उत्तर प्रदेश

सांसद चंद्रशेखर मामले में बड़ा फैसला, आरोपी की डिस्चार्ज अर्जी ठुकराई

Ratna Netam
24 July 2026 10:01 PM IST
सांसद चंद्रशेखर मामले में बड़ा फैसला, आरोपी की डिस्चार्ज अर्जी ठुकराई
x

प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सांसद चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ कथित आपत्तिजनक और जातिसूचक टिप्पणी से जुड़े फेसबुक पोस्ट मामले में आरोपी चंद्र प्रकाश सिंह उर्फ गोली ठाकुर को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने आरोपी की ओर से दाखिल आपराधिक अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संतोष राय की पीठ ने की। हाईकोर्ट ने हमीरपुर की विशेष एससी/एसटी अदालत द्वारा आरोपी की डिस्चार्ज (मुक्ति) अर्जी खारिज किए जाने के आदेश को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी को इस स्तर पर आरोपों से मुक्त नहीं किया जा सकता।

यह मामला हमीरपुर जिले के सुमेरपुर थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि आरोपी चंद्र प्रकाश सिंह उर्फ गोली ठाकुर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर सांसद चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ आपत्तिजनक और जातिसूचक टिप्पणी से संबंधित पोस्ट की थी। शिकायत के आधार पर पुलिस ने आरोपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था।

पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 352, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(ध) के तहत कार्रवाई की थी।

मामले में आरोपी ने निचली अदालत में डिस्चार्ज अर्जी दाखिल कर खुद को आरोपों से मुक्त किए जाने की मांग की थी। आरोपी का पक्ष था कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों के आधार पर मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं है। हालांकि, हमीरपुर की विशेष एससी/एसटी अदालत ने 24 जून 2026 को आरोपी की डिस्चार्ज अर्जी को खारिज कर दिया था।

इसके बाद आरोपी ने निचली अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल की थी। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष ने डिस्चार्ज किए जाने की मांग दोहराई, लेकिन अदालत ने मामले के तथ्यों और रिकॉर्ड में उपलब्ध सामग्री को देखते हुए राहत देने से इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में विशेष अदालत के फैसले को उचित मानते हुए कहा कि इस स्तर पर मामले की विस्तृत सुनवाई और साक्ष्यों के परीक्षण की आवश्यकता है। इसलिए आरोपी को मुकदमे से पहले ही मुक्त करना उचित नहीं होगा। इसके साथ ही अदालत ने आरोपी की अपील खारिज कर दी।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, डिस्चार्ज अर्जी का उद्देश्य यह देखना होता है कि क्या आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मुकदमा चलाने योग्य सामग्री मौजूद है या नहीं। यदि अदालत को लगता है कि आरोपों के आधार पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया आवश्यक है तो वह डिस्चार्ज अर्जी को खारिज कर सकती है।

इस मामले में हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब आरोपी के खिलाफ निचली अदालत में आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। पुलिस द्वारा दर्ज मुकदमे में लगाए गए आरोपों पर अब ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर विचार किया जाएगा।

सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणियों और पोस्ट को लेकर पिछले कुछ वर्षों में कई कानूनी मामले सामने आए हैं। अदालतें ऐसे मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून द्वारा तय सीमाओं के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर देती रही हैं। इस मामले में भी आगे की सुनवाई के दौरान सभी पक्षों की दलीलों और साक्ष्यों पर विचार किया जाएगा।

Next Story