- Home
- /
- राज्य
- /
- उत्तर प्रदेश
- /
- IAS दुर्गा शक्ति...
उत्तर प्रदेश
IAS दुर्गा शक्ति नागपाल कानूनी पचड़े में हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान
Ratna Netam
10 Sept 2026 2:08 PM IST

x
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की वरिष्ठ IAS अधिकारी और देवीपाटन मंडल की आयुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल एक नए विवाद में घिर गई हैं। गोंडा के एक पुराने भूमि विवाद की सुनवाई कर रहीं सिविल जज को कथित तौर पर फोन करने और लंबित मुकदमे को लेकर बातचीत करने के प्रयास का मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ तक पहुंच गया है। हाईकोर्ट ने प्रकरण को गंभीर मानते हुए इसे आपराधिक अवमानना के तहत विचार योग्य माना। इसके बाद दुर्गा शक्ति नागपाल के खिलाफ स्वतः संज्ञान से आपराधिक अवमानना का मामला सूचीबद्ध हुआ।
मामला गोंडा में लंबे समय से चल रहे एक भूमि विवाद से जुड़ा है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक यह विवाद वर्ष 1997 से संबंधित एक मुकदमे से जुड़ा है, जिसकी सुनवाई सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान की अदालत में चल रही थी। आरोप है कि इसी लंबित मामले के सिलसिले में देवीपाटन मंडल की आयुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने जज से फोन पर संपर्क किया। हाईकोर्ट ने इस घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने का कथित प्रयास न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्याय प्रशासन से जुड़ा गंभीर विषय है।
15 जुलाई की फोन कॉल से शुरू हुआ विवाद
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक सिविल जज शबीना खान ने गोंडा के जिला जज को पत्र भेजकर पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी थी। आरोपों के अनुसार 15 जुलाई 2026 को उनके मोबाइल फोन पर एक कॉल आया। जज ने आरोप लगाया कि इस बातचीत के दौरान लंबित मुकदमे को लेकर चर्चा करने का प्रयास किया गया। जज द्वारा लंबित मामले पर बातचीत से इनकार करने के बाद कथित तौर पर आपत्तिजनक व्यवहार किए जाने का भी आरोप लगाया गया।
मामला तब और गंभीर हो गया जब इसकी जानकारी हाईकोर्ट के सामने आई। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने घटनाक्रम पर नाराजगी जताते हुए इसे केवल एक प्रशासनिक अधिकारी और न्यायिक अधिकारी के बीच का विवाद नहीं माना, बल्कि न्यायिक स्वतंत्रता से जुड़ा विषय माना। अदालत ने कहा कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी को लंबित मुकदमे के संबंध में प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है तो यह न्याय देने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप का मामला हो सकता है।
हाईकोर्ट ने आपराधिक अवमानना के लिए भेजा मामला
21 अगस्त को हाईकोर्ट की एकल पीठ ने दुर्गा शक्ति नागपाल के कथित आचरण को आपराधिक अवमानना के मामलों की सुनवाई करने वाली अदालत के विचार के लिए भेजने का निर्देश दिया। इसके बाद मामला स्वतः संज्ञान वाली आपराधिक अवमानना कार्यवाही के रूप में आगे बढ़ा।
इस मामले ने इसलिए भी ध्यान खींचा क्योंकि दुर्गा शक्ति नागपाल उत्तर प्रदेश कैडर की चर्चित IAS अधिकारियों में शामिल हैं। हालांकि मौजूदा मामले में उनके खिलाफ लगाए गए आरोप अभी न्यायिक विचार के अधीन हैं और आरोपों को अंतिम रूप से सिद्ध मानना उचित नहीं होगा।
दुर्गा शक्ति नागपाल ने आरोपों से किया इनकार
विवाद सामने आने के बाद दुर्गा शक्ति नागपाल की ओर से भी सफाई सामने आई। उन्होंने अपने ऊपर लगाए गए कई आरोपों से इनकार किया। उनकी ओर से कहा गया कि सरकारी भूमि से संबंधित मामले को लेकर प्रशासनिक स्तर पर चिंता थी। इस तरह मामले के घटनाक्रम को लेकर दोनों पक्षों के दावों में अंतर है। अब न्यायिक कार्यवाही में ही यह तय होगा कि कथित फोन कॉल और उससे जुड़े घटनाक्रम का कानूनी प्रभाव क्या है।
इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि हाईकोर्ट ने आरोपों को गंभीर मानते हुए आपराधिक अवमानना के तहत विचार की प्रक्रिया शुरू की है, न कि दुर्गा शक्ति नागपाल को अवमानना का दोषी ठहरा दिया गया है।
सुनवाई से अलग हुए हाईकोर्ट के जज
3 सितंबर को स्वतः संज्ञान से दर्ज आपराधिक अवमानना का मामला न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ के सामने सूचीबद्ध हुआ। लेकिन न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव ने खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया। आदेश में उनके अलग होने का कारण दर्ज नहीं किया गया। इसके बाद खंडपीठ ने निर्देश दिया कि मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायाधीश से नामांकन प्राप्त कर मामला दूसरी पीठ के सामने सूचीबद्ध किया जाए। इसे 9 सितंबर को फिर सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया था।
इस घटनाक्रम के बाद मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया। अब अगली उपयुक्त पीठ के सामने आपराधिक अवमानना प्रकरण की कार्यवाही आगे बढ़ेगी।
क्या था मूल जमीन विवाद?
जिस प्रकरण से यह पूरा विवाद पैदा हुआ वह गोंडा के एक पुराने भूमि विवाद से संबंधित बताया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक ज्योति विद्या मंदिर और नगर पालिका परिषद आदि से जुड़े इस मुकदमे की शुरुआत वर्ष 1997 में हुई थी। इसी लंबित मामले से संबंधित एक ट्रांसफर आवेदन की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने सिविल जज द्वारा जिला जज को भेजे गए पत्र और कथित फोन कॉल का विषय आया।
हाईकोर्ट की चिंता का मुख्य बिंदु यह था कि किसी लंबित न्यायिक मामले में प्रशासनिक पद पर बैठे वरिष्ठ अधिकारी की ओर से संबंधित जज से सीधे संपर्क करने का आरोप न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल खड़ा कर सकता है। अदालत ने इसी वजह से मामले को आपराधिक अवमानना पर विचार करने वाली पीठ के पास भेजना उचित समझा।
अब आगे क्या?
दुर्गा शक्ति नागपाल से जुड़ा यह मामला अब आपराधिक अवमानना की न्यायिक प्रक्रिया में है। संबंधित पीठ आरोपों, उपलब्ध रिकॉर्ड और दोनों पक्षों के पक्ष को देखने के बाद आगे की कार्यवाही तय करेगी। इस स्तर पर दुर्गा शक्ति नागपाल को दोषी नहीं ठहराया गया है। मामला आरोपों और न्यायिक परीक्षण के चरण में है।
इस पूरे प्रकरण ने प्रशासन और न्यायपालिका के बीच संस्थागत सीमाओं को लेकर भी बहस छेड़ दी है। अदालतों की स्वतंत्रता भारतीय न्याय व्यवस्था की बुनियादी शर्त मानी जाती है। ऐसे में किसी लंबित मामले की सुनवाई कर रहे न्यायिक अधिकारी पर बाहरी दबाव डालने के आरोप को हाईकोर्ट द्वारा गंभीरता से लिया जाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
फिलहाल सभी की निगाहें इस बात पर रहेंगी कि नई पीठ के सामने आपराधिक अवमानना मामले की सुनवाई किस दिशा में आगे बढ़ती है और दुर्गा शक्ति नागपाल की ओर से अदालत के समक्ष क्या पक्ष रखा जाता है।
Next Story





