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राम मंदिर आंदोलन में गोरक्षपीठ की रही अहम भूमिका: योगी आदित्यनाथ

गोरखपुर। गोरक्षपीठाधीश्वर एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि मंदिर आंदोलन में गोरक्षपीठ के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ ने अपना जीवन समाज, राष्ट्र और श्रीराम मंदिर के उद्देश्य के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने कहा कि दोनों संतों ने समय और समाज की जरूरत को समझते हुए संत समाज को एकजुट करने और जनजागरण का कार्य किया।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बुधवार को युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ महाराज की 57वीं और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ महाराज की 12वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आयोजित साप्ताहिक श्रद्धांजलि समारोह के अंतिम दिन संबोधित कर रहे थे। यह कार्यक्रम महंत अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित किया गया था।
श्रद्धांजलि सभा में मुख्यमंत्री ने कहा कि गोरक्षपीठ की परंपरा केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने समाज और राष्ट्र से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर भी सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ के कार्यों को याद करते हुए कहा कि दोनों संतों ने अपने समय की परिस्थितियों के अनुरूप समाज को दिशा देने का प्रयास किया।
योगी आदित्यनाथ ने कहा कि वर्ष 1949 में अयोध्या में रामलला के प्रकट होने के समय तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ साधु-संतों के साथ वहां मौजूद थे। गोरक्षपीठ से जुड़े आधिकारिक विवरणों में भी 22-23 दिसंबर 1949 की घटनाओं के दौरान उनकी मौजूदगी और संकीर्तन का उल्लेख मिलता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि महंत दिग्विजयनाथ के बाद महंत अवेद्यनाथ ने श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1984 में श्रीरामजन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के गठन के समय महंत अवेद्यनाथ को उसका अध्यक्ष चुना गया था और उन्होंने लंबे समय तक इस आंदोलन से जुड़ी गतिविधियों का नेतृत्व किया।
योगी ने कहा कि दोनों संतों ने संत समाज को एक मंच पर लाने और राम मंदिर के मुद्दे को व्यापक स्तर पर उठाने का काम किया। उनका कहना था कि गोरक्षपीठ की परंपरा में धर्म और अध्यात्म के साथ राष्ट्र और समाज की सेवा को भी उतना ही महत्व दिया गया है।
उन्होंने महंत अवेद्यनाथ के जीवन को याद करते हुए कहा कि उन्होंने सामाजिक समरसता, शिक्षा, सेवा और धार्मिक जागरण के क्षेत्रों में भी काम किया। मुख्यमंत्री के अनुसार, उनके गुरु का जीवन केवल किसी एक आंदोलन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने और जनहित से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।
योगी आदित्यनाथ ने कहा कि महापुरुषों की पहचान इस बात से होती है कि वे समय, समाज और राष्ट्र की आवश्यकता को समझते हैं। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति बदलते समय के साथ समाज को दिशा देता है और जनकल्याण को अपना उद्देश्य बनाता है, वही लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों में बना रहता है।
श्रद्धांजलि सभा में महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ के सामाजिक, धार्मिक और शैक्षणिक योगदान का भी उल्लेख किया गया। वक्ताओं ने कहा कि गोरक्षपीठ से जुड़े इन दोनों संतों ने शिक्षा संस्थानों के विस्तार और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद बढ़ाने की दिशा में भी काम किया।
कार्यक्रम में विभिन्न संतों और धार्मिक गुरुओं ने भी दोनों ब्रह्मलीन महंतों को श्रद्धांजलि दी। सभा में महंत दिग्विजयनाथ की राष्ट्र और समाज के प्रति भूमिका तथा महंत अवेद्यनाथ के सामाजिक समरसता और धार्मिक आंदोलनों से जुड़े योगदान की चर्चा की गई।
मुख्यमंत्री ने कहा कि गोरक्षपीठ की परंपरा में संत केवल धार्मिक जीवन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि शिक्षा, सेवा और राष्ट्रीय चेतना से जुड़े विषयों पर भी काम करते रहे हैं।
उन्होंने कहा कि श्रीराम मंदिर का निर्माण लंबे संघर्ष और अनेक लोगों के प्रयासों का परिणाम है। गोरक्षपीठ भी इस आंदोलन से कई दशकों तक जुड़ा रहा।
योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में गुरु-शिष्य परंपरा का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ से मिली परंपरा और संस्कार गोरक्षपीठ के कार्यों में लगातार दिखाई देते हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि समाज को आगे बढ़ाने के लिए संतों और महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होंने युवाओं से भी उनके जीवन और कार्यों को समझने का आह्वान किया।
श्रद्धांजलि कार्यक्रम के दौरान धार्मिक अनुष्ठान और स्मृति सभा भी आयोजित की गई। विभिन्न क्षेत्रों से आए संतों, जनप्रतिनिधियों और श्रद्धालुओं ने दोनों महंतों को नमन किया।
महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि के साथ साप्ताहिक श्रद्धांजलि समारोह का समापन हुआ। इससे पहले पूरे सप्ताह अलग-अलग कार्यक्रमों के माध्यम से महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ के जीवन और योगदान को याद किया गया।
मुख्यमंत्री ने अंत में कहा कि दोनों संतों का जीवन समाज, राष्ट्र और धर्म के प्रति समर्पण का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि गोरक्षपीठ उनकी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए शिक्षा, सेवा, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े कार्य जारी रखेगी।





