उत्तर प्रदेश

हरिगढ़ के बहाने चुनावी मैदान में नई सियासत

Ratna Netam
5 Aug 2026 2:13 PM IST
हरिगढ़ के बहाने चुनावी मैदान में नई सियासत
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उत्तर प्रदेश : चुनावी माहौल के बीच अलीगढ़ का नाम बदलकर **हरिगढ़** किए जाने की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। शासन ने इस संबंध में जिला प्रशासन से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है, जिसके बाद इस मुद्दे ने राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर हलचल बढ़ा दी है। रिपोर्ट मांगने के साथ ही वर्षों पुराना नाम परिवर्तन का विवाद फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। सत्ता पक्ष इसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ रहा है, जबकि विपक्ष इसे चुनावी राजनीति और जनता के वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश बता रहा है।
राजस्व परिषद के आयुक्त एवं सचिव सूरज कुमार यादव की ओर से जिला प्रशासन को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि जिला पंचायत अध्यक्ष विजय सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अलीगढ़ का नाम बदलकर हरिगढ़ करने का प्रस्ताव सौंपा था। इस प्रस्ताव के संबंध में जिला प्रशासन से औचित्यपूर्ण और विस्तृत आख्या मांगी गई है, जिसे मंडलायुक्त के माध्यम से शासन को भेजा जाएगा। रिपोर्ट मिलने के बाद शासन स्तर पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
अलीगढ़ का नाम बदलने की मांग नई नहीं है। वर्ष 2021 में जिला पंचायत अध्यक्ष बनने के बाद विजय सिंह ने पहली बैठक में यह प्रस्ताव रखा था। उस समय जिले के सांसदों और विधायकों ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया था और इसे शासन को भेजा गया था। अब एक बार फिर इस प्रस्ताव पर प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ने से यह मुद्दा राजनीतिक बहस का विषय बन गया है।
इतिहासकारों के अनुसार अलीगढ़ का नाम समय-समय पर कई बार बदला गया है। माना जाता है कि प्राचीन समय में इस क्षेत्र का नाम **कोल** था। बाद में अलग-अलग शासकों के शासनकाल में इसका नाम **सब्जाबाद**, **मोहम्मदगढ़**, **साबितगढ़** और अन्य नामों से जाना गया। वर्ष 1775 में नजफ अली खान ने इस क्षेत्र पर अधिकार करने के बाद इसका नाम बदलकर **अलीगढ़** रखा, जो आज तक प्रचलन में है।
इतिहास की जानकार प्रोफेसर वेदवती राठी के अनुसार 14वीं शताब्दी में प्रसिद्ध यात्री इब्ने बतूता ने अपने यात्रा वृत्तांत में इस क्षेत्र का उल्लेख **सब्जाबाद** के नाम से किया था, क्योंकि उस समय यहां घने बाग-बगीचे और हरियाली थी। बाद में लोधी शासनकाल के दौरान गवर्नर मोहम्मद ने अपने नाम पर इसका नाम **मोहम्मदगढ़** रखा। मुगल शासन में साबित खान के समय इसका नाम **साबितगढ़** हुआ और बाद में नजफ अली खान ने इसे अलीगढ़ नाम दिया। वर्ष 1803 में मराठों और अंग्रेजों के बीच लड़ी गई प्रसिद्ध **बैटल ऑफ अलीगढ़** भी इसी नाम से इतिहास में दर्ज है।
नाम परिवर्तन के मुद्दे पर राजनीतिक दलों की राय पूरी तरह बंटी हुई है। भाजपा सांसद सतीश गौतम ने कहा कि यदि अलीगढ़ का नाम हरिगढ़ रखा जाता है तो यह स्वागत योग्य कदम होगा। उनके अनुसार यह शहर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा विषय है। जिला पंचायत अध्यक्ष विजय सिंह ने भी कहा कि उन्होंने पहले ही मुख्यमंत्री को प्रस्ताव सौंप दिया था और अब उस पर कार्रवाई आगे बढ़ रही है। कोल विधानसभा क्षेत्र के विधायक अनिल पाराशर ने दावा किया कि हरिगढ़ इस क्षेत्र की प्राचीन पहचान रही है और उसी नाम को पुनर्स्थापित किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर विपक्ष ने इस पूरी कवायद पर सवाल उठाए हैं। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सांसद चौधरी बिजेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार को जनता की समस्याओं के समाधान पर ध्यान देना चाहिए, न कि नाम बदलने की राजनीति पर। उनके अनुसार ऐसे मुद्दे समाज में अनावश्यक विवाद पैदा करते हैं और सामाजिक सौहार्द को प्रभावित कर सकते हैं।
कांग्रेस के जिला अध्यक्ष ठाकुर सोमवीर सिंह ने भी सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रदेश में बेरोजगारी, महंगाई और विकास जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, लेकिन सरकार उनका समाधान करने के बजाय नाम बदलने जैसे विषयों को प्राथमिकता दे रही है। उन्होंने इसे राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश बताया और कहा कि जनता वास्तविक मुद्दों पर जवाब देगी।
फिलहाल शासन द्वारा मांगी गई रिपोर्ट के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि प्रस्ताव केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी इसकी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। हालांकि अंतिम निर्णय राज्य सरकार को लेना है। यदि सरकार नाम परिवर्तन के प्रस्ताव को मंजूरी देती है तो अलीगढ़ के इतिहास में एक और नया अध्याय जुड़ सकता है। वहीं विपक्ष इस मुद्दे को चुनावी रणनीति से जोड़कर लगातार सरकार पर निशाना साध रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह विषय उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रमुख चर्चा का केंद्र बना रह सकता है।
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