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64 साल पुराने GTR ब्रिज पर मौत का खतरा! गड्ढे में फंसे रेलवे अधिकारी

चंदौली। करीब 64 वर्ष पुराने जीटीआर ब्रिज की बदहाल स्थिति ने एक बार फिर लोगों की सुरक्षा और पुल के रखरखाव पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्ष 1962 में निर्मित इस पुल की मरम्मत और रखरखाव पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद क्षतिग्रस्त पटिया और गड्ढे राहगीरों के लिए खतरा बने हुए हैं। गुरुवार देर शाम ड्यूटी पर जा रहे डिप्टी स्टेशन सुपरिटेंडेंट संतोष कुमार पांडेय पुल पर बने गड्ढे को अंधेरे के कारण नहीं देख सके और हादसे की चपेट में आ गए। इस घटना के बाद पुल की सुरक्षा व्यवस्था, मरम्मत कार्य की गुणवत्ता और संबंधित विभागों की जवाबदेही को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जीटीआर ब्रिज का निर्माण वर्ष 1962 में किया गया था। लंबे समय से उपयोग में होने के कारण पुल के नियमित रखरखाव की आवश्यकता बनी रहती है। वर्ष 2011 में करीब दो करोड़ रुपये की लागत से पुल की व्यापक मरम्मत कराई गई थी। इसके अतिरिक्त प्रत्येक पांच वर्ष में पेंटिंग और मेटलाइजिंग कराने का प्रावधान है। इस वर्ष भी पुल पर रखरखाव का काम चल रहा है। इसके बावजूद पुल की सतह पर क्षतिग्रस्त पटिया और गड्ढों का होना सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
ड्यूटी पर जा रहे रेलवे अधिकारी के साथ हुआ हादसा
गुरुवार देर शाम डिप्टी स्टेशन सुपरिटेंडेंट संतोष कुमार पांडेय अपनी ड्यूटी पर जा रहे थे। इसी दौरान जीटीआर ब्रिज पर बने गड्ढे को वह अंधेरे में नहीं देख सके और हादसे का शिकार हो गए। घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि पुल पर आवागमन करने वालों के लिए क्षतिग्रस्त हिस्से कितने खतरनाक साबित हो सकते हैं।
हालांकि, हादसे में रेलवे अधिकारी को कितनी चोटें आईं और उनकी वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति कैसी है, इसकी विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। घटना के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि पुल पर मरम्मत कार्य चल रहा है, तो खतरनाक हिस्सों को सुरक्षित करने के लिए पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं किए गए।
विशेष रूप से शाम और रात के समय पुल पर बने गड्ढे दुर्घटनाओं का कारण बन सकते हैं। पर्याप्त रोशनी और चेतावनी संकेतों का अभाव होने पर राहगीरों के लिए खतरा और बढ़ जाता है।
2011 में दो करोड़ खर्च, फिर भी नहीं सुधरी स्थिति
जीटीआर ब्रिज की मरम्मत को लेकर सबसे बड़ा सवाल वर्ष 2011 में कराए गए व्यापक मरम्मत कार्य से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उस समय पुल की हैवी रिपेयरिंग पर करीब दो करोड़ रुपये खर्च किए गए थे।
इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बाद भी पुल के क्षतिग्रस्त हिस्सों का सामने आना रखरखाव की प्रभावशीलता पर सवाल उठाता है। हालांकि, वर्ष 2011 में किए गए कार्यों का दायरा क्या था और वर्तमान क्षति किन कारणों से हुई है, इसकी तकनीकी जांच के बिना मरम्मत की गुणवत्ता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
पुलों की सुरक्षा के लिए समय-समय पर तकनीकी निरीक्षण, क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत और आवश्यक संरचनात्मक परीक्षण बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। लंबे समय तक उपयोग में रहने वाले पुलों पर यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
हर पांच वर्ष में पेंटिंग और मेटलाइजिंग का प्रावधान
जीटीआर ब्रिज के रखरखाव के लिए प्रत्येक पांच वर्ष पर पेंटिंग और मेटलाइजिंग का प्रावधान बताया गया है। इन कार्यों का उद्देश्य धातु से बने हिस्सों को जंग और अन्य प्रभावों से सुरक्षित रखने में सहायता करना होता है।
इस वर्ष भी पुल पर संबंधित कार्य जारी होने की जानकारी सामने आई है। इसके बावजूद क्षतिग्रस्त पटिया और गड्ढों की समस्या बनी हुई है।
यहां यह समझना भी जरूरी है कि पेंटिंग और मेटलाइजिंग का कार्य पुल की सतह पर मौजूद प्रत्येक गड्ढे या क्षतिग्रस्त पटिया की मरम्मत का विकल्प नहीं है। ऐसे हिस्सों को सुरक्षित बनाने के लिए अलग से आवश्यक मरम्मत कार्य करना पड़ सकता है।
संबंधित विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वर्तमान रखरखाव कार्य में किन हिस्सों की मरम्मत शामिल है और खतरनाक स्थानों को सुरक्षित करने के लिए क्या व्यवस्था की गई है।
अंधेरे में बढ़ जाता है दुर्घटना का खतरा
गुरुवार देर शाम हुई घटना ने पुल पर प्रकाश व्यवस्था की अहमियत को भी सामने ला दिया है। अंधेरे में गड्ढे या टूटी पटिया दिखाई नहीं देने से पैदल चलने वालों और अन्य राहगीरों के लिए दुर्घटना का खतरा बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी पुराने पुल पर मरम्मत के दौरान चेतावनी बोर्ड, बैरिकेडिंग और पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था जैसे सुरक्षा उपाय महत्वपूर्ण होते हैं।
यदि किसी स्थान पर तत्काल मरम्मत संभव नहीं है, तो कम से कम उस हिस्से को स्पष्ट रूप से चिह्नित किया जाना चाहिए, ताकि राहगीर समय रहते सावधान हो सकें।
डिप्टी स्टेशन सुपरिटेंडेंट के साथ हुई घटना के बाद पुल पर ऐसे सुरक्षा इंतजामों की समीक्षा की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
विभागीय जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल
जीटीआर ब्रिज की स्थिति को लेकर यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि पुल के नियमित निरीक्षण और मरम्मत की जिम्मेदारी किस विभाग या अधिकारी के पास है। यदि रखरखाव का कार्य निर्धारित अंतराल पर किया जा रहा है, तो क्षतिग्रस्त पटिया और गड्ढों की पहचान तथा मरम्मत की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है?
पुल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संबंधित अधिकारियों को नियमित निरीक्षण रिपोर्ट, मरम्मत कार्यों की स्थिति और आवश्यक सुरक्षा उपायों की समीक्षा करनी चाहिए।
साथ ही यह भी जांचा जाना चाहिए कि हादसे वाले हिस्से में पहले से क्षति मौजूद थी या हाल के दिनों में समस्या उत्पन्न हुई। यदि क्षति पहले से थी, तो उसे ठीक करने के लिए क्या कदम उठाए गए थे?
इन सवालों के जवाब मिलने से रखरखाव व्यवस्था की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
बड़े हादसे से पहले सुरक्षा इंतजाम जरूरी
जीटीआर ब्रिज पर डिप्टी स्टेशन सुपरिटेंडेंट संतोष कुमार पांडेय के साथ हुई घटना एक गंभीर चेतावनी के रूप में सामने आई है। करीब छह दशक पुराने पुल पर क्षतिग्रस्त पटिया और गड्ढों को नजरअंदाज करना राहगीरों की सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
आवश्यक है कि संबंधित विभाग पुल के क्षतिग्रस्त हिस्सों की तत्काल जांच कराए और जहां जरूरत हो, वहां मरम्मत तथा अस्थायी सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करे। इसके साथ ही पुल की वर्तमान संरचनात्मक स्थिति का तकनीकी मूल्यांकन भी उपयोगी होगा।
फिलहाल घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब पुल के रखरखाव पर लगातार खर्च किया जा रहा है, तो आवागमन करने वालों को सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराने में कमी क्यों दिखाई दे रही है। अब संबंधित अधिकारियों की प्रतिक्रिया और सुरक्षा के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर नजर रहेगी।





