उत्तर प्रदेश

इलाहाबाद विश्वविद्यालय का बड़ा फैसला, प्रोफेसरों के प्राइवेट ट्यूशन पर रोक

Ratna Netam
3 Aug 2026 2:15 PM IST
इलाहाबाद विश्वविद्यालय का बड़ा फैसला, प्रोफेसरों के प्राइवेट ट्यूशन पर रोक
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प्रयागराज : इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) प्रशासन ने शिक्षकों की निजी कोचिंग संस्थानों और व्यक्तिगत ट्यूशन से जुड़ी गतिविधियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य शिक्षकों की शैक्षणिक जिम्मेदारी को मजबूत करना और विश्वविद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाना है। इस संबंध में विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार की ओर से 31 जुलाई को एक आधिकारिक नोटिस जारी किया गया है।

जारी आदेश के अनुसार इलाहाबाद विश्वविद्यालय और उसके सभी संघटक महाविद्यालयों में कार्यरत कोई भी शिक्षक अब प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी निजी कोचिंग संस्थान में अध्यापन कार्य नहीं कर सकेगा। इसके अलावा शिक्षक निजी ट्यूशन देने या उससे जुड़ी किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं हो पाएंगे। यह प्रतिबंध केवल ऑफलाइन माध्यम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए पढ़ाने पर भी समान रूप से लागू होगा।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि शिक्षकों को अपने संस्थान के प्रति पूरी निष्ठा और जिम्मेदारी के साथ कार्य करना होगा। निजी कोचिंग या ट्यूशन में शामिल होने से कई बार हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है, जिससे विश्वविद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसी को देखते हुए प्रशासन ने यह निर्णय लिया है।

रजिस्ट्रार की ओर से जारी आदेश में सभी विभागाध्यक्षों, केंद्रों के निदेशकों और समन्वयकों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने-अपने विभागों और केंद्रों में कार्यरत शिक्षकों से इस संबंध में संयुक्त शपथपत्र यानी अंडरटेकिंग प्राप्त करें। इन शपथपत्रों को एकत्र कर कुलसचिव कार्यालय में जमा करना होगा।

इसी तरह विश्वविद्यालय के सभी संघटक महाविद्यालयों के प्राचार्यों को भी निर्देश दिया गया है कि वे अपने यहां कार्यरत शिक्षकों से संयुक्त शपथपत्र लेकर डीन, कॉलेज डेवलपमेंट के माध्यम से कुलसचिव कार्यालय को उपलब्ध कराएं। प्रशासन ने इस प्रक्रिया को अनिवार्य बताया है और सभी संबंधित अधिकारियों को समय पर कार्रवाई पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं।

विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि शिक्षकों के निजी शिक्षण कार्यों पर रोक लगाने से शिक्षक अपना अधिक समय और ऊर्जा विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा देने में लगा सकेंगे। इससे कक्षाओं में नियमित उपस्थिति बढ़ेगी और छात्रों को संस्थान के भीतर ही बेहतर शैक्षणिक माहौल मिलेगा।

वहीं दूसरी ओर उच्च शिक्षा विभाग में शिक्षकों की नियुक्ति और सेवा विस्तार से जुड़े मामलों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। राजकीय महाविद्यालय हरीपुर निहस्था, रायबरेली के पूर्व प्राचार्य डॉ. चन्द्र प्रकाश के मामले में सत्रलाभ दिए जाने को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

डॉ. चन्द्र प्रकाश 26 जुलाई को प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए थे। इसके बाद उन्हें शिक्षक के रूप में लगभग 11 महीने का सत्रलाभ प्रदान किया गया है। इस अवधि में उन्हें करीब 35 लाख रुपये से अधिक वेतन भुगतान होने का अनुमान है। हालांकि इस मामले में विषय की मान्यता को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।

बताया जा रहा है कि संबंधित महाविद्यालय में प्राचीन इतिहास विषय की अनुमन्यता नहीं है और वहां इतिहास विषय की पढ़ाई कराई जाती है। नियमों के अनुसार प्राचीन इतिहास और इतिहास विषय के शिक्षकों की नियुक्ति अलग-अलग होती है। इसी वजह से यह सवाल उठाया जा रहा है कि प्राचीन इतिहास के शिक्षक को इतिहास विषय पढ़ाने की अनुमति कैसे दी जा सकती है।

उच्च शिक्षा निदेशालय की ओर से उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग को भेजे गए असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती के 2107 पदों के अधियाचन में भी इतिहास और प्राचीन इतिहास के पद अलग-अलग रखे गए हैं। इसमें इतिहास के 60 पद और प्राचीन इतिहास के 25 पद शामिल हैं।

डॉ. चन्द्र प्रकाश मई तक विंध्याचल मंडल के क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी के पद पर तैनात थे। इसके बाद उनका तबादला रायबरेली किया गया। उच्च शिक्षा निदेशक मोनिका सिंह की ओर से 30 जुलाई को उन्हें सत्रलाभ स्वीकृत करने का आदेश जारी किया गया। इसके बाद उन्होंने प्राचार्य का प्रभार महाविद्यालय के वरिष्ठतम प्राध्यापक डॉ. दिनेश कुमार को सौंप दिया।

अब डॉ. चन्द्र प्रकाश शिक्षक के रूप में विद्यार्थियों को पढ़ाएंगे। इस पूरे मामले पर डॉ. चन्द्र प्रकाश का कहना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के प्रावधानों के तहत प्राचीन इतिहास विषय के शिक्षक इतिहास विषय पढ़ा सकते हैं।

फिलहाल इलाहाबाद विश्वविद्यालय में निजी कोचिंग और ट्यूशन पर रोक लगाने का फैसला शिक्षकों की जवाबदेही तय करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, जबकि उच्च शिक्षा विभाग में सत्रलाभ और विषय विशेषज्ञता को लेकर उठे सवालों पर आगे की स्थिति प्रशासनिक निर्णयों पर निर्भर करेगी।

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