उत्तर प्रदेश

काली नदी किनारे फैक्ट्रियों के प्रदूषण से फसलें बर्बाद होने का आरोप, किसानों ने किया प्रदर्शन

Kavita2
30 Sept 2026 2:18 PM IST
काली नदी किनारे फैक्ट्रियों के प्रदूषण से फसलें बर्बाद होने का आरोप, किसानों ने किया प्रदर्शन
x

अलीगढ़। अकराबाद ब्लॉक के भगोसा गांव में काली नदी किनारे संचालित फैक्ट्रियों को लेकर किसानों और ग्रामीणों का विरोध तेज हो गया है। भारतीय मजदूर किसान यूनियन के पदाधिकारियों और किसानों ने बुधवार को कलक्ट्रेट पहुंचकर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि नदी किनारे संचालित फैक्ट्रियों से निकलने वाला दूषित पानी और गैस खेतों, फसलों और आसपास रहने वाले लोगों की सेहत पर गंभीर असर डाल रही है।

किसान संगठन के पदाधिकारियों ने इस संबंध में एसीएम द्वितीय को ज्ञापन सौंपा। इसमें संबंधित फैक्ट्रियों की जांच कराने और प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। किसानों का कहना है कि लंबे समय से समस्या बनी हुई है, लेकिन प्रभावी कार्रवाई नहीं होने के कारण हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं।

यूनियन के पदाधिकारियों का आरोप है कि काली नदी के किनारे कुछ फैक्ट्रियां नियमों की अनदेखी करते हुए संचालित हो रही हैं। इनसे निकलने वाला दूषित पानी नदी और आसपास के खेतों तक पहुंच रहा है। इसके कारण खेती योग्य जमीन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और फसलें खराब हो रही हैं।

किसानों के मुताबिक खेतों में पहुंच रहे दूषित पानी के कारण मिट्टी की उर्वरता भी कम हो रही है। कई स्थानों पर खेती की जमीन धीरे-धीरे बंजर होने जैसी स्थिति में पहुंच रही है। जिन खेतों में पहले अच्छी पैदावार होती थी, वहां अब उत्पादन प्रभावित होने का दावा किया गया है।

किसान संगठन ने आरोप लगाया कि फैक्ट्रियों से निकलने वाली गैस और दुर्गंध के कारण आसपास रहने वाले ग्रामीणों को सांस लेने में परेशानी हो रही है। खासतौर पर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सेहत पर इसका अधिक असर पड़ने की बात कही गई है।

ग्रामीणों का कहना है कि कई बार हवा में तेज दुर्गंध फैल जाती है, जिससे घरों में रहना भी मुश्किल हो जाता है। लोगों को आंखों में जलन, सांस लेने में दिक्कत और बेचैनी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हालांकि इन स्वास्थ्य संबंधी शिकायतों की स्वतंत्र चिकित्सकीय पुष्टि का उल्लेख ज्ञापन में नहीं है।

किसानों के अनुसार दूषित पानी खेतों तक पहुंचने से उन्हें सीधा आर्थिक नुकसान हो रहा है। खेती में बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी पर हजारों रुपये खर्च करने के बाद यदि फसल खराब हो जाए तो किसान के सामने लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है।

यूनियन ने प्रशासन से मांग की है कि प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित विभागों की संयुक्त टीम बनाकर मौके पर जांच कराई जाए। नदी और खेतों में पहुंच रहे पानी के नमूने लिए जाएं और यह पता लगाया जाए कि उनमें प्रदूषक तत्व किस स्तर पर मौजूद हैं।

इसके साथ ही आसपास की हवा की गुणवत्ता की भी जांच कराने की मांग की गई है। संगठन का कहना है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर यह स्पष्ट किया जाए कि किन औद्योगिक इकाइयों से प्रदूषण फैल रहा है और उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई।

प्रदर्शन में शामिल किसानों ने कहा कि उनका विरोध उद्योगों के संचालन से नहीं, बल्कि प्रदूषण फैलाने से है। यदि फैक्ट्रियां निर्धारित पर्यावरणीय मानकों का पालन करती हैं और दूषित पानी का उचित तरीके से शोधन करती हैं तो ग्रामीणों को परेशानी नहीं होगी।

उनका कहना है कि फैक्ट्रियों से निकलने वाले अपशिष्ट को सीधे नदी या खेतों की ओर छोड़ना किसी भी स्थिति में उचित नहीं है। इसके लिए प्रभावी ट्रीटमेंट व्यवस्था होना जरूरी है।

काली नदी पहले से ही प्रदूषण के मुद्दे को लेकर चर्चा में रही है। इसके किनारे बसे गांवों में रहने वाले लोगों के लिए नदी का पर्यावरण सीधे खेती और स्थानीय जीवन से जुड़ा हुआ है। ऐसे में औद्योगिक अपशिष्ट की शिकायतों ने ग्रामीणों की चिंता और बढ़ा दी है।

भारतीय मजदूर किसान यूनियन ने ज्ञापन में किसानों की खराब हुई फसलों का सर्वे कराने की भी मांग की है। संगठन का कहना है कि यदि जांच में औद्योगिक प्रदूषण के कारण फसल नुकसान की पुष्टि होती है तो प्रभावित किसानों को उचित मुआवजा दिया जाना चाहिए।

प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन से यह भी मांग की कि संबंधित फैक्ट्रियों के दस्तावेज, प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी अनुमति और अपशिष्ट निस्तारण व्यवस्था की जांच की जाए। नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

किसानों ने आरोप लगाया कि समस्या को लेकर पहले भी स्थानीय स्तर पर शिकायतें की गईं, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकल पाया। इसी वजह से अब उन्होंने जिला मुख्यालय पहुंचकर अपनी बात प्रशासन के सामने रखी है।

किसान संगठन ने चेतावनी दी कि यदि उनकी शिकायतों पर कार्रवाई नहीं हुई तो आगे बड़ा आंदोलन किया जा सकता है। हालांकि फिलहाल प्रशासन को ज्ञापन देकर जांच और कार्रवाई की मांग की गई है।

ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें सबसे पहले स्वच्छ हवा और सुरक्षित पानी चाहिए। खेती उनकी आजीविका का मुख्य साधन है, इसलिए खेतों की मिट्टी और पानी खराब होने का असर पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है।

एसीएम द्वितीय को सौंपे गए ज्ञापन के बाद किसानों को प्रशासनिक कार्रवाई का इंतजार है। अब यह देखना होगा कि प्रदूषण की शिकायतों की जांच के लिए संबंधित विभागों की टीम कब मौके पर पहुंचती है और क्या निष्कर्ष सामने आते हैं।

फिलहाल भगोसा गांव और काली नदी किनारे फैक्ट्रियों से कथित प्रदूषण का मामला किसानों और ग्रामीणों के लिए गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। प्रदर्शन के बाद किसानों ने साफ कहा है कि वे फसल, जमीन और स्वास्थ्य से जुड़े इस मुद्दे पर ठोस कार्रवाई चाहते हैं।

Next Story