- Home
- /
- राज्य
- /
- उत्तर प्रदेश
- /
- रमाकांत यादव को हाई...
उत्तर प्रदेश
रमाकांत यादव को हाई कोर्ट से बड़ी राहत, छात्र मौत केस रद्द
nidhi
11 Oct 2026 8:29 AM IST

x
छात्र की मौत से जुड़े केस में कार्रवाई खत्म
उत्तर प्रदेश : उपलब्ध अदालती आदेश के अनुसार, यह मामला जौनपुर में दसवीं के छात्र आयुष कुमार सरोज की मौत से जुड़ा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 7 अक्टूबर 2026 को रमाकांत यादव के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। महत्वपूर्ण बात यह है कि आदेश में रमाकांत यादव को स्कूल का शिक्षक बताया गया है, न कि सपा विधायक। इसलिए खबर में विधायक वाली पहचान जोड़ने से पहले इसकी पुष्टि जरूरी है।
छात्र की मौत मामले में रमाकांत यादव को हाई कोर्ट से राहत, आपराधिक कार्यवाही रद्द
उत्तर प्रदेश के जौनपुर में दसवीं के छात्र की मौत से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रमाकांत यादव को बड़ी राहत दी है। अदालत ने उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 304 और अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने 7 अक्टूबर 2026 को यह आदेश पारित किया। अदालत ने कहा कि मामले में उपलब्ध सामग्री आरोपी के खिलाफ अभियोजन जारी रखने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय नहीं है।
2023 में हुई थी दसवीं के छात्र की मौत
अदालती आदेश के अनुसार, मामला जौनपुर जिले के मीरगंज थाना क्षेत्र के कंचन बालिका इंटर कॉलेज, बंधवा बाजार, रामगढ़ से जुड़ा है। दसवीं कक्षा में पढ़ने वाले आयुष कुमार सरोज 9 सितंबर 2023 को साइकिल से स्कूल गए थे। उसी दिन दोपहर करीब 3:49 बजे उनके पिता हीरालाल सरोज को सूचना मिली कि उनका बेटा सीढ़ियों से गिरकर बेहोश हो गया है। पिता मौके पर पहुंचे तो आयुष एक तख्त पर पड़े मिले। इसके बाद उन्हें मछलीशहर में डॉक्टर अशोक पटेल के पास ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। पिता को यह जानकारी भी मिली थी कि आयुष को करीब एक घंटे तक धूप में खड़ा रखा गया था। इसके आधार पर उन्होंने स्कूल के कर्मचारियों और प्रधानाचार्य की भूमिका पर संदेह जताया था।
रमाकांत यादव के खिलाफ दर्ज हुआ था मामला
इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 304 और एससी-एसटी अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल हुआ और 29 नवंबर 2023 को विशेष न्यायाधीश, एससी-एसटी अधिनियम, जौनपुर ने रमाकांत यादव को तलब करने का आदेश दिया था।
रमाकांत यादव ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी। उनकी ओर से दलील दी गई कि उन्हें मामले में झूठा फंसाया गया है और घटना में उनकी कोई स्पष्ट भूमिका नहीं बताई गई। उन्होंने यह भी कहा कि जांच के दौरान ऐसा कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं मिला, जिससे उनके खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया साबित हो सकें। राज्य सरकार की ओर से अपील का विरोध किया गया। सरकारी पक्ष का तर्क था कि निचली अदालत ने प्राथमिकी, आरोपपत्र और जांच के दौरान एकत्र सामग्री पर विचार करने के बाद समन जारी किया था। इसलिए अभियोजन को आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए।
घटनास्थल और गवाहों के बयानों पर उठे सवाल
हाई कोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए घटनास्थल के नक्शे और गवाहों के बयानों में सामने आई विसंगतियों पर ध्यान दिया। अदालत के अनुसार, जांच के दौरान तैयार नक्शे में घटना का स्थान स्पष्ट रूप से संबंधित कॉलेज के परिसर में नहीं दर्शाया गया था। इससे अभियोजन की कहानी को लेकर संदेह पैदा हुआ।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि आयुष के पिता घटना के प्रत्यक्षदर्शी नहीं थे। उन्हें बेटे के घायल होने और मौत की जानकारी दूसरे व्यक्ति से मिली थी। इसलिए उनके बयान में घटना के संबंध में प्रत्यक्ष जानकारी नहीं थी। जांच के दौरान दर्ज स्थानीय गवाहों के बयानों में कहा गया कि आयुष स्कूल से साइकिल पर घर लौट रहे थे और घर से कुछ दूरी पर गिर गए थे। इसके बाद उन्हें घर के सामने एक तख्त पर लिटाया गया था। अदालत ने इन बयानों, घटनास्थल के नक्शे और अन्य सामग्री को देखते हुए दुर्घटनावश गिरने की संभावना पर भी विचार किया।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आई थी सिर की चोट
अदालती आदेश में पोस्टमार्टम रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, आयुष के सिर के दाहिने हिस्से में चोट थी और मौत का कारण मृत्यु से पहले लगी सिर की चोट बताया गया था। रिपोर्ट में अन्य चोटों का उल्लेख नहीं था।
अदालत ने यह भी कहा कि जांच के दौरान ऐसा विश्वसनीय प्रत्यक्ष साक्ष्य सामने नहीं आया, जो यह स्थापित कर सके कि रमाकांत यादव ने किस समय, किस स्थान पर और किस तरह आयुष को चोट पहुंचाई थी। जांच में उनकी प्रधानाचार्य के रूप में नियुक्ति का भी ठोस प्रमाण नहीं मिला था; रिकॉर्ड में उन्हें शिक्षक बताया गया था। इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय आधार नहीं था।
एससी-एसटी एक्ट के इस्तेमाल पर अदालत की टिप्पणी
हाई कोर्ट ने एससी-एसटी अधिनियम की धारा 3(2)(v) के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का उल्लेख किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल पीड़ित के अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से होने भर से इस प्रावधान के तहत अपराध नहीं बन जाता। संबंधित अपराध का पीड़ित की जाति के आधार पर किया जाना भी आवश्यक है। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसी आवश्यक परिस्थितियों को स्थापित करने वाली पर्याप्त सामग्री नहीं थी। इस आधार पर भी संबंधित कानूनी प्रावधान के तहत कार्यवाही जारी रखने का औचित्य नहीं पाया गया।
हाई कोर्ट ने समन आदेश किया निरस्त
सभी तथ्यों, गवाहों के बयानों, मेडिकल रिपोर्ट और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने रमाकांत यादव की अपील स्वीकार कर ली। अदालत ने 29 नवंबर 2023 के समन आदेश और संबंधित आरोपपत्र को निरस्त करते हुए उनके खिलाफ धारा 304 तथा एससी-एसटी अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत आगे चल रही कार्यवाही रद्द कर दी। यह राहत मामले के उपलब्ध रिकॉर्ड और संबंधित आरोपी के खिलाफ कार्यवाही तक सीमित है। इस आदेश में रमाकांत यादव की पहचान स्कूल के शिक्षक के रूप में दर्ज है। इसे सपा विधायक रमाकांत यादव से जोड़ने की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
Next Story





