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उत्तर प्रदेश
नेपाल त्रासदी पर IIT कानपुर विशेषज्ञ की चेतावनी जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही आपदाएं
SHIDDHANT
27 Aug 2026 10:40 PM IST

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Uttar Pradesh: उत्तर प्रदेश: नेपाल में आई भीषण प्राकृतिक आपदा को लेकर पृथ्वी विज्ञान विभाग, आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर इंद्र शेखर सेन ने महत्वपूर्ण जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि प्रारंभिक अनुमान के अनुसार यह घटना चट्टान और बर्फ के हिमस्खलन के कारण हुई हो सकती है। प्रोफेसर इंद्र शेखर सेन ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी प्राकृतिक घटनाओं की संख्या बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि तापमान में बदलाव, ग्लेशियरों का पिघलना और पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ता असंतुलन आपदाओं के खतरे को बढ़ा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में होने वाली ऐसी घटनाओं को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन बेहतर योजना और सावधानी के माध्यम से इनके प्रभाव को कम किया जा सकता है। आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञ ने सुझाव दिया कि नदी क्षेत्रों से सुरक्षित दूरी पर रिहायशी इलाकों का निर्माण किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि नदियों के आसपास अनियोजित निर्माण होने से बाढ़ और अन्य आपदाओं के दौरान जान-माल का नुकसान बढ़ जाता है।
प्रोफेसर सेन ने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए वैज्ञानिक अध्ययन और पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना जरूरी है। मौसम, जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों की लगातार निगरानी से संभावित खतरों को पहले पहचाना जा सकता है। नेपाल में आई आपदा के बाद विशेषज्ञ लगातार इसके कारणों का अध्ययन कर रहे हैं। हिमालयी क्षेत्र भूकंपीय और जलवायु परिवर्तन के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है। यहां ग्लेशियरों में बदलाव और भारी बारिश जैसी घटनाएं चिंता का विषय बनी हुई हैं।
उन्होंने कहा कि विकास कार्यों के दौरान पर्यावरणीय संतुलन का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। पहाड़ी इलाकों में निर्माण कार्यों को स्थानीय परिस्थितियों और वैज्ञानिक सलाह के आधार पर किया जाना चाहिए। प्रोफेसर इंद्र शेखर सेन ने कहा कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह मानव जीवन, सुरक्षा और विकास से जुड़ी बड़ी चुनौती बन चुका है।
नेपाल त्रासदी के बाद भारत और नेपाल दोनों देशों में राहत और बचाव कार्य जारी हैं। सीमावर्ती इलाकों में प्रशासन भी सतर्क है और आपदा प्रबंधन एजेंसियां स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं के प्रभाव को कम करने के लिए वैज्ञानिक तकनीक, बेहतर योजना और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी।
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