उत्तर प्रदेश

मालेगांव ब्लास्ट केस: सभी आरोपियों की बरी के बाद NIA अपील पर कर रही विचार-विमर्श

SHIDDHANT
28 Aug 2025 9:28 PM IST
DELHI दिल्ली: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) मालेगांव ब्लास्ट केस में विशेष NIA अदालत के बरी करने के फैसले का अध्ययन कर रही है। एजेंसी यह तय करने के चरण में है कि फैसले के खिलाफ अपील दाखिल की जाए या नहीं। NIA के प्रवक्ता ने गुरुवार को बताया कि एजेंसी अभी भी अदालत के आदेश को विस्तार से देख रही है और फिलहाल अपील पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
कानूनी राय पर विचार
NIA के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस समय शाखा स्तर पर कानूनी राय ली जा रही है। इसके बाद उच्च स्तर पर फैसला लिया जाएगा कि अपील कब और कैसे दाखिल की जाए। अधिकारी ने समझाया कि किसी भी मामले में कोर्ट का आदेश पहले चीफ इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (CIO) के पास जाता है, जिसके बाद कानूनी राय लेकर आगे की रणनीति तय की जाती है।
उन्होंने यह भी इशारा किया कि सामान्य परिस्थितियों में पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्णय 30 दिनों के भीतर लिया जाता है, जबकि अपील दाखिल करने की समय-सीमा 90 दिन तक बढ़ाई जा सकती है।
सभी सात आरोपी बरी
31 जुलाई को विशेष NIA अदालत ने मालेगांव ब्लास्ट केस में सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया था। इनमें सांसद प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित, मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय, अजय रहीरकर, सुधाकर द्विवेदी, सुधाकर चतुर्वेदी और समीर कुलकर्णी शामिल हैं।
विशेष जज ए.के. लाहोटी ने फैसला सुनाते हुए आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ ठोस और भरोसेमंद सबूत पेश करने में नाकाम रहा। जो साक्ष्य पेश किए गए, वे विरोधाभासी और असंगतियों से भरे हुए थे।
2008 का मालेगांव धमाका
यह विस्फोट 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील शहर मालेगांव में हुआ था। रमजान के पवित्र महीने में एक मस्जिद के पास मोटरसाइकिल में बंधा बम फटने से छह लोगों की मौत हो गई और 101 लोग घायल हो गए। धमाके के बाद इलाके में तनाव फैल गया और दंगे जैसे हालात बन गए। स्थानीय लोगों ने पुलिस पर हमला कर दिया, जिससे जांच और अधिक जटिल हो गई।
लंबी कानूनी प्रक्रिया
धमाके के बाद यह केस विभिन्न एजेंसियों के बीच स्थानांतरित होता रहा और कई वर्षों तक जांच चलती रही। शुरुआती जांच में अलग-अलग सुराग सामने आए, लेकिन ठोस सबूत जुटाने में कठिनाई बनी रही। 2008 से लेकर 2024 तक यह मामला अदालतों में चला और अंततः विशेष NIA अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया।
NIA की आगे की राह
फैसले के बाद अब NIA पर दबाव है कि वह आगे की कानूनी लड़ाई लड़े या नहीं। चूंकि यह मामला साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील माना जाता रहा है, इसलिए अदालत के फैसले के बाद पीड़ित पक्ष और प्रभावित परिवारों ने निराशा जताई है। वहीं, आरोपियों और उनके समर्थकों ने इसे न्याय की जीत करार दिया है।
NIA प्रवक्ता के अनुसार, एजेंसी बहुत सावधानीपूर्वक इस मामले पर विचार कर रही है। अगर अपील दाखिल करनी होती है, तो सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय में यह मामला ले जाया जा सकता है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अपील का विकल्प खुला है, लेकिन सफलता काफी हद तक अभियोजन पक्ष के पास मौजूद सबूतों और उनके कानूनी वजन पर निर्भर करेगा।
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