उत्तर प्रदेश

गारंटर के वेतन से भी लोन वसूली वैध हाईकोर्ट

Ratna Netam
12 Aug 2026 2:00 PM IST
गारंटर के वेतन से भी लोन वसूली वैध हाईकोर्ट
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लखनऊ : लोन की वसूली को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि बैंक के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह पहले मुख्य कर्जदार से बकाया रकम वसूलने का प्रयास करे और उसके असफल होने के बाद ही गारंटर के खिलाफ कार्रवाई शुरू करे। अदालत ने कहा कि भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 128 के तहत गारंटर की देनदारी मुख्य कर्जदार के बराबर होती है। इसलिए बैंक परिस्थितियों के अनुसार मुख्य कर्जदार और गारंटर दोनों के खिलाफ एक साथ वसूली की कार्रवाई कर सकता है।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति एके चौधरी की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी विनीत पांडेय और अनूप कुमार मिश्रा की ओर से दाखिल दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए की। दोनों याचियों ने अपने सहकर्मी विक्रांत दूबे द्वारा लिए गए विभिन्न ऋणों में गारंटर की भूमिका निभाई थी। लोन की अदायगी में चूक होने के बाद बैंक ने गारंटरों के खिलाफ भी वसूली की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। इसी कार्रवाई को चुनौती देते हुए दोनों गारंटर हाईकोर्ट पहुंचे थे।
मामला यूपी पोस्टल प्राइमरी कोऑपरेटिव बैंक से जुड़े ऋण का था। अदालत के समक्ष रखे गए तथ्यों के अनुसार विक्रांत दूबे ने वित्तीय वर्ष 2022-23 में बैंक से अलग-अलग मदों में ऋण लिया था। इसमें 50 हजार रुपये का फेस्टिवल लोन, तीन लाख रुपये का शॉर्ट टर्म लोन और 18 लाख रुपये का पर्सनल लोन शामिल था। ऋण की निर्धारित किस्तों और बकाया राशि का भुगतान समय पर नहीं होने के बाद बैंक ने वसूली की कार्रवाई शुरू की।
बैंक ने डाक विभाग को पत्र भेजकर दोनों गारंटरों के वेतन से हर महीने 10-10 हजार रुपये काटकर बैंक में जमा करने को कहा। इसके बाद गारंटरों ने इस कार्रवाई पर आपत्ति जताई और अदालत का दरवाजा खटखटाया। उनका तर्क था कि बैंक को सबसे पहले मुख्य कर्जदार से बकाया रकम की वसूली करनी चाहिए। उनका कहना था कि यदि मुख्य कर्जदार से पूरी रकम या बकाया राशि वसूल नहीं हो पाती है, तभी गारंटर से वसूली की जा सकती है। उन्होंने कर्जदार और गारंटर दोनों से एक साथ वसूली की कार्रवाई को कानून के विपरीत बताया।
हाईकोर्ट ने गारंटरों की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 128 का उल्लेख करते हुए कहा कि सामान्य स्थिति में गारंटर की देनदारी मुख्य कर्जदार के बराबर होती है। हालांकि, यदि गारंटी अनुबंध में कोई ऐसी विशेष शर्त मौजूद हो, जो गारंटर की जिम्मेदारी को सीमित करती हो या यह तय करती हो कि पहले मुख्य कर्जदार से वसूली की जाएगी, तो स्थिति अलग हो सकती है। लेकिन इस मामले में संबंधित गारंटी अनुबंध में ऐसी कोई शर्त नहीं थी।
खंडपीठ ने साफ किया कि बैंक के लिए मुख्य कर्जदार के खिलाफ पहले कार्रवाई करना और उसके बाद ही गारंटर के पास जाना अनिवार्य नहीं है। गारंटर की जिम्मेदारी केवल इस आधार पर टाली नहीं जा सकती कि मुख्य कर्जदार से अभी वसूली की कोशिश बाकी है। अदालत के अनुसार बैंक को कानून के तहत उपलब्ध अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए कर्जदार और गारंटर दोनों के खिलाफ वसूली की कार्रवाई करने का अधिकार है।
अदालत ने यह भी माना कि गारंटरों के वेतन से प्रतिमाह 10 हजार रुपये की कटौती कर बैंक में जमा करने की कार्रवाई को केवल इस आधार पर अवैध नहीं कहा जा सकता कि मुख्य कर्जदार से पहले वसूली नहीं की गई। चूंकि गारंटी अनुबंध में गारंटर की देनदारी को बाद के चरण तक सीमित करने वाली कोई शर्त नहीं थी, इसलिए बैंक की कार्रवाई में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं बनता। इसी के साथ हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं को खारिज कर दिया।
फैसले में अदालत ने गारंटर के अधिकार को भी स्पष्ट किया। यदि कोई गारंटर बैंक का बकाया चुकाता है, तो वह बाद में मुख्य कर्जदार से उस रकम की वसूली का दावा कर सकता है। यानी बैंक के प्रति गारंटर की जिम्मेदारी और मुख्य कर्जदार से गारंटर की वसूली का अधिकार अलग-अलग कानूनी पहलू हैं। गारंटर द्वारा बैंक को भुगतान करने के बाद वह मुख्य कर्जदार के खिलाफ रकम वापस पाने की कानूनी कार्रवाई कर सकता है। लेकिन इस अधिकार के कारण बैंक की मूल वसूली प्रक्रिया पर रोक नहीं लगती।
यह फैसला उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो किसी मित्र, रिश्तेदार या सहकर्मी के लोन में गारंटर बनने पर विचार करते हैं। गारंटर बनने का अर्थ केवल औपचारिकता पूरी करना नहीं है। यदि मुख्य कर्जदार ऋण चुकाने में विफल रहता है, तो बैंक गारंटर से भी बकाया रकम की वसूली कर सकता है। इसलिए किसी भी ऋण के लिए गारंटर बनने से पहले गारंटी अनुबंध की शर्तों को ध्यान से समझना जरूरी है।
इस मामले से जुड़ा दूसरा महत्वपूर्ण आदेश भी सामने आया है। हाईकोर्ट ने एक ऐसे युगल की याचिका खारिज करते हुए एक लाख रुपये का हर्जाना लगाया, जिसने अदालत से संरक्षण मांगते समय महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा नहीं किया था। न्यायमूर्ति रजनीश कुमार और न्यायमूर्ति बबीता रानी की खंडपीठ ने पाया कि याचियों ने खुद को बालिग बताते हुए साथ रहने और विवाह करने की इच्छा जताई थी, लेकिन बाद में यह तथ्य सामने आया कि पुरुष याची पहले से विवाहित था और उसने तलाक का मुकदमा दायर कर रखा था।
अदालत ने इस तथ्य को पहले छिपाने को गंभीरता से लिया और कहा कि न्याय पाने के लिए अदालत के सामने सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा करना आवश्यक है। महत्वपूर्ण जानकारी छिपाकर संरक्षण की मांग करना न्यायिक प्रक्रिया के साथ उचित व्यवहार नहीं है। इसी आधार पर याचिका खारिज करने के साथ अदालत ने युगल पर एक लाख रुपये का हर्जाना भी लगाया।
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