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Ghaziabad: हेपेटाइटिस टेस्ट के लिए मेरठ पर निर्भर है स्थानीय व्यवस्था

गाजियाबाद; हेपेटाइटिस की जांच के लिए 19 मई को हेपेटाइटिस परीक्षण दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन तमाम कवायद के बाद भी जांच शुरू नहीं हो सकी। अस्पताल में संदिग्ध मरीजों के खून के नमूने एकत्र कर एक सप्ताह में मेरठ के मेडिकल कॉलेज में जांच के लिए भेजे जाते हैं। रिपोर्ट आने में भी दस से 15 दिन लग जाते हैं। इस देरी के चलते डॉक्टरों को कई बार मरीजों के इलाज के लिए अनुमान के आधार पर निर्णय लेना पड़ता है।
एमएमजी अस्पताल के एक फिजिशियन ने बताया कि हेपेटाइटिस बी और सी के इलाज में वायरल लोड की रिपोर्ट बहुत अहम होती है, लेकिन जांच सुविधा न होने के कारण यह रिपोर्ट समय पर नहीं मिल पाती। मरीजों की संख्या बढ़ रही है, पर संसाधनों की कमी अभी भी बनी हुई है। जिला अस्पताल में एंटी-एचसीवी और एचबीएसएजी की जांच ही हो पा रही हैं, लेकिन वायरल लोड की जांच नहीं हो पा रही है। प्रति सप्ताह 70 से 80 मरीजों के सैंपल जांच के लिए मेरठ मेडिकल कॉलेज भेजे जाते हैं। छह महीने पहले जांच शुरू की गई थी, लेकिन आरटीपीसीआर लैब में आग लगने के बाद जांच बंद कर दी गई थी।
सरकारी प्रयास, लेकिन सुविधा अधूरी
स्वास्थ्य विभाग ने कई बार उच्च अधिकारियों को प्रस्ताव भेजे हैं कि जिले में हेपेटाइटिस जांच की सुविधा उपलब्ध कराई जाए, लेकिन अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम (एनवीएचसीपी) के तहत मरीजों को दवाएं तो मिल रही हैं, लेकिन जांच के लिए उन्हें बाहर जाना पड़ता है।
350 मरीजों का चल रहा है इलाज
जिला अस्पताल में 350 मरीजों का हेपेटाइटिस का इलाज चल रहा है। एक मरीज की दवाई तीन से चार महीने चलती है। इसके बाद वायरल लोड जांच कराने के बाद रिपोर्ट निगेटिव होने पर दवाई बंद कर दी जाती है।
बचाव ही सबसे बड़ा उपाय
एमएमजी अस्पताल के नोडल अधिकारी डॉ. आलोक रंजन का कहना है कि हेपेटाइटिस से बचाव के लिए सुरक्षित खून चढ़ाना, स्वच्छ सुइयों का उपयोग और व्यक्तिगत स्वच्छता बेहद जरूरी है। साथ ही, हेपेटाइटिस बी का टीका लगवाना भी एक प्रभावी बचाव है। समय रहते जांच और उपचार से बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है।





