के लिए नई संभावनाएं खोली हैं। यदि भविष्य के परीक्षणों में भी इसके परिणाम प्रभावी रहते हैं तो एथेनॉल वाष्प की पहचान से जुड़ी सेंसर तकनीक के विकास में यह शोध उपयोगी साबित हो सकता है।





