- Home
- /
- राज्य
- /
- उत्तर प्रदेश
- /
- जबलपुर से वृंदावन आए...
जबलपुर से वृंदावन आए दीपक बने रसिक दुलारी शरण, दीक्षा के बाद साधु जीवन जी रहे थे

वृंदावन। मूल रूप से मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले रसिक दुलारी शरण ने करीब दो वर्ष पहले वृंदावन आकर संत प्रेमानंद महाराज से दीक्षा ली थी। दीक्षा लेने के बाद उन्होंने अपना नाम दीपक लोढ़ी से बदलकर रसिक दुलारी शरण रख लिया था। इसके बाद से वह वृंदावन में रहकर साधु जीवन व्यतीत कर रहे थे।
रसिक दुलारी शरण के परिवार में दो भाई और एक बहन हैं। स्वजनों के अनुसार, दीक्षा लेने के बाद उनका परिवार से संपर्क और मुलाकात बेहद कम हो गई थी। उनकी मां करीब एक वर्ष पहले बेटे से मिलने के लिए वृंदावन आई थीं, लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी। परिवार के मुताबिक, इसके बाद भी मां बेटे से मिलने की उम्मीद लगाए हुए थीं।
जबलपुर से करीब दो साल पहले पहुंचे थे वृंदावन
परिवार से मिली जानकारी के अनुसार रसिक दुलारी शरण मूल रूप से जबलपुर के रहने वाले थे। करीब दो वर्ष पहले उन्होंने वृंदावन आने का फैसला किया। वृंदावन पहुंचने के बाद उन्होंने संत प्रेमानंद महाराज से दीक्षा ली।
दीक्षा के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। उन्होंने अपना पुराना नाम दीपक लोढ़ी छोड़कर रसिक दुलारी शरण नाम अपना लिया। इसके बाद वह वृंदावन में ही रहकर साधु जीवन व्यतीत करने लगे।
परिवार के अनुसार, दीक्षा लेने के बाद रसिक का जीवन पहले की तुलना में अलग हो गया था। वह वृंदावन में रहकर धार्मिक जीवन जी रहे थे और परिवार से उनकी मुलाकात नहीं हो पा रही थी।
दो भाई और एक बहन हैं
रसिक दुलारी शरण के परिवार में दो भाई और एक बहन हैं। स्वजनों के मुताबिक परिवार के सभी सदस्य जबलपुर में रहते हैं। बेटे के वृंदावन चले जाने के बाद परिवार उसकी जानकारी और कुशलक्षेम को लेकर संपर्क बनाए रखने की कोशिश करता रहा।
हालांकि दीक्षा लेने के बाद रसिक से नियमित मुलाकात नहीं हो सकी। परिवार के सदस्यों के लिए यह स्थिति भावनात्मक रूप से कठिन रही। खासकर उनकी मां बेटे से मिलने के लिए वृंदावन आई थीं।
परिवार का कहना है कि मां करीब एक वर्ष पहले वृंदावन पहुंची थीं। उनका उद्देश्य बेटे से मिलना था, लेकिन वह रसिक से मुलाकात नहीं कर सकीं।
मां पहले भी बेटे से मिलने पहुंची थीं
रसिक की मां ने बताया कि वह बेटे से मिलने के लिए पहले भी वृंदावन आई थीं। वह चाहती थीं कि बेटे से मिलकर उसकी स्थिति के बारे में जान सकें और कुछ समय उसके साथ बिता सकें।
लेकिन वृंदावन आने के बावजूद मां की बेटे से मुलाकात नहीं हो सकी। इसके बाद वह वापस लौट गईं। परिवार के लिए बेटे से मुलाकात नहीं हो पाना चिंता का विषय बना रहा।
दीक्षा लेने के बाद रसिक का नाम और जीवन दोनों बदल गए थे। परिवार के सदस्य पुराने नाम दीपक लोढ़ी के रूप में उन्हें जानते थे, जबकि वृंदावन में वह रसिक दुलारी शरण के नाम से साधु जीवन व्यतीत कर रहे थे।
धार्मिक जीवन में हो गए थे लीन
वृंदावन आने और दीक्षा लेने के बाद रसिक दुलारी शरण ने अपना जीवन धार्मिक गतिविधियों के लिए समर्पित कर दिया था। उन्होंने सांसारिक जीवन से दूरी बनाकर साधु जीवन अपनाया।
परिवार के अनुसार, वह वृंदावन में ही रहते थे। दीक्षा के बाद उनके जीवन की दिनचर्या और रहने का तरीका बदल गया था। परिवार से मिलने-जुलने का अवसर भी कम हो गया।
रसिक के परिवार में उनकी मां के अलावा दो भाई और एक बहन हैं। परिवार के सदस्य समय-समय पर उनसे मिलने की कोशिश करते रहे, लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई।
बेटे से मिलने की मां की इच्छा पूरी नहीं हुई
रसिक की मां बेटे से मिलने के लिए करीब एक वर्ष पहले वृंदावन आई थीं। उन्होंने बेटे से मुलाकात की उम्मीद की थी, लेकिन यह संभव नहीं हो सका। परिवार के मुताबिक, मां पहले भी वृंदावन आ चुकी थीं।
बेटे से मुलाकात नहीं होने के बावजूद परिवार ने उसकी धार्मिक जीवन की राह का सम्मान किया। हालांकि मां के लिए बेटे से मिलना और उसका हाल जानना हमेशा महत्वपूर्ण रहा।
परिवार के सदस्यों के अनुसार, रसिक के साधु जीवन अपनाने के बाद उनसे मिलने की परिस्थितियां पहले जैसी नहीं रहीं। इसी वजह से परिवार के लोग उनसे नियमित मुलाकात नहीं कर पा रहे थे।
परिवार के लिए पुरानी यादों से जुड़ा है नाम दीपक
परिवार के लिए रसिक दुलारी शरण का पुराना नाम दीपक लोढ़ी आज भी उनकी पहचान से जुड़ा है। करीब दो वर्ष पहले वृंदावन आने से पहले वह दीपक लोढ़ी के नाम से जाने जाते थे। दीक्षा के बाद उन्होंने अपना नाम बदलकर रसिक दुलारी शरण रख लिया।
नाम बदलने के साथ उन्होंने जीवन जीने का तरीका भी बदल लिया। वृंदावन में रहकर उन्होंने साधु जीवन अपना लिया और धार्मिक वातावरण में रहने लगे।
परिवार के सदस्यों के लिए बेटे का इस तरह धार्मिक जीवन अपनाना एक बड़ा बदलाव था। इसके बाद उनके साथ पहले की तरह रहना और मिलना संभव नहीं हो सका।
वृंदावन में ही रह रहे थे
करीब दो वर्ष पहले जबलपुर से वृंदावन आने के बाद रसिक दुलारी शरण ने यहीं रहने का फैसला किया था। दीक्षा लेने के बाद वह वृंदावन में साधु जीवन व्यतीत कर रहे थे।
उनकी मां और परिवार के अन्य सदस्यों की ओर से समय-समय पर उनसे मिलने की कोशिश की गई, लेकिन परिवार के अनुसार मुलाकात नहीं हो सकी। मां के करीब एक वर्ष पहले वृंदावन आने के बावजूद बेटे से मुलाकात न होने की बात भी सामने आई है।
रसिक दुलारी शरण की कहानी में एक ओर जबलपुर से वृंदावन तक का सफर है, तो दूसरी ओर दीक्षा के बाद बदली हुई उनकी पहचान और जीवनशैली। दीपक लोढ़ी से रसिक दुलारी शरण बने इस युवक ने करीब दो वर्ष पहले वृंदावन को अपना ठिकाना बनाया और यहीं साधु जीवन व्यतीत करने लगे। परिवार आज भी उन्हें उनके पुराने नाम दीपक के रूप में याद करता है और मां की उनसे मुलाकात की इच्छा पूरी नहीं हो सकी।





