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शिक्षक राजनीति में 48 साल पुराने दबदबे का अंत, विधान परिषद से माध्यमिक शिक्षक संघ का सफाया

लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधान परिषद के खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनावों ने प्रदेश की शिक्षक राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया है। करीब पांच दशकों तक विधान परिषद में मजबूत उपस्थिति रखने वाले उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ के शर्मा गुट का अब सदन में अपना कोई प्रतिनिधि नहीं रह जाएगा। संगठन से जुड़े आखिरी एमएलसी ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने इस बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के टिकट पर चुनाव जीत लिया है। ऐसे में शिक्षक राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली रहे इस संगठन के सामने अपने राजनीतिक अस्तित्व और भविष्य की रणनीति को लेकर बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
विधान परिषद में शिक्षकों के मुद्दों को उठाने और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष करने वाले इस संगठन का इतिहास कई दशकों पुराना है। शिक्षक संघ के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय ओम प्रकाश शर्मा लगातार आठ बार विधान परिषद सदस्य रहे थे। उन्होंने करीब 48 वर्षों तक शिक्षकों का प्रतिनिधित्व किया। लेकिन अब बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच संगठन का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व समाप्त होने की स्थिति बन गई है।
48 साल पुराने राजनीतिक प्रभाव का हुआ अंत
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ का शर्मा गुट प्रदेश की शिक्षक राजनीति में लंबे समय तक प्रभावशाली रहा। संगठन ने शिक्षकों के वेतन, सेवा सुरक्षा, पेंशन, पदोन्नति और अन्य अधिकारों के लिए कई आंदोलन किए।
एक समय विधान परिषद की शिक्षक निर्वाचन सीटों पर इस संगठन के उम्मीदवारों का खासा प्रभाव हुआ करता था। शिक्षक संगठनों से जुड़े प्रत्याशी राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को मजबूत चुनौती देते थे।
हालांकि, बदलते समय के साथ शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ती गई। भाजपा और समाजवादी पार्टी जैसे दलों ने शिक्षक वर्ग के बीच अपना संगठनात्मक आधार मजबूत करना शुरू किया।
इसका असर शिक्षक संघों की चुनावी ताकत पर भी दिखाई दिया। पहले कई सीटों पर प्रभाव रखने वाले शर्मा गुट का प्रतिनिधित्व धीरे-धीरे सिमटता गया और अंततः ध्रुव कुमार त्रिपाठी ही इस धड़े के प्रमुख निर्वाचित प्रतिनिधि बचे थे।
ओम प्रकाश शर्मा ने लगातार आठ बार जीता था चुनाव
उत्तर प्रदेश की शिक्षक राजनीति में ओम प्रकाश शर्मा का नाम विशेष महत्व रखता है। वह वर्ष 1972 में पहली बार मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद सदस्य निर्वाचित हुए थे।
इसके बाद उन्होंने लगातार आठ बार चुनाव जीतकर करीब 48 वर्षों तक सदन में शिक्षकों का प्रतिनिधित्व किया। यह उपलब्धि उन्हें प्रदेश के सबसे लंबे समय तक विधान परिषद में रहने वाले नेताओं में शामिल करती है।
ओम प्रकाश शर्मा शिक्षकों के अधिकारों की लड़ाई और संगठन को मजबूत बनाने के लिए जाने जाते थे। उनके नेतृत्व में माध्यमिक शिक्षक संघ ने प्रदेशभर में अपना प्रभाव बढ़ाया था।
जनवरी 2021 में उनके निधन के बाद संगठन को नेतृत्व और राजनीतिक आधार के स्तर पर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उनके बाद शिक्षक राजनीति में संगठन की पुरानी पकड़ बरकरार रखना कठिन होता गया।
ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने भाजपा के टिकट पर दर्ज की चौथी जीत
गोरखपुर-फैजाबाद खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से ध्रुव कुमार त्रिपाठी लगातार चौथी बार विधान परिषद पहुंचे हैं। वह पहली बार वर्ष 2008 में शिक्षक नेता पंचानन राय के निधन के बाद इस सीट से निर्वाचित हुए थे।
इसके बाद वर्ष 2014 और 2020 में भी उन्होंने जीत दर्ज की। इन तीनों चुनावों में उन्हें माध्यमिक शिक्षक संघ के शर्मा गुट का समर्थन प्राप्त था।
लेकिन वर्ष 2026 के चुनाव में राजनीतिक तस्वीर बदल गई। ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने का फैसला किया और जीत हासिल की।
इस चुनाव में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार राजीव यादव को 307 मतों के अंतर से पराजित किया। त्रिपाठी को 16,790 वोट मिले। करीबी मुकाबले का फैसला दूसरी वरीयता के मतों की गणना के बाद हुआ।
शिक्षक संगठनों पर भारी पड़ रही राजनीतिक दलों की सक्रियता
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा और सपा जैसे राजनीतिक दलों की बढ़ती सक्रियता शिक्षक संगठनों के लिए नई चुनौती बनकर सामने आई है।
पहले इन निर्वाचन क्षेत्रों में शिक्षक संगठनों के उम्मीदवारों को शिक्षकों के बीच अपनी पहचान और आंदोलनकारी पृष्ठभूमि का लाभ मिलता था। लेकिन अब उम्मीदवारों के व्यक्तिगत प्रभाव के साथ राजनीतिक दलों का संगठनात्मक समर्थन भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
ध्रुव कुमार त्रिपाठी का भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ना इसी बदलाव का उदाहरण माना जा सकता है।
हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि शिक्षक संगठनों का सामाजिक या आंदोलनकारी प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो गया है। चुनावी प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक सक्रियता दो अलग पहलू हैं।
पेंशन और सेवा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर आगे कौन उठाएगा आवाज?
माध्यमिक शिक्षक संघ का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व समाप्त होने के बाद शिक्षकों की समस्याओं को लेकर भी चर्चा तेज हो सकती है।
पुरानी पेंशन योजना की बहाली, सहायता प्राप्त विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति, सेवा सुरक्षा, वित्तविहीन विद्यालयों के शिक्षकों का मानदेय और पदोन्नति जैसे मुद्दे लंबे समय से शिक्षक संगठनों की प्राथमिकताओं में रहे हैं।
ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने चुनाव के दौरान कहा था कि शिक्षकों के हितों की रक्षा उनकी पहली प्राथमिकता होगी। उन्होंने पुरानी पेंशन योजना और वित्तविहीन शिक्षकों के मानदेय से जुड़े मामलों को भी महत्वपूर्ण बताया था।
अब देखना होगा कि राजनीतिक दल के प्रतिनिधि के रूप में वह शिक्षकों से जुड़े मुद्दों को किस तरह विधान परिषद में उठाते हैं।
शिक्षक संघ के सामने संगठन को फिर मजबूत बनाने की चुनौती
विधान परिषद चुनाव के परिणामों के बाद माध्यमिक शिक्षक संघ के शर्मा गुट के सामने संगठनात्मक पुनर्गठन की चुनौती है।
शिक्षकों के बीच अपनी पुरानी पहचान बनाए रखने, नए नेतृत्व को आगे लाने और युवा शिक्षकों को संगठन से जोड़ने जैसे कदम भविष्य में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
संगठन की राजनीतिक ताकत भले ही कमजोर हुई हो, लेकिन शिक्षक हितों से जुड़े मुद्दों पर उसकी भूमिका समाप्त नहीं हुई है।
उत्तर प्रदेश के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में आए इस बदलाव ने स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षक राजनीति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। ओम प्रकाश शर्मा के नेतृत्व में करीब पांच दशकों तक मजबूत रहे संगठन के लिए यह एक ऐतिहासिक मोड़ है। आने वाले वर्षों में शिक्षक संघों की सक्रियता और राजनीतिक दलों की रणनीति यह तय करेगी कि विधान परिषद में शिक्षकों के प्रतिनिधित्व का स्वरूप किस दिशा में आगे बढ़ता है।





