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शुक्लागंज में दो सेंटीमीटर घटा गंगा का जलस्तर फिर भी खतरे के निशान से ऊपर

शुक्लागंज। गंगा नदी के जलस्तर में मामूली गिरावट दर्ज की गई है लेकिन बाढ़ प्रभावित इलाकों में लोगों की परेशानी कम नहीं हुई है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार गंगा का जलस्तर दो सेंटीमीटर नीचे आया है। इसके बावजूद नदी अब भी खतरे के निशान से 10 सेंटीमीटर ऊपर बह रही है। नगर के लगभग 26 मोहल्लों और आसपास के कई गांवों में बाढ़ का पानी भरा हुआ है जिससे करीब 18 हजार लोगों का जनजीवन प्रभावित हुआ है।
केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक शनिवार शाम छह बजे शुक्लागंज में गंगा का जलस्तर 113.120 मीटर दर्ज किया गया था। सोमवार शाम छह बजे यह घटकर 113.100 मीटर पर पहुंच गया। इस प्रकार दो दिनों में जलस्तर में दो सेंटीमीटर की कमी आई है। जलस्तर में गिरावट राहत का संकेत जरूर है लेकिन नदी के खतरे के निशान से ऊपर रहने के कारण स्थिति अभी भी गंभीर बनी हुई है।
गंगा का पानी नगर के निचले और तटीय क्षेत्रों में फैल चुका है। लगभग 26 मोहल्लों की गलियों सड़कों और घरों में पानी भर गया है। आसपास के कई गांव भी बाढ़ से घिरे हुए हैं। लोगों के घरों की निचली मंजिलें जलमग्न होने के कारण परिवार छतों या ऊपरी मंजिलों पर रहने को मजबूर हैं।
बाढ़ से प्रभावित करीब 18 हजार लोगों के सामने आवागमन भोजन पेयजल बिजली और स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयां पैदा हो गई हैं। कई गलियों में पानी की गहराई अधिक होने के कारण पैदल निकलना संभव नहीं है। ऐसे में लोग घरों से बाहर जाने और जरूरी सामान लाने के लिए नावों का सहारा ले रहे हैं।
प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्रों में आवागमन के लिए 80 नावें लगाई हैं। इन नावों के माध्यम से लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के साथ जरूरी वस्तुएं उपलब्ध कराने का काम किया जा रहा है। बीमार बुजुर्ग बच्चों और गर्भवती महिलाओं को आवश्यकता पड़ने पर नावों से बाहर निकालना पड़ रहा है।
नगर के कई हिस्सों में सड़क और गली की पहचान करना मुश्किल हो गया है। पानी भरने के कारण खुले नाले गड्ढे और अन्य अवरोध दिखाई नहीं दे रहे हैं। इससे नावों और पैदल चलने वाले लोगों के लिए दुर्घटना का खतरा बना हुआ है। प्रशासन की ओर से लोगों को बिना आवश्यकता बाढ़ के पानी में न उतरने की सलाह दी जा रही है।
घरों की नीचे की मंजिलों में पानी भरने से लोगों ने घरेलू सामान ऊपरी मंजिलों और छतों पर पहुंचा दिया है। चारपाई अनाज कपड़े दस्तावेज बिजली के उपकरण और अन्य जरूरी वस्तुएं बचाने के लिए परिवार लगातार प्रयास कर रहे हैं। जिन मकानों में केवल एक मंजिल है वहां रहने वाले लोगों के सामने अधिक परेशानी है।
जलभराव के बीच स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता भी एक बड़ी चुनौती बन गई है। हैंडपंप और अन्य स्थानीय जल स्रोत बाढ़ के पानी में डूबने से दूषित हो सकते हैं। ऐसे में प्रभावित परिवारों को सुरक्षित पानी उपलब्ध कराना आवश्यक है। दूषित पानी पीने से दस्त उल्टी टाइफाइड और अन्य जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
बाढ़ का पानी लंबे समय तक जमा रहने पर मच्छरों का प्रकोप भी बढ़ने की आशंका रहती है। डेंगू मलेरिया और अन्य बीमारियों से बचाव के लिए प्रभावित इलाकों में नियमित दवा छिड़काव स्वास्थ्य जांच और आवश्यक दवाओं की उपलब्धता जरूरी है। लोगों से उबला अथवा सुरक्षित पानी पीने और भोजन को ढककर रखने की अपील की जा रही है।
प्रभावित क्षेत्रों में पशुपालकों की मुश्किलें भी बढ़ गई हैं। पशुओं के लिए सुरक्षित स्थान और चारे की व्यवस्था करना कठिन हो रहा है। कई पशुपालक अपने मवेशियों को ऊंचे स्थानों पर ले गए हैं। खेतों और निचले इलाकों में पानी भरने से फसल तथा पशुचारे के नुकसान की आशंका भी बनी हुई है।
जलस्तर में दो सेंटीमीटर की गिरावट के बावजूद प्रशासन को सतर्कता बनाए रखने की जरूरत है। ऊपरी क्षेत्रों से आने वाले पानी और मौसम की स्थिति के आधार पर नदी का स्तर दोबारा बढ़ सकता है। इसलिए केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों पर लगातार नजर रखी जा रही है। जब तक गंगा खतरे के निशान से नीचे नहीं आती तब तक प्रभावित लोगों को सावधानी बरतनी होगी।
बाढ़ प्रभावित लोगों का कहना है कि जलस्तर में मामूली कमी से फिलहाल उनके घरों और गलियों में भरे पानी पर खास असर नहीं पड़ा है। पानी निकालने की स्थिति तभी बनेगी जब नदी का स्तर लगातार घटे। कई परिवार पिछले कई दिनों से छतों और ऊपरी मंजिलों पर रह रहे हैं। उनके सामने खाना बनाने शौचालय इस्तेमाल करने और बच्चों की देखभाल जैसी दैनिक जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो रहा है।
प्रशासन को नावों के संचालन के साथ राहत सामग्री वितरण की व्यवस्था भी नियमित रखनी होगी। सूखा राशन पीने का पानी मोमबत्ती दवाइयां बच्चों के लिए दूध और महिलाओं की जरूरत की वस्तुओं की मांग बढ़ रही है। राहत वितरण के दौरान दूर के मोहल्लों और गांवों तक सहायता पहुंचाना महत्वपूर्ण है।
बिजली के खंभों तारों और घरों में लगे विद्युत उपकरणों के पानी के संपर्क में आने से करंट लगने का खतरा भी रहता है। प्रभावित क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति को लेकर विशेष सावधानी आवश्यक है। लोगों को पानी में डूबे बिजली के उपकरणों या तारों के पास नहीं जाने की सलाह दी जानी चाहिए।
जलस्तर घटने के बाद भी चुनौती खत्म नहीं होगी। पानी उतरने पर घरों और गलियों में कीचड़ कचरा और मृत जीवों के कारण संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। नगर निकाय को सफाई की व्यापक व्यवस्था करनी होगी। घरों के नुकसान सड़कों की स्थिति और पेयजल स्रोतों की गुणवत्ता की जांच भी आवश्यक होगी।
फिलहाल गंगा 113.100 मीटर के स्तर पर बह रही है और उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह खतरे के निशान से 10 सेंटीमीटर ऊपर है। दो सेंटीमीटर की कमी से राहत की उम्मीद जरूर जगी है लेकिन करीब 18 हजार प्रभावित लोगों के लिए संकट अभी बना हुआ है। प्रशासन और जल आयोग की नजर अब नदी के अगले रुख पर टिकी है।





