उत्तर प्रदेश

Lucknow: बसपा से सपा तक, सिद्दीकी की सियासी यात्रा

Admindelhi1
16 Feb 2026 1:28 PM IST
Lucknow: बसपा से सपा तक, सिद्दीकी की सियासी यात्रा
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में पूर्व कैबिनेट मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के समाजवादी पार्टी में शामिल होने के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि क्या उन्होंने यह कदम पूरी राजनीतिक सहमति के साथ उठाया या परिस्थितियों के दबाव में? राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि सपा में आने से पहले वे दो अन्य दलों में अपनी संभावनाएं तलाश रहे थे, लेकिन वहां बात नहीं बन सकी।

कांग्रेस छोड़ने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने सबसे पहले बहुजन समाज पार्टी में वापसी की कोशिशें कीं। बसपा सरकार में वे बेहद प्रभावशाली मंत्री रहे थे और पार्टी सुप्रीमो मायावती के करीबी माने जाते थे। उन्हें एक दर्जन से अधिक महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी मिली थी, जिसके चलते उन्हें ‘मिनी मुख्यमंत्री’ तक कहा जाता था। हालांकि 2012 के बाद पार्टी छोड़ते समय मायावती से जुड़ी ऑडियो सार्वजनिक करने के बाद उनके रिश्तों में आई तल्खी ने वापसी के रास्ते लगभग बंद कर दिए। सूत्रों के अनुसार, उन्होंने पुराने सहयोगियों के जरिए संपर्क साधा और सार्वजनिक मंचों से मायावती की प्रशंसा भी की, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने हरी झंडी नहीं दी।

बसपा में रास्ता बंद होता देख उन्होंने आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) की ओर रुख किया। बताया जाता है कि उन्होंने पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद से भी संपर्क साधा, लेकिन वहां भी राजनीतिक समीकरण अनुकूल नहीं बने। ऐसे में अंततः उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया, जहां पार्टी अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उन्हें औपचारिक रूप से सदस्यता दिलाई।

नसीमुद्दीन सिद्दीकी का प्रदेश की मुस्लिम राजनीति में खासा प्रभाव माना जाता रहा है। बसपा कार्यकाल के दौरान वे विधानसभा में अक्सर आजम खां पर हमलावर रहते थे, जिससे मुस्लिम वोट बैंक में अपनी पकड़ बनाए रख सकें। यही वजह है कि उनके सपा में आने को मुस्लिम समीकरणों के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

सपा में शामिल होते समय नसीमुद्दीन ने दावा किया कि 15,718 समर्थक विभिन्न दलों को छोड़कर उनके साथ आए हैं और 2027 में उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार बनाना उनका लक्ष्य है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी यह एंट्री पूरी तरह सहज नहीं दिखती, बल्कि विकल्प सीमित होने के बाद लिया गया निर्णय अधिक प्रतीत होता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा संगठन में उन्हें कितनी सक्रिय भूमिका मिलती है और वे पार्टी की रणनीति में कितना प्रभावी स्थान बना पाते हैं।

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