- Home
- /
- राज्य
- /
- उत्तर प्रदेश
- /
- Lucknow: अखिलेश यादव...
Lucknow: अखिलेश यादव का भगवा फोटोशूट, नववर्ष पर राजनीति का नया सेंटर

लखनऊ: समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एक बार फिर अपने बदले हुए राजनीतिक अंदाज़ को लेकर सुर्खियों में हैं। भगवा नववर्ष के अवसर पर संतों के साथ कराए गए फोटो सेशन ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। लंबे समय तक सेक्युलर राजनीति और पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) विमर्श के लिए पहचाने जाने वाले अखिलेश यादव का संत समाज के साथ इस तरह सामने आना, सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
नववर्ष के मौके पर अखिलेश यादव भगवा रंग में संतों के बीच नजर आए। मुस्कुराते हुए, धार्मिक वातावरण में खिंचवाई गई तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। समर्थक इसे “सांस्कृतिक सम्मान” और “समाज के हर वर्ग से संवाद” बता रहे हैं, वहीं राजनीतिक विरोधी इसे भाजपा के कोर वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम सिर्फ एक फोटो सेशन नहीं, बल्कि 2027 की तैयारी का संकेत है। बीते कुछ समय से अखिलेश यादव मंदिर दर्शन, धार्मिक आयोजनों में सहभागिता और हिंदू प्रतीकों के प्रयोग के जरिए यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि समाजवादी पार्टी किसी एक वर्ग की नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता चाहती है।
सपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना है, “अखिलेश यादव हमेशा से सांस्कृतिक मूल्यों के सम्मान की बात करते रहे हैं। संतों से मिलना या धार्मिक नववर्ष पर शुभकामनाएं देना कोई नई बात नहीं, लेकिन विपक्ष इसे जानबूझकर राजनीतिक रंग दे रहा है।”
वहीं भाजपा नेताओं ने इस कदम पर तंज कसते हुए कहा कि सपा अब “सॉफ्ट हिंदुत्व” की राह पर चल पड़ी है। उनका आरोप है कि जब जमीन खिसकती दिखती है, तब विपक्ष को भी भगवा याद आने लगता है। भाजपा नेताओं का कहना है कि जनता असली और नकली आस्था में फर्क करना जानती है।
सोशल मीडिया पर इस तस्वीर को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे सकारात्मक बदलाव बता रहे हैं, तो कुछ इसे सियासी मजबूरी। खासकर युवा वोटर्स के बीच यह चर्चा तेज है कि क्या यह सपा की नई राजनीतिक लाइन है या सिर्फ एक अवसर विशेष का दृश्य।
कुल मिलाकर, भगवा नववर्ष पर संतों के साथ अखिलेश यादव का फोटो सेशन केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा। इसने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया सवाल खड़ा कर दिया है—क्या सपा अपनी पारंपरिक राजनीति से आगे बढ़कर नए सामाजिक समीकरण गढ़ रही है, या यह केवल चुनावी मौसम से पहले की एक सोची-समझी रणनीति है?
आने वाले दिनों में अखिलेश यादव के कदम और बयान इस तस्वीर के मायने और साफ करेंगे।





