उत्तर प्रदेश

KGMU में धर्मांतरण के आरोपों पर बड़ा खुलासा, व्हाट्सऐप ग्रुप से चल रहा था कथित नेटवर्क

Kavita2
3 Nov 2026 9:16 AM IST
KGMU में धर्मांतरण के आरोपों पर बड़ा खुलासा, व्हाट्सऐप ग्रुप से चल रहा था कथित नेटवर्क
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) में कथित धर्मांतरण और महिला डॉक्टरों के उत्पीड़न से जुड़े मामले में लगातार नए तथ्य सामने आ रहे हैं। विशेष कार्यबल (STF) की जांच के आधार पर सामने आई मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि विश्वविद्यालय परिसर में एक व्हाट्सऐप ग्रुप के जरिए कथित धर्मांतरण संबंधी गतिविधियों का नेटवर्क संचालित किया जा रहा था। इस नेटवर्क से जुड़े लोगों पर बाहरी धार्मिक वक्ताओं को हॉस्टल में बुलाने और बैठकों के माध्यम से गतिविधियों की योजना बनाने के आरोप हैं। मामले की जांच का दायरा अब केजीएमयू से आगे बढ़कर संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (PGI) और अन्य चिकित्सा संस्थानों तक पहुंचने की खबर है। हालांकि, इन आरोपों की अंतिम न्यायिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, जांच में 'इस्लामिक मेडिकोज' नामक एक व्हाट्सऐप ग्रुप का उल्लेख सामने आया है। आरोप है कि इस ग्रुप में कुछ डॉक्टर, जूनियर रेजिडेंट, मेडिकल कर्मचारी और बाहरी लोग जुड़े हुए थे। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि ग्रुप में किस प्रकार की बातचीत होती थी और क्या उसका इस्तेमाल किसी गैरकानूनी गतिविधि के लिए किया गया था।

रिपोर्टों में दावा किया गया है कि आगरा, देवबंद, बरेली और अन्य स्थानों से कुछ धार्मिक वक्ताओं को मुलाकात के बहाने हॉस्टल परिसर में बुलाया जाता था। वहां कथित तौर पर धार्मिक तकरीरें होती थीं। आरोप है कि इन मुलाकातों के बाद कुछ लोग धर्मांतरण से संबंधित गतिविधियों पर चर्चा करते थे। हालांकि, इन बैठकों का वास्तविक उद्देश्य, उनमें शामिल लोगों की भूमिका और किसी आपराधिक साजिश से उनका संबंध जांच का विषय है।

इस पूरे प्रकरण में डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित लोगों के बीच सामान्य फोन कॉल के अतिरिक्त व्हाट्सऐप और फेसटाइम कॉल का इस्तेमाल किए जाने की जानकारी सामने आई है। जांच में यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि इन डिजिटल संपर्कों के जरिए क्या जानकारियां साझा की जाती थीं और क्या उनका संबंध महिला डॉक्टरों की ओर से लगाए गए आरोपों से था।

मामले की शुरुआत दिसंबर 2025 में एक महिला रेजिडेंट डॉक्टर की शिकायत के बाद हुई थी। महिला डॉक्टर ने उत्पीड़न और धर्म परिवर्तन का दबाव बनाए जाने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। शिकायत के बाद प्रकरण की जांच शुरू हुई और बाद में इसकी जिम्मेदारी एसटीएफ को सौंपी गई। जांच के दौरान विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों से जुड़े कुछ डॉक्टरों और कर्मचारियों की भूमिका सवालों के घेरे में आई।

बताया जा रहा है कि एसटीएफ ने कई महीनों तक मामले से संबंधित तथ्यों, शिकायतों और अन्य उपलब्ध जानकारियों की पड़ताल की। इसके बाद तैयार रिपोर्ट में कुछ डॉक्टरों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच करने तथा आवश्यक कार्रवाई की सिफारिश किए जाने की जानकारी सामने आई है।

इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कुछ शिकायतों को समय रहते गंभीरता से नहीं लेने और विभागीय स्तर पर पर्याप्त कदम नहीं उठाने के आरोप सामने आए हैं। अब यह जांच का विषय है कि शिकायत मिलने के बाद संबंधित अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया गया या नहीं।

केजीएमयू से जुड़े इस मामले की जांच का दायरा अन्य चिकित्सा संस्थानों तक बढ़ने की खबर ने भी हलचल तेज कर दी है। पीजीआई से संबंधित कुछ संपर्कों और संभावित संबंधों की पड़ताल की बात सामने आई है। हालांकि, किसी दूसरे संस्थान का नाम जांच में आने मात्र से वहां के डॉक्टरों या कर्मचारियों की आपराधिक संलिप्तता सिद्ध नहीं होती। जांच एजेंसियों को प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका स्वतंत्र साक्ष्यों के आधार पर निर्धारित करनी होगी।

इस बीच केजीएमयू प्रशासन भी मामले में आगे की कार्रवाई की तैयारी कर रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, जांच में नाम सामने आने वाले 13 डॉक्टरों के संबंध में अनुशासनात्मक कार्रवाई पर विचार किया जा रहा है। विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की आपात बैठक 6 नवंबर को प्रस्तावित है। इस बैठक में संबंधित डॉक्टरों के विरुद्ध जांच समिति गठित करने और प्रशासनिक जिम्मेदारियों से हटाने जैसे प्रस्तावों पर निर्णय लिया जा सकता है।

उत्तर प्रदेश शासन ने भी मामले को गंभीरता से लिया है। एसटीएफ की रिपोर्ट के आधार पर चिकित्सा शिक्षा विभाग की ओर से केजीएमयू प्रशासन को संबंधित कर्मचारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई करने और इसकी रिपोर्ट उपलब्ध कराने के निर्देश दिए जाने की जानकारी है। इससे स्पष्ट है कि मामले की जांच केवल आपराधिक आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्थान की प्रशासनिक जवाबदेही भी जांच के दायरे में है।

किसी भी चिकित्सा विश्वविद्यालय में पढ़ने और काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा, शिकायतों की निष्पक्ष सुनवाई तथा संस्थागत अनुशासन बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में यह मामला केवल धर्मांतरण के आरोपों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि महिला सुरक्षा और विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी से भी जुड़ गया है।

फिलहाल जांच एजेंसियां कथित व्हाट्सऐप नेटवर्क, बाहरी संपर्कों और संबंधित व्यक्तियों की भूमिकाओं की पड़ताल कर रही हैं। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट पर होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई और 6 नवंबर की कार्यपरिषद बैठक महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। आरोपों की वास्तविकता और किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण जांच में प्राप्त प्रमाणों तथा न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।

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