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उत्तर प्रदेश
होम्योपैथिक दवा खरीद में छह गुना तक महंगाई, प्राचार्यों और अधिकारियों को नोटिस
nidhi
18 Oct 2026 7:39 AM IST

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में सरकारी होम्योपैथिक संस्थानों के लिए दवा खरीद में अनियमितताओं का मामला सामने आया है। खरीद दरों में दो से छह गुना तक अंतर मिलने पर राजकीय होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्यों और जिला होम्योपैथी अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। निविदा की शर्तें बदलकर कुछ कंपनियों को लाभ पहुंचाने के आरोपों की पड़ताल के निर्देश भी दिए गए हैं। फिलहाल मामला विभागीय जांच और जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया में है।
दवा खरीद में पारदर्शिता के लिए दरों का तुलनात्मक परीक्षण महत्वपूर्ण होता है। हालांकि, केवल कीमतों का अंतर किसी व्यक्ति का अपराध सिद्ध नहीं करता। किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए दवा की मात्रा, गुणवत्ता, पैकिंग, आपूर्ति की अवधि और खरीद की अन्य शर्तों को साथ देखकर मूल्यांकन करना जरूरी है। इसी तरह निविदा की पात्रता शर्तों और उन्हें तय करने के आधार का परीक्षण भी वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने में मदद करता है।
इस मामले में प्रमुख सवाल यह है कि अलग-अलग संस्थानों ने खरीद का मूल्यांकन किस आधार पर किया। यदि दवा और आपूर्ति की शर्तें समान थीं, तो ज्यादा भुगतान की वजह स्पष्ट होनी चाहिए। वहीं, परिस्थितियां अलग थीं तो संबंधित अभिलेखों में उसका आधार मिलना चाहिए। अधिकारियों के स्पष्टीकरण और खरीद दस्तावेजों के परीक्षण से इन सवालों के उत्तर सामने आ सकेंगे।
होम्योपैथी निदेशालय को विभिन्न जिलों में एक जैसी दवाएं अलग दरों पर खरीदे जाने की शिकायतें मिल रही थीं। कीमतों में एकरूपता लाने के लिए रेट कॉन्ट्रैक्ट लागू करने का प्रस्ताव भी रखा गया था, लेकिन उसे शासन की मंजूरी नहीं मिली है। निदेशक डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने खरीद संबंधी नियमों के पालन पर जोर देते हुए संबंधित संस्थानों को निर्देश भेजे हैं।
रेट कॉन्ट्रैक्ट का सामान्य उद्देश्य निर्धारित अवधि के लिए आपूर्ति की दरें और शर्तें तय करना होता है। इससे विभिन्न इकाइयों को बार-बार अलग मूल्य तय करने की जरूरत कम हो सकती है। फिर भी ऐसी व्यवस्था में दवाओं की गुणवत्ता, उपलब्धता और समय पर आपूर्ति की निगरानी आवश्यक रहती है। कम कीमत के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि खरीदी गई सामग्री निर्धारित मानकों के अनुरूप हो।
निदेशालय ने दवाओं की खरीद जेम पोर्टल के माध्यम से करने को कहा है। टेंडर में ऐसी मनमानी शर्तें जोड़ने पर कार्रवाई की चेतावनी दी गई है, जिनसे चुनिंदा फर्मों को लाभ पहुंचे। खरीद प्रक्रिया को लेकर समस्या या संशय होने पर अधिकारियों को एमएसएमई विभाग के जिला स्तरीय महाप्रबंधक से सुझाव लेने के निर्देश दिए गए हैं।
डिजिटल माध्यम से खरीद में दस्तावेजों का रिकॉर्ड उपलब्ध रहना जवाबदेही के लिए उपयोगी होता है। लेकिन पारदर्शिता के लिए निविदा तैयार करने से लेकर आपूर्ति स्वीकार करने तक हर स्तर पर उचित परीक्षण जरूरी है। पात्रता की शर्तों का स्पष्ट औचित्य होना चाहिए, ताकि योग्य आपूर्तिकर्ताओं को प्रतिस्पर्धा का अवसर मिले। भुगतान से पहले प्राप्त दवाओं का मिलान स्वीकृत आदेश से होना भी खरीद प्रबंधन का अहम हिस्सा है। मामले में खरीद की दरों के साथ समयबद्धता भी सवालों के घेरे में है। बजट उपलब्ध होने के बावजूद दवाएं समय से नहीं खरीदने वाले जिलों को नोटिस भेजे गए हैं। ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने और लापरवाही मिलने पर कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
सरकारी चिकित्सा संस्थानों के लिए उचित दरों पर खरीद और नियमित उपलब्धता दोनों आवश्यक हैं। खरीद में देरी से आपूर्ति की योजना प्रभावित हो सकती है, जबकि बिना पर्याप्त तुलना के भुगतान से बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। इसलिए वित्तीय अनुशासन का आकलन केवल खर्च की गई रकम से नहीं, बल्कि जरूरत के अनुसार समय पर सामग्री मिलने से भी होना चाहिए। अब नोटिसों के जवाब और दस्तावेजों की पड़ताल महत्वपूर्ण होगी। दरों के अंतर का कारण, निविदा की शर्तों का आधार और खरीद में हुई देरी की वजह स्पष्ट होने पर ही जिम्मेदारी का उचित निर्धारण संभव होगा। जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
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