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मिर्जापुर। उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग में करोड़ों रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। मिर्जापुर में बिना नियुक्ति के ही 344 कथित कर्मचारियों के नाम पर लगभग 16 करोड़ रुपये का एरियर भुगतान किए जाने का खुलासा हुआ है। महालेखाकार कार्यालय प्रयागराज की ऑडिट टीम ने विभागीय अभिलेखों की जांच के दौरान इस गड़बड़ी को पकड़ा। मामला सामने आने के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है। मिर्जापुर कैनाल डिविजन के एकाउंटेंट जितेंद्र कुमार को निलंबित कर दिया गया है। उनके और एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ शहर कोतवाली में प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। अब जांच का दायरा अन्य डिविजनों तक बढ़ने लगा है।
बिना नियुक्ति 344 लोगों के नाम पर करोड़ों का भुगतान
जानकारी के अनुसार, मिर्जापुर कैनाल डिविजन में कर्मचारियों के बकाया वेतन और एरियर भुगतान के नाम पर बड़े पैमाने पर अनियमितता की गई। आरोप है कि लघु डाल पंप कैनाल से जुड़े 344 ऐसे लोगों के नाम पर कोषागार में खाते खुलवाए गए, जिनकी विभाग में नियुक्ति ही नहीं हुई थी।
इसके बावजूद उनके नाम से एरियर भुगतान के बिल तैयार किए गए और सरकारी खजाने से लगभग 16 करोड़ रुपये की रकम खातों में भेज दी गई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों की नियुक्ति का कोई रिकॉर्ड ही नहीं था, उनके नाम पर सरकारी धन का भुगतान कैसे हो गया। इस मामले ने विभागीय लेखा व्यवस्था और कोषागार में दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
महालेखाकार की ऑडिट टीम ने पकड़ी गड़बड़ी
प्रयागराज स्थित महालेखाकार कार्यालय की टीम ने 14 अक्टूबर से सिंचाई विभाग के वित्तीय अभिलेखों की जांच शुरू की थी। बताया गया है कि 16 अक्टूबर को जांच के दौरान लगभग 16 करोड़ रुपये के संदिग्ध एरियर भुगतान का मामला सामने आया।
ऑडिट टीम ने जब भुगतान से जुड़े अभिलेखों और कर्मचारियों की जानकारी का मिलान किया, तब वित्तीय अनियमितता का मामला उजागर हुआ।
इसके बाद विभागीय अधिकारियों के बीच हलचल तेज हो गई। जांच में यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि भुगतान के लिए किन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया और खातों की स्वीकृति किस स्तर पर हुई थी।
कैसे किया गया एरियर भुगतान का खेल?
सिंचाई विभाग में एरियर का भुगतान कर्मचारियों के बकाया वेतन, वेतन वृद्धि और अन्य स्वीकृत वित्तीय लाभों के आधार पर किया जाता है।
मिर्जापुर कैनाल डिविजन के अधिशासी अभियंता को अन्य दस खंडों के कर्मचारियों के एरियर भुगतान के लिए आहरण एवं वितरण अधिकारी की जिम्मेदारी दी गई है।
इस व्यवस्था के अंतर्गत लिपिक और लेखा कर्मचारी भुगतान से संबंधित बिल तैयार करते हैं। इसके बाद अधिशासी अभियंता के हस्ताक्षर से बिल को कोषागार भेजा जाता है, जहां से संबंधित बैंक खातों में धनराशि स्थानांतरित की जाती है।
आरोप है कि इसी प्रक्रिया का दुरुपयोग कर फर्जी कर्मचारियों के नाम पर भुगतान कराया गया। अब जांच में यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि संदिग्ध बिलों को मंजूरी कैसे मिली और किस स्तर पर सत्यापन की प्रक्रिया विफल हुई।
एकाउंटेंट निलंबित, अज्ञात के खिलाफ भी एफआईआर
घोटाले का मामला सामने आने के बाद मिर्जापुर कैनाल डिविजन के अधिशासी अभियंता प्रमोद कुमार की शिकायत पर एकाउंटेंट जितेंद्र कुमार और एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ शहर कोतवाली में प्राथमिकी दर्ज कराई गई।
जितेंद्र कुमार को निलंबित कर विभागीय जांच शुरू कर दी गई है।
पुलिस अब संबंधित अभिलेखों और संदिग्ध भुगतान की जांच कर रही है। जांच के दौरान अन्य अधिकारियों या कर्मचारियों की भूमिका सामने आने पर उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।
हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि इस मामले में कुल कितने लोग शामिल थे और भुगतान की राशि किन-किन खातों तक पहुंची।
16 करोड़ के बदले 18 करोड़ जमा कराने की भी चर्चा
इस मामले में एक और हैरान करने वाली जानकारी सामने आई है। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, कथित अनियमित भुगतान के बाद लगभग 16 करोड़ रुपये की जगह 18 करोड़ रुपये सरकारी कोष में जमा कराए जाने की बात भी सामने आई है।
यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि धनराशि वापस जमा कराकर मामले को दबाने की कोशिश की गई। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक जांच पूरी होना अभी बाकी है।
ऐसे में सवाल उठता है कि यदि भुगतान गलत तरीके से हुआ था तो संबंधित अधिकारियों ने तत्काल विस्तृत जांच क्यों नहीं कराई। रकम वापस जमा कराने की परिस्थितियों और इसमें शामिल लोगों की भूमिका भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है।
दूसरे डिविजनों में भी घोटाले की आशंका
शुरुआत में मामला मिर्जापुर कैनाल डिविजन से सामने आया, लेकिन अब अन्य कार्यालयों के वित्तीय रिकॉर्ड भी जांच के दायरे में आ गए हैं।
बुधवार को महालेखाकार कार्यालय की चार सदस्यीय ऑडिट टीम ने लघु डाल नहर प्रखंड में अभिलेखों की जांच की। टीम ने वर्ष 2016 से अब तक तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों का विवरण मांगा है।
इसके अलावा जनवरी से अगस्त 2026 तक कोषागार से किए गए भुगतान का सत्यापन किया जा रहा है। पूर्व वर्षों के एरियर, वेतन निर्धारण और अन्य मदों में किए गए भुगतानों की भी पड़ताल हो रही है।
इससे आशंका जताई जा रही है कि विस्तृत जांच के बाद वित्तीय अनियमितताओं का दायरा बढ़ सकता है। हालांकि, अन्य डिविजनों में इसी तरह का घोटाला होने की अभी पुष्टि नहीं हुई है।
सरकारी धन के दुरुपयोग पर उठे गंभीर सवाल
सिंचाई विभाग में सामने आए इस मामले ने सरकारी भुगतान व्यवस्था की पारदर्शिता पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
आखिर 344 कथित कर्मचारियों के नाम पर भुगतान के लिए दस्तावेज किसने तैयार किए? बिना नियुक्ति वाले लोगों के नाम पर वेतन संबंधी रिकॉर्ड कैसे बनाए गए? कोषागार स्तर पर इन दस्तावेजों की जांच क्यों नहीं हो सकी?
इन सवालों के जवाब विस्तृत जांच के बाद ही सामने आ पाएंगे।
फिलहाल एक कर्मचारी के निलंबन और प्राथमिकी दर्ज होने के बाद विभागीय जांच जारी है। अब देखना होगा कि जांच में केवल कुछ कर्मचारियों की भूमिका सामने आती है या सरकारी धन के कथित दुरुपयोग में किसी बड़े नेटवर्क का खुलासा होता है।





