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यूपी चुनाव 2027 में खुलेंगे नए मोर्चे, दिव्या-रोहिणी से सियासी हलचल

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी जैसे स्थापित दल जहां अभी से चुनावी रणनीति तैयार करने में जुटे हैं, वहीं इस बार कुछ नए चेहरे और नए राजनीतिक मंच भी चुनावी तस्वीर को बदलने की कोशिश कर सकते हैं। पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल के राजनीति में आने के ऐलान और रोहिणी घावरी की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता ने प्रदेश की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी है।
पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने हाल ही में भारतीय प्रशासनिक सेवा छोड़ने के बाद राजनीति में उतरने की घोषणा की है। मित्तल 2013 बैच की उत्तर प्रदेश कैडर की आईएएस अधिकारी रही हैं। उन्होंने करीब 13 साल की प्रशासनिक सेवा के बाद अगस्त 2026 में इस्तीफा दिया था। इसके बाद सितंबर के अंतिम सप्ताह में उन्होंने सार्वजनिक रूप से उत्तर प्रदेश से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने की बात कही।
दिव्या मित्तल ने फिलहाल किसी स्थापित राजनीतिक दल में शामिल होने से इनकार किया है। उनका कहना है कि वह जनता के साथ मिलकर राजनीति करना चाहती हैं और उन लोगों की आवाज उठाना चाहती हैं, जिनकी समस्याएं कई बार सरकारी तंत्र तक नहीं पहुंच पातीं। उन्होंने उत्तर प्रदेश को अपनी कर्मभूमि बताते हुए यहीं से राजनीतिक सफर शुरू करने की घोषणा की है।
हालांकि दिव्या मित्तल नई पार्टी बनाएंगी या किसी स्वतंत्र राजनीतिक मंच के जरिए चुनावी मैदान में उतरेंगी, इसे लेकर अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। कुछ रिपोर्टों में उनके नई राजनीतिक ताकत खड़ी करने की तैयारी का दावा किया गया है, जबकि दिव्या मित्तल की ओर से अभी किसी पार्टी के नाम या संगठनात्मक ढांचे की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। इसलिए नई पार्टी बनाने की चर्चा को फिलहाल राजनीतिक संभावनाओं के तौर पर ही देखा जा रहा है।
दिव्या मित्तल की चुनावी सीट को लेकर भी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि वह 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ सकती हैं, लेकिन उन्होंने अभी यह साफ नहीं किया है कि वह किस विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतरेंगी। उनकी प्रशासनिक पृष्ठभूमि और अलग-अलग जिलों में काम करने के अनुभव को देखते हुए राजनीतिक गलियारों में उनके अगले कदम पर नजर बनी हुई है।
दूसरी ओर रोहिणी घावरी भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में लगातार सक्रिय दिखाई दे रही हैं। नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद पर आरोप लगाने के बाद वह काफी चर्चा में आई थीं। हाल में वह चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग को लेकर अदालत भी पहुंचीं। अदालत ने पुलिस से मामले में रिपोर्ट मांगी है। इस घटनाक्रम के बाद रोहिणी घावरी की राजनीतिक और सार्वजनिक सक्रियता एक बार फिर चर्चा में आ गई है।
राजनीतिक जानकारों की नजर इस बात पर रहेगी कि रोहिणी घावरी अपनी सक्रियता को किसी राजनीतिक संगठन, नए मोर्चे या विधानसभा चुनाव की दावेदारी में बदलती हैं या नहीं। फिलहाल उनके किसी नए दल की औपचारिक घोषणा या 2027 के लिए किसी सीट से उम्मीदवारी की पुष्टि सामने नहीं आई है। ऐसे में उनकी भूमिका को लेकर कई संभावनाएं जरूर बन रही हैं, लेकिन अंतिम तस्वीर आने वाले महीनों में ही साफ होगी।
उत्तर प्रदेश का 2027 विधानसभा चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण होने जा रहा है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर चर्चा पहले से शुरू हो चुकी है। वहीं भाजपा भी सामाजिक और जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अपनी चुनावी रणनीति पर काम कर रही है। अक्टूबर 2026 में ही दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमों की ओर से 2027 की तैयारियों के संकेत मिलने लगे हैं।
ऐसे माहौल में दिव्या मित्तल जैसे पूर्व नौकरशाह का राजनीति में उतरना और रोहिणी घावरी जैसे चर्चित चेहरे की सक्रियता स्थापित दलों के लिए नया राजनीतिक समीकरण पैदा कर सकती है। हालांकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए राजनीतिक दलों और मोर्चों के लिए जगह बनाना आसान नहीं माना जाता। यहां चुनावी सफलता के लिए मजबूत संगठन, बूथ स्तर की टीम, सामाजिक समीकरण और व्यापक जनाधार महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
2027 के विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन नए चेहरों की सक्रियता ने यह संकेत दे दिया है कि मुकाबला केवल पारंपरिक दलों तक सीमित नहीं रहने वाला। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि दिव्या मित्तल किस स्वरूप में अपना राजनीतिक मंच तैयार करती हैं और रोहिणी घावरी चुनावी राजनीति में किस भूमिका के साथ सामने आती हैं। फिलहाल इन दोनों चेहरों की गतिविधियों ने उत्तर प्रदेश के सियासी मैदान में नए मोर्चों की संभावना जरूर बढ़ा दी है।





