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यूपीआई भुगतान पर शुल्क को लेकर मायावती ने सरकार पर साधा निशाना

लखनऊ। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) से दो हजार रुपये से अधिक के भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) शुल्क लगाने को लेकर बहुजन समाज पार्टी (BSP) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर इस व्यवस्था को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी।
मायावती ने अपने पोस्ट में कहा कि यूपीआई को पहले बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया गया और अब लेनदेन पर शुल्क लगाने की व्यवस्था लोगों की नजर में आर्थिक बोझ बढ़ाने वाली हो सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कदम आम जनता के खर्च को प्रभावित करेगा।
बसपा प्रमुख ने लिखा कि सरकार इस व्यवस्था को कर (टैक्स) मानने को तैयार नहीं है, लेकिन नाम कुछ भी हो, इसका असर अंततः आम लोगों की जेब पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि इससे लोगों का खर्च बढ़ सकता है।
मायावती ने आगे कहा कि देश की बड़ी आबादी पहले से ही गरीबी और महंगाई की समस्या से जूझ रही है। ऐसे समय में किसी भी अतिरिक्त आर्थिक भार को लेकर सरकार को जनता के हितों को ध्यान में रखना चाहिए।
उन्होंने यूपीआई भुगतान व्यवस्था को लेकर सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के बाद अब शुल्क व्यवस्था लागू करने से आम उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों पर असर पड़ सकता है।
यूपीआई भारत में डिजिटल भुगतान का एक प्रमुख माध्यम बन चुका है। इसके जरिए छोटे से लेकर बड़े लेनदेन तक तेजी से ऑनलाइन भुगतान किया जाता है। व्यापारियों और ग्राहकों के बीच डिजिटल भुगतान की सुविधा बढ़ने से नकदी पर निर्भरता कम हुई है।
मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) वह शुल्क होता है, जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारियों से भुगतान सेवा प्रदाता संस्थाओं द्वारा लिया जाता है। यह शुल्क भुगतान प्रक्रिया से जुड़े बैंकों और अन्य संस्थानों के बीच लेनदेन की लागत को पूरा करने के लिए होता है।
मायावती की प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है, जब यूपीआई लेनदेन पर संभावित शुल्क को लेकर चर्चा चल रही है। इस मुद्दे पर डिजिटल भुगतान, व्यापारियों की लागत और उपभोक्ताओं पर संभावित प्रभाव को लेकर बहस जारी है।
बसपा प्रमुख ने अपने बयान में सरकार से जनता पर अतिरिक्त बोझ नहीं डालने की बात कही। उन्होंने कहा कि आम लोगों की आर्थिक स्थिति को देखते हुए नीतियां बनानी चाहिए।
वहीं, डिजिटल भुगतान क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शुल्क व्यवस्था का असर व्यापारियों और उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है, इसलिए इसके स्वरूप और लागू करने के तरीके को लेकर स्पष्टता जरूरी होती है।
यूपीआई के जरिए होने वाले लेनदेन की संख्या पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। सरकार और वित्तीय संस्थान लगातार डिजिटल भुगतान को आसान और सुलभ बनाने की दिशा में काम करते रहे हैं।
मायावती ने अपने बयान के जरिए महंगाई और आम लोगों की आर्थिक परेशानियों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में अतिरिक्त खर्च बढ़ाने वाली किसी भी व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए।
फिलहाल यूपीआई भुगतान शुल्क को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विभिन्न दल इस मुद्दे पर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
मायावती के बयान के बाद अब सरकार और संबंधित पक्षों की ओर से इस विषय पर आगे की प्रतिक्रिया का इंतजार है। वहीं, डिजिटल भुगतान व्यवस्था में किसी भी बदलाव को लेकर व्यापारियों और आम उपभोक्ताओं की नजरें बनी हुई हैं।





