उत्तर प्रदेश

बुलडोजर एक्शन पर इमरान मसूद नाराज बोले कानून के दायरे में लड़ेंगे आखिरी दम तक

Ratna Netam
5 Sept 2026 4:30 PM IST
बुलडोजर एक्शन पर इमरान मसूद नाराज बोले कानून के दायरे में लड़ेंगे आखिरी दम तक
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सहारनपुर। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को ध्वस्त किए जाने के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने प्रशासन की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे संविधान और कानून की भावना के खिलाफ बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि मस्जिद को गिराने के लिए जिस तरह की कार्रवाई की गई, उससे न्यायिक प्रक्रिया और संबंधित पक्ष को ऊपरी अदालत में जाने का अवसर मिलने को लेकर गंभीर सवाल पैदा होते हैं।
इमरान मसूद ने कहा कि यह लड़ाई सड़क पर लाठी-डंडे से नहीं बल्कि कानून के दायरे में लड़ी जाएगी। उन्होंने साफ किया कि मस्जिद पक्ष हाईकोर्ट जाएगा और जरूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट तक इस मामले को लेकर जाएगा। मसूद ने आरोप लगाया कि मस्जिद को गिराने की कार्रवाई वास्तव में देश के संविधान पर चोट है।
वहीं प्रशासन का कहना है कि कलेक्ट्रेट परिसर की संबंधित जमीन सरकारी है और मस्जिद का कब्जा अनधिकृत था। जिला अदालत ने भी मस्जिद पक्ष की अपील खारिज करते हुए सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा था। इसके बाद शनिवार सुबह भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई।
सुबह-सुबह मस्जिद पर चला बुलडोजर
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर शनिवार सुबह पुलिस छावनी में तब्दील दिखाई दिया। बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया और इलाके की घेराबंदी के बीच मस्जिद के ढांचे को ध्वस्त करने की कार्रवाई शुरू की गई।
प्रशासन की ओर से कार्रवाई के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे। संवेदनशीलता को देखते हुए कलेक्ट्रेट और आसपास के इलाकों में पुलिस बल मौजूद रहा।
मस्जिद के ध्वस्तीकरण की खबर सामने आते ही राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी शुरू हो गईं। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए और कार्रवाई के तरीके पर सवाल खड़े किए।
इमरान मसूद बोले- संविधान पर चल रहा हथौड़ा
इमरान मसूद ने कहा कि कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को लेकर कानूनी लड़ाई चल रही थी और मस्जिद पक्ष के पास आगे अदालत में जाने का रास्ता मौजूद था।
उन्होंने आरोप लगाया कि इलाके को रात में चारों तरफ से घेर दिया गया और लोगों को बाहर निकलने से रोका गया। इसके बाद सुबह मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया।
मसूद ने इस कार्रवाई को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि उनके नजरिए में यह केवल किसी धार्मिक ढांचे को गिराने की कार्रवाई नहीं है बल्कि संविधान के ऊपर हथौड़ा चलाने जैसा है।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर व्यक्ति को अदालत जाने और न्याय मांगने का अधिकार है। ऐसे में प्रशासन को पूरी कानूनी प्रक्रिया का सम्मान करना चाहिए था।
हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक जाने का ऐलान
कांग्रेस सांसद ने स्पष्ट किया कि इस मामले में आंदोलन का रास्ता हिंसा नहीं होगा। उन्होंने समर्थकों से भी कानून के दायरे में रहने की बात कही।
मसूद ने कहा कि मस्जिद के मामले की लड़ाई अदालत में लड़ी जाएगी। पहले हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाएगा और वहां जरूरत पड़ने पर मामला सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया जाएगा।
उनका कहना है कि उनके पास जमीन और मस्जिद से जुड़े दस्तावेज हैं, जिन्हें अदालत के सामने रखा जाएगा।
मसूद के इस बयान के बाद साफ है कि मस्जिद का ढांचा भले ही गिरा दिया गया हो लेकिन इससे जुड़ा कानूनी विवाद अभी खत्म नहीं हुआ है।
मसूद का दावा- 1911 से पहले की है मस्जिद
इमरान मसूद ने मस्जिद की उम्र और जमीन के मालिकाना हक को लेकर भी दावा किया है। उनका कहना है कि मस्जिद 1911 से पहले की है और इससे संबंधित दस्तावेज मौजूद हैं।
उन्होंने दावा किया कि संपत्ति की मिल्कियत से संबंधित रिकॉर्ड में वहीद खान और याकूब खान के नाम मौजूद हैं। मसूद के मुताबिक सुनवाई के दौरान इन दस्तावेजों को अधिकारियों और अदालत के सामने रखा गया था।
उन्होंने खसरा रिकॉर्ड के आधार पर सरकारी जमीन मानने के तर्क पर भी सवाल उठाए।
हालांकि प्रशासन और जिला अदालत का निष्कर्ष इससे अलग रहा। अदालत ने संबंधित भूमि को सरकारी जमीन माना और मस्जिद पक्ष की अपील खारिज कर दी।
क्या है पूरा विवाद?
कलेक्ट्रेट परिसर में बनी मस्जिद को लेकर विवाद मार्च 2025 में औपचारिक कानूनी प्रक्रिया तक पहुंचा था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि मस्जिद सरकारी जमीन पर बनी है और वहां अनधिकृत कब्जा किया गया है।
इसके बाद उत्तर प्रदेश लोक परिसर से जुड़े कानून के तहत मामला सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में पहुंचा।
सिटी मजिस्ट्रेट ने 16 जुलाई 2026 को आदेश पारित करते हुए संबंधित कब्जे को अनधिकृत माना और परिसर खाली करने का निर्देश दिया।
आदेश में मस्जिद पक्ष को 30 दिन का समय दिया गया था। इसके साथ ही कथित अनधिकृत कब्जे के एवज में 6.41 करोड़ रुपये से अधिक की क्षतिपूर्ति का मामला भी सामने आया।
मस्जिद पक्ष ने जिला अदालत में दी चुनौती
सिटी मजिस्ट्रेट के फैसले को मस्जिद पक्ष ने स्वीकार नहीं किया और 22 जुलाई को जिला अदालत में चुनौती दी।
इसके बाद 24 जुलाई को मस्जिद पक्ष को अंतरिम राहत मिली थी। इस दौरान ध्वस्तीकरण की कार्रवाई रुकी रही और दोनों पक्षों ने अदालत के सामने अपने-अपने तर्क रखे।
मस्जिद पक्ष ने जमीन पर अपना दावा पेश किया जबकि प्रशासन की ओर से इसे सरकारी भूमि बताया गया।
लंबी सुनवाई के बाद जिला अदालत ने मस्जिद पक्ष की अपील खारिज कर दी।
2 सितंबर को आया जिला अदालत का फैसला
जिला अदालत ने 2 सितंबर को अपना फैसला सुनाया। अदालत ने सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखते हुए मस्जिद पक्ष की याचिका खारिज कर दी।
इसके साथ ही जमीन को सरकारी माना गया और बेदखली तथा क्षतिपूर्ति से संबंधित पहले के आदेश को बरकरार रखा गया।
इस फैसले के बाद प्रशासन के लिए सिटी मजिस्ट्रेट के मूल आदेश को लागू करने का रास्ता साफ हो गया।
इसके बाद शनिवार सुबह प्रशासन ने भारी पुलिस बल की मौजूदगी में मस्जिद के ढांचे को ध्वस्त कर दिया।
दस्तावेजों को लेकर दोनों पक्षों के अलग दावे
इस पूरे मामले में दस्तावेज भी विवाद के केंद्र में रहे हैं। मस्जिद पक्ष की तरफ से पुराने रिकॉर्ड और कथित बिजली बिल समेत विभिन्न दस्तावेजों का उल्लेख किया गया।
वहीं सरकारी पक्ष ने इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता और उनसे निकाले जा रहे निष्कर्षों पर सवाल उठाए।
जिला अदालत में सुनवाई के दौरान प्रशासन की तरफ से यह तर्क दिया गया कि जमीन सरकारी रिकॉर्ड में सरकारी भूमि के रूप में दर्ज है।
मस्जिद पक्ष का दावा इससे अलग है। इसी कारण इमरान मसूद का कहना है कि अब ऊपरी अदालत में इन दस्तावेजों और मालिकाना हक से जुड़े सवालों को दोबारा उठाया जाएगा।
कार्रवाई के समय पर सवाल
विपक्षी नेताओं की नाराजगी का एक बड़ा कारण कार्रवाई का समय भी है। ध्वस्तीकरण सुबह के समय किया गया और इससे पहले पूरे इलाके में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था।
इमरान मसूद का आरोप है कि उनकी तरफ से रातभर अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई। इसके बावजूद सुबह कार्रवाई कर दी गई।
उनका सवाल है कि जब संबंधित पक्ष आगे हाईकोर्ट जाने की तैयारी कर रहा था तो प्रशासन ने इतनी जल्दी कार्रवाई क्यों की।
हालांकि प्रशासन का तर्क है कि जिला अदालत से अपील खारिज होने के बाद सिटी मजिस्ट्रेट का मूल आदेश लागू था और उसी के तहत कार्रवाई की गई।
‘लाठी-डंडे की नहीं कलम की लड़ाई’
इमरान मसूद ने अपने समर्थकों को भी संदेश दिया है कि इस विवाद में किसी तरह की हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया जाएगा।
उन्होंने कहा कि यह लड़ाई लाठी-डंडे की नहीं बल्कि कलम और कानून की होगी।
मसूद का यह बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद मामला बेहद संवेदनशील हो गया है और प्रशासन कानून-व्यवस्था को लेकर सतर्क है।
कांग्रेस सांसद ने कहा कि संविधान ने नागरिकों को न्याय पाने का अधिकार दिया है और उसी अधिकार का इस्तेमाल करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया जाएगा।
इकरा हसन ने लगाया हाउस अरेस्ट का आरोप
मस्जिद ध्वस्तीकरण को लेकर समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने भी प्रशासन पर आरोप लगाए हैं।
इकरा हसन ने दावा किया कि वह सहारनपुर जाना चाहती थीं लेकिन उन्हें घर से निकलने नहीं दिया गया और उनके आवास के बाहर पुलिस बल तैनात कर दिया गया।
मामले को लेकर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी सरकार को घेरा है। विपक्ष के कई नेताओं ने प्रशासन की कार्रवाई के समय और तरीके को लेकर सवाल उठाए हैं।
इसके चलते सहारनपुर का यह स्थानीय जमीन विवाद अब प्रदेश की बड़ी राजनीतिक बहस में बदल गया है।
प्रशासन का पक्ष भी समझना जरूरी
राजनीतिक आरोपों के बीच प्रशासन और अदालती प्रक्रिया का पक्ष भी महत्वपूर्ण है।
प्रशासन के मुताबिक कलेक्ट्रेट परिसर में संबंधित जमीन सरकारी है। सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद कब्जे को अनधिकृत माना था।
मस्जिद पक्ष ने इस फैसले को जिला अदालत में चुनौती दी लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली।
इसके बाद प्रशासन ने पहले से जारी बेदखली आदेश का पालन करते हुए ढांचे को हटाया।
यानी विपक्ष जहां इसे संवैधानिक अधिकार और न्यायिक अवसर से जोड़ रहा है, वहीं प्रशासन इसे अदालत से पुष्ट बेदखली आदेश का अनुपालन बता रहा है।
6.41 करोड़ की क्षतिपूर्ति भी विवाद में
इस मामले में केवल ध्वस्तीकरण ही मुद्दा नहीं है। सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश में 6 करोड़ 41 लाख रुपये से अधिक की क्षतिपूर्ति का भी उल्लेख था।
यह रकम कथित अनधिकृत कब्जे और इस्तेमाल से संबंधित बताई गई थी।
जिला अदालत ने मस्जिद पक्ष की अपील खारिज करते हुए मूल आदेश को बरकरार रखा। अब ऊपरी अदालत में कानूनी चुनौती दी जाती है तो ध्वस्तीकरण के साथ क्षतिपूर्ति और जमीन के मालिकाना हक से जुड़े मुद्दे भी बहस का हिस्सा बन सकते हैं।
अब कानूनी लड़ाई पर नजर
मस्जिद गिराए जाने के बाद भी इस मामले का अंत होता नहीं दिख रहा है। इमरान मसूद ने हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक जाने की घोषणा करके साफ कर दिया है कि मस्जिद पक्ष कानूनी लड़ाई जारी रखने की तैयारी में है।
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि ऊपरी अदालत में कौन से दस्तावेज और कानूनी तर्क पेश किए जाते हैं।
अगर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल होती है तो मस्जिद पक्ष जमीन के मालिकाना हक, बेदखली आदेश, ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया और कार्रवाई के समय समेत कई मुद्दे उठा सकता है। दूसरी ओर सरकार और प्रशासन जिला अदालत के फैसले तथा सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर अपना पक्ष रख सकते हैं।
सहारनपुर में सुरक्षा कड़ी
राजनीतिक बयानबाजी को देखते हुए प्रशासन ने सहारनपुर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखी है। कलेक्ट्रेट परिसर और आसपास के संवेदनशील इलाकों में पुलिस की मौजूदगी बढ़ाई गई।
प्रशासन की प्राथमिकता है कि विवाद के कारण किसी तरह की कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा न हो।
सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों पर भी नजर रखना महत्वपूर्ण हो गया है। धार्मिक स्थल से जुड़ा मामला होने के कारण प्रशासन अतिरिक्त सतर्कता बरत रहा है।
राजनीतिक लड़ाई भी हुई तेज
सहारनपुर मस्जिद ध्वस्तीकरण अब केवल प्रशासन और मस्जिद कमेटी के बीच का कानूनी विवाद नहीं रह गया है।
कांग्रेस के इमरान मसूद, समाजवादी पार्टी के नेताओं और अन्य विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रियाओं ने इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया है।
इमरान मसूद ने इसे सीधे संविधान से जोड़ दिया है। उनका आरोप है कि इस तरह की कार्रवाई संवैधानिक प्रक्रिया और नागरिकों के न्याय पाने के अधिकार को कमजोर करती है।
वहीं प्रशासन अपने कदम को अदालत के फैसले और सरकारी जमीन से अनधिकृत कब्जा हटाने की कार्रवाई बता रहा है।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचेगा मामला?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि मामला वास्तव में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचेगा या उससे पहले हाईकोर्ट में क्या निर्णय होता है।
इमरान मसूद ने राजनीतिक और कानूनी स्तर पर स्पष्ट कर दिया है कि वे पीछे हटने वाले नहीं हैं। उन्होंने कहा है कि हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जहां भी जाना पड़ेगा, कानूनी लड़ाई जारी रखी जाएगी।
अब इस विवाद की अगली बड़ी कड़ी संभावित हाईकोर्ट याचिका हो सकती है।
सहारनपुर में मस्जिद का ढांचा भले ही ध्वस्त कर दिया गया हो लेकिन जमीन, प्रशासनिक कार्रवाई और कानूनी प्रक्रिया को लेकर विवाद अभी समाप्त नहीं हुआ है। एक तरफ इमरान मसूद इसे संविधान पर प्रहार बता रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट तक लड़ने की बात कह रहे हैं, दूसरी तरफ प्रशासन अदालत के फैसले को अपनी कार्रवाई का आधार बता रहा है।
आने वाले दिनों में ऊपरी अदालत का रुख और वहां रखे जाने वाले दस्तावेज तय करेंगे कि सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद विवाद की अगली दिशा क्या होगी।
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