उत्तर प्रदेश

रेंट कानून पर बड़ा फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को दिया बड़ा झटका

Ratna Netam
24 Aug 2026 9:05 PM IST
रेंट कानून पर बड़ा फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को दिया बड़ा झटका
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प्रयागराज। उत्तर प्रदेश में मकान मालिक और किराएदारों से जुड़े मामलों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने **उत्तर प्रदेश नगरीय परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021** के कई महत्वपूर्ण प्रावधानों को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया है। इस फैसले के बाद राज्य में किराया निर्धारण, किराया बढ़ाने और मकान खाली कराने से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।
हाईकोर्ट के इस फैसले से जहां कई मकान मालिकों को राहत मिलने की उम्मीद है, वहीं किराएदारों के लिए भी कानूनी स्थिति को समझना जरूरी हो गया है। कोर्ट ने साफ किया है कि 2021 के कानून के कुछ प्रावधान संविधान और केंद्रीय कानूनों से टकरा रहे थे, इसलिए उन्हें लागू नहीं रखा जा सकता।
हाईकोर्ट ने किन प्रावधानों को किया रद्द?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने यूपी किरायेदारी कानून 2021 की कई धाराओं को रद्द किया है। इनमें मुख्य रूप से किराया तय करने, किराया संशोधन और विवाद की स्थिति में किराया प्राधिकरण द्वारा फैसला लेने से जुड़े प्रावधान शामिल हैं।
कोर्ट ने कानून की धारा 8, 9 और 10 को असंवैधानिक माना। इन धाराओं में किराए की राशि तय करने और बढ़ाने की प्रक्रिया का प्रावधान था। इसके अलावा धारा 38 और 42 को भी उस सीमा तक रद्द किया गया, जहां वे अन्य कानूनों के प्रभाव को बदलने की कोशिश करती थीं।
क्यों रद्द किया गया कानून?
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किरायेदारी से जुड़े कई विषय ऐसे हैं, जिन पर केंद्र सरकार के कानून पहले से लागू हैं। कोर्ट के अनुसार, यूपी सरकार के 2021 के कानून के कुछ प्रावधान **संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882** और अन्य केंद्रीय कानूनों से टकरा रहे थे।
संविधान के अनुच्छेद 254(2) के तहत ऐसी स्थिति में राज्य कानून को लागू रखने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी होती है। कोर्ट ने माना कि इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। इसी आधार पर संबंधित प्रावधानों को अमान्य घोषित किया गया।
अब कौन सा कानून लागू होगा?
हाईकोर्ट के फैसले के बाद उत्तर प्रदेश में पुराना किरायेदारी कानून यानी **उत्तर प्रदेश शहरी भवन (किराये पर देने, किराया तथा बेदखली का विनियमन) अधिनियम, 1972** आवश्यक सीमा तक फिर प्रभावी होगा।
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि 2021 के कानून के तहत पहले से पूरी हो चुकी सभी प्रक्रियाएं अपने आप खत्म नहीं होंगी। जिन मामलों में किराया समझौते हो चुके हैं या कानूनी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, उन्हें सुरक्षित रखा गया है।
मकान मालिकों पर क्या असर पड़ेगा?
हाईकोर्ट के फैसले के बाद मकान मालिकों को किराया और संपत्ति विवादों में पुराने कानूनी प्रावधानों के तहत राहत मिल सकती है।
2021 के कानून में किराया प्राधिकरण और किराया न्यायाधिकरण जैसी व्यवस्था बनाई गई थी। अब कई मामलों में पुराने कानून और सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के तहत विवादों का समाधान होगा।
मकान मालिकों का कहना है कि नया कानून कई बार जटिल प्रक्रिया पैदा कर रहा था। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि किरायेदारों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए संतुलित व्यवस्था जरूरी है।
किराएदारों के अधिकारों पर क्या असर?
किरायेदारों को भी घबराने की जरूरत नहीं है। हाईकोर्ट ने पूरे कानून को खत्म नहीं किया है, बल्कि केवल उन प्रावधानों को हटाया है जो कानूनी टकराव पैदा कर रहे थे।
किरायेदारों के अधिकार पुराने कानूनों और अदालतों के जरिए सुरक्षित रहेंगे। मकान मालिक मनमाने तरीके से किरायेदार को बाहर नहीं कर सकता, बल्कि इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
रेंट एग्रीमेंट होगा महत्वपूर्ण
इस फैसले के बाद किरायेदारी समझौते की भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, मकान मालिक और किरायेदार दोनों को लिखित रेंट एग्रीमेंट जरूर करना चाहिए ताकि भविष्य में विवाद की स्थिति में अधिकार और जिम्मेदारियां स्पष्ट रहें।
किराए की राशि, अवधि, बढ़ोतरी, बिजली-पानी खर्च और मकान खाली करने जैसी शर्तों को समझौते में शामिल करना जरूरी है।
क्या नए विवादों पर पड़ेगा असर?
हाईकोर्ट के फैसले के बाद नए किरायेदारी विवादों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा। अब किराया बढ़ाने, मकान खाली कराने और अन्य मामलों में पुराने कानूनी प्रावधानों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला उत्तर प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में लाखों मकान मालिकों और किरायेदारों को प्रभावित कर सकता है।
सरकार के लिए भी बड़ा झटका
यूपी सरकार ने मकान मालिक और किरायेदारों के विवादों को आसान बनाने के उद्देश्य से वर्ष 2021 में नया कानून बनाया था। लेकिन हाईकोर्ट के फैसले से सरकार को बड़ा झटका लगा है।
अब सरकार चाहे तो इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकती है या कानून में जरूरी बदलाव कर सकती है।
आने वाले समय में क्या होगा?
फिलहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उत्तर प्रदेश में किरायेदारी व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे साफ हो गया है कि राज्य सरकार द्वारा बनाया गया कानून केंद्रीय कानूनों और संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप होना जरूरी है।
मकान मालिक और किरायेदार दोनों की नजर अब आगे की कानूनी प्रक्रिया पर रहेगी। आने वाले दिनों में इस फैसले के आधार पर प्रदेश में किरायेदारी विवादों के निपटारे का तरीका तय होगा।
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