उत्तर प्रदेश

डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी का पर्दाफाश, पुलिस ने दबोचे दो आरोपी

Ratna Netam
1 Nov 2026 2:43 PM IST
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी का पर्दाफाश, पुलिस ने दबोचे दो आरोपी
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वाराणसी/लखनऊ। उत्तर प्रदेश में साइबर अपराधियों के खिलाफ पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए डिजिटल अरेस्ट जैसी ऑनलाइन ठगी में इस्तेमाल हो रहे अवैध टेलीकॉम नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। वाराणसी पुलिस ने तीन अलग-अलग स्थानों पर छापेमारी कर छह सिम बॉक्स और उनसे जुड़े इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किए हैं। इस मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि लखनऊ निवासी एक अन्य आरोपी की तलाश जारी है। जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क के जरिए विदेश से इंटरनेट के माध्यम से की जाने वाली कॉल को भारतीय मोबाइल नंबरों के जरिए स्थानीय कॉल के रूप में लोगों तक पहुंचाया जाता था। इससे साइबर अपराधियों की वास्तविक पहचान और कॉल की अंतरराष्ट्रीय उत्पत्ति छिपाने में मदद मिलती थी।पुलिस की साइबर क्राइम सेल, प्रतिबिंब टीम और चितईपुर थाना पुलिस ने संयुक्त रूप से यह कार्रवाई की। पुलिस के अनुसार, इस नेटवर्क का इस्तेमाल लोगों को सरकारी अधिकारी, पुलिसकर्मी, बैंक अधिकारी और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों का प्रतिनिधि बताकर फोन करने में किया जा रहा था। इसी तकनीक के जरिए साइबर ठग लोगों का भरोसा जीतकर उन्हें डराते और कथित कानूनी कार्रवाई का भय दिखाकर रकम ऐंठते थे।
तीन ठिकानों पर छापेमारी में खुला नेटवर्क
पुलिस ने 14 अक्टूबर को वाराणसी के शिवपुर, लंका और चितईपुर थाना क्षेत्रों में किराये पर लिए गए तीन अलग-अलग ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की। इस दौरान छह सिम बॉक्स बरामद किए गए। इनके साथ राउटर, वीपीएन गेटवे, नेटवर्किंग उपकरण, एंटेना, मोबाइल फोन, वाई-फाई कैमरे और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान भी जब्त किया गया।पुलिस के मुताबिक, बरामद किए गए छह सिम बॉक्स 32-32 पोर्ट वाले थे। इनमें कुल 192 सिम स्लॉट की क्षमता थी। इन उपकरणों का इस्तेमाल एक साथ बड़ी संख्या में कॉल को संचालित करने और अंतरराष्ट्रीय कॉल को स्थानीय मोबाइल नेटवर्क के माध्यम से आगे भेजने में किया जा सकता था।मामले में गिरफ्तार आरोपियों की पहचान वाराणसी के मोहम्मद आबिद और शशि शेखर सिंह के रूप में हुई है। वहीं, लखनऊ निवासी सौगात अस्थाना को भी इस नेटवर्क से जुड़ा बताया गया है। पुलिस उसकी तलाश कर रही है। मामले में चितईपुर थाने में संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज कर आगे की विवेचना की जा रही है।
25 लाख रुपये की ठगी से मिला पुलिस को सुराग
इस पूरे मामले का खुलासा एक डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी की जांच के दौरान हुआ। पुलिस की जांच में सामने आया कि पुणे के एक व्यक्ति को डिजिटल अरेस्ट के नाम पर डराकर उससे करीब 25 लाख रुपये की ठगी की गई थी। ठगी की रकम जिस बैंक खाते में पहुंची थी, उसकी जांच के दौरान पुलिस को इस अवैध टेलीकॉम नेटवर्क के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली।जांचकर्ताओं ने बैंक खाते से जुड़े लोगों और पैसों के लेन-देन की पड़ताल शुरू की। इसके बाद आरोपियों के नेटवर्क और उनके किराये के ठिकानों का पता चला। पुलिस को जानकारी मिली कि इस गिरोह के सदस्य अलग-अलग स्थानों से सिम बॉक्स संचालित कर रहे थे। इसके बाद पुलिस टीम ने तीनों ठिकानों पर एक साथ दबिश देकर उपकरण जब्त किए और दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया।मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इस नेटवर्क के जरिए कितने लोगों को ठगी का शिकार बनाया गया और इससे जुड़े अन्य लोग किन-किन राज्यों में सक्रिय हैं। शुरुआती जांच में इस नेटवर्क से जुड़े संदिग्ध बैंक खाते और साइबर अपराध की अन्य शिकायतें भी सामने आई हैं।
ऐसे काम करता था अवैध सिम बॉक्स नेटवर्क
सिम बॉक्स एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है, जिसमें एक साथ कई सिम कार्ड या सिम कनेक्शन संचालित किए जा सकते हैं। इसका इस्तेमाल वैध दूरसंचार सेवाओं में भी तकनीकी जरूरतों के अनुसार हो सकता है, लेकिन इसका अवैध इस्तेमाल साइबर अपराधियों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।पुलिस के अनुसार, आरोपी सिम बॉक्स और इंटरनेट आधारित वॉयस कॉलिंग तकनीक की मदद से विदेश से आने वाली कॉल को भारतीय मोबाइल नेटवर्क के जरिए स्थानीय कॉल के रूप में भेजते थे। सामान्य तौर पर विदेश से किसी व्यक्ति को फोन आने पर अंतरराष्ट्रीय नंबर दिखाई दे सकता है, लेकिन सिम बॉक्स नेटवर्क के जरिए कॉल को इस तरह रूट किया जा सकता है कि मोबाइल स्क्रीन पर भारतीय मोबाइल नंबर दिखाई दे।इस तकनीक का फायदा उठाकर विदेश में बैठे साइबर अपराधी खुद को भारत की किसी पुलिस एजेंसी, जांच अधिकारी, सरकारी विभाग या बैंक का कर्मचारी बताकर लोगों से संपर्क कर सकते हैं। कॉल प्राप्त करने वाले व्यक्ति को यह महसूस होता है कि फोन भारत के किसी स्थानीय नंबर से आया है। इससे ठगों को अपनी वास्तविक पहचान छिपाने और लोगों का भरोसा जीतने में मदद मिलती है।पुलिस अब बरामद उपकरणों की तकनीकी जांच कर रही है। इसके तहत सिम बॉक्स में इस्तेमाल किए गए नेटवर्क, आईपी एड्रेस, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, इंटरनेट कनेक्शन और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की पड़ताल की जा रही है।
41 साइबर शिकायतों से जुड़े होने की आशंका
इस मामले में जांच का दायरा केवल वाराणसी तक सीमित नहीं है। पुलिस के सामने इस बात का पता लगाना भी चुनौती है कि बरामद सिम बॉक्स का इस्तेमाल किन-किन साइबर अपराधों में किया गया। उपलब्ध जांच संबंधी जानकारी के अनुसार, संबंधित नेटवर्क से जुड़े बैंक खाते को देश के अलग-अलग हिस्सों में दर्ज 41 साइबर शिकायतों से भी जोड़कर देखा जा रहा है।पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि इन शिकायतों में कितनी रकम की ठगी हुई, किन लोगों ने धनराशि जमा कराई और आरोपियों के बीच पैसों का लेन-देन किस प्रकार होता था। साथ ही लखनऊ निवासी आरोपी सौगात अस्थाना की भूमिका और दूसरे संभावित सहयोगियों के बारे में भी जानकारी जुटाई जा रही है।साइबर अपराधियों द्वारा डिजिटल अरेस्ट के नाम पर लोगों को वीडियो कॉल के जरिए डराने, फर्जी गिरफ्तारी वारंट दिखाने और बैंक खातों में रकम जमा कराने के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों में ठग खुद को सीबीआई, पुलिस, प्रवर्तन निदेशालय, कस्टम या अन्य सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों को गिरफ्तारी का डर दिखाते हैं।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर कैसे फंसाते हैं ठग?
डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी में अपराधी सबसे पहले किसी व्यक्ति को फोन या वीडियो कॉल करते हैं। इसके बाद खुद को पुलिस अधिकारी, सीबीआई अधिकारी या किसी अन्य जांच एजेंसी का कर्मचारी बताते हैं। वे पीड़ित को कहते हैं कि उसका नाम मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स तस्करी, मनी ट्रांसफर या किसी अन्य गंभीर आपराधिक मामले में सामने आया है।इसके बाद उसे गिरफ्तारी और जेल भेजने की धमकी दी जाती है। कई बार ठग पीड़ित को लगातार वीडियो कॉल पर रहने के लिए मजबूर करते हैं और परिवार के सदस्यों से संपर्क करने तक पर रोक लगाने की कोशिश करते हैं। भयभीत व्यक्ति से बैंक खाते की जानकारी लेकर या अलग-अलग खातों में रकम ट्रांसफर करवाकर ठगी की जाती है।इस पूरे खेल में फर्जी मोबाइल नंबर, सिम कार्ड, सिम बॉक्स और इंटरनेट आधारित कॉलिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। वाराणसी में सामने आए मामले में भी पुलिस इसी तकनीकी व्यवस्था के जरिए संचालित किए जा रहे कथित अवैध टेलीकॉम नेटवर्क की जांच कर रही है।
पुलिस ने लोगों से की सतर्क रहने की अपील
पुलिस ने नागरिकों को साइबर ठगी के नए तरीकों से सावधान रहने की सलाह दी है। लोगों से कहा गया है कि किसी अनजान व्यक्ति के फोन पर खुद को पुलिस या दूसरी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताने से उसकी पहचान सही नहीं माननी चाहिए। किसी भी व्यक्ति को वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे जमा कराने का अधिकार नहीं है।यह समझना जरूरी है कि भारत में डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है। पुलिस या अन्य जांच एजेंसियां वीडियो कॉल के माध्यम से किसी व्यक्ति को डिजिटल रूप से गिरफ्तार नहीं करतीं। इस तरह की कॉल आने पर घबराने के बजाय संबंधित एजेंसी से उसके आधिकारिक संपर्क माध्यम के जरिए पुष्टि करनी चाहिए।साइबर धोखाधड़ी होने पर तत्काल राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। इसके अलावा राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर भी शिकायत की सुविधा उपलब्ध है।फिलहाल वाराणसी पुलिस गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ और जब्त उपकरणों की तकनीकी जांच के जरिए पूरे नेटवर्क की परतें खोलने में जुटी है। पुलिस की जांच में यह सामने आना बाकी है कि इस अवैध टेलीकॉम नेटवर्क के जरिए कुल कितने लोगों को निशाना बनाया गया और इसके पीछे कितने अन्य लोग सक्रिय हैं।
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