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Environmental संरक्षण की दिशा में पहल, वैज्ञानिकों ने देखी जैविक खेती की प्रगति

Muzaffarnagar मुजफ्फरनगर : पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता के संवर्धन और टिकाऊ कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मुजफ्फरनगर में कृषि वानिकी और जैविक खेती से जुड़े प्रक्षेत्रों का निरीक्षण किया गया। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) और द इकोनॉमिक्स ऑफ इकोसिस्टम्स एंड बायोडायवर्सिटी (टीईईबी) परियोजना के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने किसानों के साथ संवाद कर पर्यावरण-अनुकूल खेती को भविष्य की जरूरत बताया।
यह कार्यक्रम भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-आईआईएफएसआर), मोदीपुरम और कृषि विज्ञान केंद्र, चित्तौड़ा, मुजफ्फरनगर-द्वितीय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। परियोजना के अंतर्गत ग्राम नंगला कबीर और कासमपुर खोला में स्थापित कृषि वानिकी एवं जैविक खेती के प्रदर्शन क्षेत्रों का विशेषज्ञों की टीम ने विस्तृत निरीक्षण किया।
निरीक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने खेतों में अपनाई जा रही आधुनिक और प्राकृतिक कृषि तकनीकों का मूल्यांकन किया। उन्होंने किसानों से खेती के दौरान आने वाली समस्याओं, उनके अनुभवों और सुझावों के बारे में जानकारी ली। वैज्ञानिकों ने बताया कि कृषि वानिकी और जैविक खेती ऐसी पद्धतियां हैं, जो किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कार्यक्रम के दौरान आईसीएआर के 98वें स्थापना दिवस के अवसर पर कृषि विज्ञान केंद्र, चित्तौड़ा परिसर में विशेष पौधारोपण कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया। इस अवसर पर यूएनईपी-इंडिया की वरिष्ठ नीति सलाहकार डॉ. अलका भार्गव ने पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण और हरित भविष्य का संदेश दिया।
डॉ. अलका भार्गव ने कहा कि कृषि वानिकी और जैविक खेती केवल खेती की नई तकनीक नहीं हैं, बल्कि यह प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का प्रभावी माध्यम भी हैं। इनके माध्यम से जल संरक्षण, भूमि की गुणवत्ता में सुधार और जैव विविधता को बढ़ावा दिया जा सकता है। उन्होंने किसानों से पर्यावरण संतुलन बनाए रखने वाली कृषि पद्धतियों को अपनाने की अपील की।
कार्यक्रम में उप कृषि निदेशक डॉ. प्रमोद सिरोही, भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान मोदीपुरम के परियोजना अन्वेषक एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एम. ए. अंसारी, वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. ए. के. प्रुस्टी, डॉ. रघुवीर सिंह, डॉ. हिमांशु बरगली, डॉ. ऋषभ जग्गी, कृषि विज्ञान केंद्र चित्तौड़ा के प्रभारी डॉ. यशपाल सिंह सहित कई कृषि विशेषज्ञ और वैज्ञानिक मौजूद रहे।
विशेषज्ञों ने किसानों के साथ आयोजित चर्चा में कृषि वानिकी और जैविक खेती की वर्तमान स्थिति पर विस्तार से बातचीत की। उन्होंने बताया कि बदलते जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव को देखते हुए अब खेती के तरीकों में बदलाव जरूरी हो गया है। रासायनिक खेती पर निर्भरता कम कर प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण वाली खेती को बढ़ावा देना समय की मांग है।
वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया कि कृषि वानिकी प्रणाली में फसलों के साथ पेड़-पौधे लगाए जाते हैं, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलता है। इसके अलावा मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन में भी मदद मिलती है। वहीं जैविक खेती से भूमि की गुणवत्ता बेहतर होती है और स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित कृषि उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
भ्रमण के दौरान विशेषज्ञ दल ने विभिन्न प्रक्षेत्र प्रदर्शनों की प्रगति का भी मूल्यांकन किया। किसानों को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के साथ जैविक खेती और कृषि वानिकी अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।
कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों में पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग और सतत कृषि विकास के प्रति जागरूकता बढ़ाना था। वैज्ञानिकों ने कहा कि आने वाले समय में कृषि को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनाना जरूरी होगा, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने के साथ-साथ प्रकृति का संतुलन भी बना रहे।





