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बंदी रक्षक बर्खास्तगी केस में हाईकोर्ट सख्त, बहाली का आदेश किया रद्द

प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुरादाबाद जेल के बर्खास्त बंदी रक्षक रणवीर सिंह से जुड़े मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए उनकी बहाली के एकलपीठ के पुराने आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने माना कि नियुक्ति के लिए प्रस्तुत किया गया जाति प्रमाण पत्र फर्जी पाया गया था, जिसके आधार पर की गई कार्रवाई को गलत नहीं ठहराया जा सकता।
मामला वर्ष 1992 में हुई नियुक्ति से जुड़ा है। रणवीर सिंह को 8 अगस्त 1992 को अनुसूचित जनजाति आरक्षित श्रेणी के तहत मुरादाबाद जेल में बंदी रक्षक के पद पर नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के समय उन्होंने आरक्षित वर्ग का लाभ लेने के लिए जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया था।
मामला उस समय सामने आया जब वर्ष 2007 में कुछ कर्मचारियों की ओर से फर्जी आदेशों के आधार पर तबादले की मांग की गई। इसके बाद जेल प्रशासन ने सभी संबंधित दस्तावेजों की जांच कराने के निर्देश दिए। जांच के दौरान रणवीर सिंह के जाति प्रमाण पत्र पर भी सवाल उठे।
जांच में सामने आया कि उनके द्वारा प्रस्तुत किया गया जाति प्रमाण पत्र तहसीलदार लखनऊ कार्यालय से जारी ही नहीं किया गया था। अधिकारियों ने इसे पूरी तरह फर्जी बताया। इसके अलावा मैनपुरी जिले में भी जांच कराई गई, जहां यह जानकारी सामने आई कि उनके गांव में "लोध" जाति का कोई व्यक्ति निवास नहीं करता है।
जांच रिपोर्ट के आधार पर जेल प्रशासन ने रणवीर सिंह को कारण बताओ नोटिस जारी किया। जवाब संतोषजनक नहीं पाए जाने के बाद 28 नवंबर 2007 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
इसके बाद रणवीर सिंह ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। वर्ष 2008 में एकलपीठ ने उनकी बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया था। एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा था कि बिना विभागीय जांच पूरी किए बर्खास्तगी की कार्रवाई करना उचित नहीं था। साथ ही अदालत ने यह भी माना था कि "लोध" और "लोधी" एक ही जाति के नाम हैं, इसलिए याची आरक्षित वर्ग का लाभ पाने का पात्र हो सकता है।
हालांकि इस आदेश के खिलाफ मामला आगे बढ़ा और इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अब एकलपीठ के फैसले को निरस्त कर दिया है। खंडपीठ ने कहा कि यदि नियुक्ति आरक्षित श्रेणी के आधार पर फर्जी दस्तावेजों के सहारे प्राप्त की गई है तो ऐसी नियुक्ति को संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
अदालत ने माना कि सरकारी सेवा में नियुक्ति के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों की प्रमाणिकता बेहद महत्वपूर्ण होती है। यदि कोई व्यक्ति गलत प्रमाण पत्र के आधार पर आरक्षण का लाभ लेकर नियुक्ति प्राप्त करता है तो यह नियमों के विपरीत है।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद रणवीर सिंह की बहाली का रास्ता बंद हो गया है। अदालत के निर्णय को फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
फैसले के बाद सरकारी विभागों में आरक्षण से जुड़ी नियुक्तियों के दौरान दस्तावेजों की जांच प्रक्रिया को और मजबूत करने पर भी जोर दिया जा सकता है, ताकि पात्र उम्मीदवारों को ही आरक्षित वर्ग का लाभ मिल सके।





