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Prayagraj प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद और गुजारा भत्ता से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी आर्थिक संकट के दौरान अपने मायके से वित्तीय सहायता ले रही है, तो इसे उसकी स्वयं की आय नहीं माना जा सकता और न ही इसे पति की जिम्मेदारी से छूट का आधार बनाया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी के माता-पिता द्वारा दी जाने वाली आर्थिक मदद को उसकी व्यक्तिगत आय के रूप में नहीं देखा जा सकता। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि मायके से मिलने वाली सहायता पति द्वारा दिए जाने वाले भरण-पोषण का विकल्प नहीं हो सकती।इस मामले में न्यायमूर्ति की एकल पीठ ने बुलंदशहर के परिवार न्यायालय (फैमिली कोर्ट) के दिसंबर 2023 के उस आदेश को संशोधित कर दिया, जिसमें पत्नी की गुजारा भत्ता मांग को खारिज कर दिया गया था।
हाईकोर्ट के इस फैसले को वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण से जुड़े कानूनी प्रावधानों की व्याख्या के रूप में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि विवाह संबंधों में पति की कानूनी जिम्मेदारी को केवल पत्नी के परिवार से मिलने वाली मदद के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।यह निर्णय भविष्य में गुजारा भत्ता और वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में एक संदर्भ के रूप में देखा जा सकता है।





