उत्तर प्रदेश

लखनऊ के छह गांवों में जमीन घोटाला 10 अधिकारियों पर कार्रवाई तय

Ratna Netam
13 Aug 2026 4:56 PM IST
लखनऊ के छह गांवों में जमीन घोटाला 10 अधिकारियों पर कार्रवाई तय
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लखनऊ : राजधानी लखनऊ के जानकीपुरम समेत आसपास के क्षेत्रों में चारागाह, बंजर और अन्य सुरक्षित श्रेणी की करीब 120 बीघा सरकारी जमीन हड़पने की कथित कोशिश का बड़ा मामला सामने आया है। इस जमीन की अनुमानित कीमत दो हजार करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है। जिलाधिकारी की ओर से कराई गई जांच के बाद पूरे मामले की रिपोर्ट शासन को भेज दी गई है। जांच में प्रथम दृष्टया दोषी पाए गए चकबंदी विभाग के दस पूर्व अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति भी की गई है।
मामले में कथित भूमाफिया के चार सहयोगियों रामेंद्र कुमार, अमित कुमार, सुनील कुमार और लईक खां के खिलाफ जानकीपुरम थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई है। चकबंदीकर्ता नरेंद्र कुमार की शिकायत पर आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी, कूटरचित दस्तावेज तैयार करने और उनका इस्तेमाल करने समेत संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है।
छह गांवों की 120 बीघा जमीन का मामला
जांच के अनुसार देवा रोड, बख्शी का तालाब, इंदिरानगर और जानकीपुरम क्षेत्र के छह गांवों में स्थित लगभग 120 बीघा सरकारी जमीन को कथित रूप से निजी नामों पर दर्ज कराने का प्रयास किया गया। जमीन चारागाह, बंजर और दूसरी सुरक्षित सरकारी श्रेणियों में दर्ज थी।
आरोप है कि भूमाफिया ने चकबंदी विभाग के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ मिलीभगत कर फर्जी आदेश तैयार कराए। इन आदेशों के आधार पर सरकारी जमीन पर कब्जा किया गया और उसका कुछ हिस्सा बेच भी दिया गया। पुलिस और विभागीय जांच में वर्ष 1988 से अब तक संबंधित स्थानों पर तैनात रहे अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की पड़ताल की जा रही है।
वर्ष 1988 में तैयार हुए कथित फर्जी आदेश
विभागीय रिपोर्ट के मुताबिक, जमीन घोटाले की शुरुआत वर्ष 1988 में हुई थी। आरोप है कि चकबंदी विभाग के नाम से कूटरचित आदेश तैयार कर सरकारी जमीन पर निजी स्वामित्व का दावा किया गया। इसके बाद कई वर्षों तक संबंधित अधिकारी इन कथित आदेशों को सही मानते हुए भूमाफिया के पक्ष में फैसले देते रहे।
जांच एजेंसियों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर सरकारी जमीन के अभिलेखों में बदलाव अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं था। इसी कारण पुलिस ने चकबंदी विभाग से वर्ष 1988 से अब तक तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों की सूची मांगी है। उन्हें नोटिस भेजकर पूछताछ की जा सकती है।
हाईकोर्ट पहुंचने पर खुला मामला
आरोपियों ने अपने सहयोगियों के माध्यम से जमीन को खतौनी में दर्ज कराने के लिए वर्ष 2020 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रस्तुत आदेशों और दस्तावेजों का सत्यापन कराया। सत्यापन के दौरान दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर संदेह उत्पन्न हुआ।
हाईकोर्ट ने लखनऊ के जिलाधिकारी से संबंधित आदेश का सत्यापन कर हलफनामा दाखिल करने को कहा। इसके बाद वर्ष 2021 में जिलाधिकारी ने पांच सदस्यीय जांच समिति गठित की। शुरुआती जांच के बाद मामला कुछ समय के लिए ठंडे बस्ते में चला गया।
रिपोर्ट में देरी पर शासन को दी गई जानकारी
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान 23 जुलाई 2026 को सरकारी अधिवक्ता ने चकबंदी विभाग से जांच समिति की रिपोर्ट की स्थिति पूछी। जांच में देरी सामने आने पर राजस्व परिषद के अध्यक्ष, मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव न्याय को भी लिखित रूप से इसकी जानकारी दी गई।
इसके बाद जांच में तेजी आई और पांच अगस्त 2026 को रिपोर्ट चकबंदी आयुक्त को सौंप दी गई। रिपोर्ट में चार नामजद आरोपियों की कथित भूमिका के साथ चकबंदी विभाग के दस पूर्व अधिकारियों की जिम्मेदारी भी प्रथम दृष्टया तय की गई। जिलाधिकारी के निर्देश पर पुलिस उपायुक्त उत्तरी अमित कुमार आनंद को तहरीर भेजी गई और जांच के बाद मुकदमा दर्ज किया गया।
साक्ष्यों के आधार पर होगी कार्रवाई
पुलिस उपायुक्त उत्तरी अमित कुमार आनंद ने बताया कि प्राथमिकी दर्ज करने के बाद संबंधित दस्तावेजों की जांच की जा रही है। चकबंदी विभाग से उसकी विस्तृत जांच रिपोर्ट और उस समय तैनात अधिकारियों एवं कर्मचारियों की जानकारी मांगी गई है।
पुलिस संबंधित कर्मचारियों के बयान दर्ज करेगी और सरकारी अभिलेखों, कथित फर्जी आदेशों तथा जमीन की खरीद-बिक्री से जुड़े दस्तावेजों की जांच करेगी। साक्ष्यों के आधार पर नामजद आरोपियों के साथ मिलीभगत में शामिल अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल मामले में लगे आरोपों की विस्तृत जांच जारी है।
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