उत्तर प्रदेश

बांकेबिहारी की महारास मुद्रा के दर्शन आज, जन्मस्थान पर होंगे विशेष आयोजन

nidhi
25 Oct 2026 7:54 AM IST
बांकेबिहारी की महारास मुद्रा के दर्शन आज, जन्मस्थान पर होंगे विशेष आयोजन
x

मथुरा/वृंदावन: शरद पूर्णिमा के अवसर पर रविवार, 25 अक्टूबर को ब्रज के मंदिरों में विशेष शृंगार, सेवा और धार्मिक आयोजनों की तैयारियां हैं। वृंदावन के ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में भगवान श्वेत पोशाक और मुरली के साथ महारास की मुद्रा में दर्शन देंगे। वहीं, मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर श्रीकेशवदेवजी के लिए चंद्रलोक की झांकी सजाई जाएगी। जन्मस्थान के घोषित कार्यक्रम के अनुसार, शाम चार बजे से विशेष पुष्प-बंगले के दर्शन प्रारंभ होने हैं। पर्व पर ठाकुरजी की सेवा-आराधना के साथ छप्पनभोग और भजन संध्या के आयोजन भी निर्धारित हैं।

बांकेबिहारी मंदिर में शरद पूर्णिमा का उत्सव वर्ष के विशेष अवसरों में शामिल है। इस दिन ठाकुरजी के शृंगार में सफेद वस्त्र, मोर मुकुट और मुरली का विशेष महत्व रहता है। श्रद्धालु इस स्वरूप के दर्शन के लिए वर्षभर प्रतीक्षा करते हैं। मंदिर की परंपरा के अनुसार, शरद पूर्णिमा पर ठाकुरजी को महारास की मुद्रा में सजाया जाता है। सामान्य दिनों से अलग इस झांकी में भगवान के अधरों पर मुरली दिखाई देती है, जो उत्सव का प्रमुख आकर्षण है।
मंदिर सेवायत श्रीनाथ गोस्वामी के अनुसार, इस अवसर पर बांकेबिहारीजी का स्वर्ण, रजत और रत्नजड़ित आभूषणों से शृंगार किया जाता है। शाम को उन्हें जगमोहन में चांदी के सिंहासन पर विराजमान कराया जाएगा। चांदनी में ठाकुरजी के दर्शन की परंपरा इस पर्व को विशिष्ट बनाती है। सफेद पोशाक और आभूषणों के साथ यह झांकी शरद की धवल चांदनी की भावना को अभिव्यक्त करती है। श्रद्धालु अपने आराध्य के इस स्वरूप के दर्शन कर प्रार्थना करते हैं।
ब्रज की धार्मिक मान्यता में शरद पूर्णिमा भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से जुड़ी है। भक्त इस पर्व को राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम और भक्ति के उत्सव के रूप में मनाते हैं। बांकेबिहारी का मुरली धारण करना भी इसी लीला की स्मृति से संबंधित माना जाता है। यहां शृंगार केवल वस्त्र और आभूषण बदलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि मंदिर की सेवा परंपरा में लीला का भाव प्रस्तुत करने का माध्यम है। इसी कारण इस दिन के दर्शन को श्रद्धालु विशेष महत्व देते हैं।
श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर उत्सव के लिए सुबह से शाम तक विभिन्न कार्यक्रम निर्धारित किए गए हैं। सेवा संस्थान की जानकारी के मुताबिक, सुबह नौ बजे श्रीगिरिराजजी महाराज के महाभिषेक से कार्यक्रम प्रारंभ होने हैं। इसके बाद सेवा-पूजन, बालभोग वितरण और गो-पूजन का आयोजन रखा गया है। सुबह 11 बजे से प्रसादी भंडारे की व्यवस्था बताई गई है। शाम के आयोजन में श्रीकेशवदेवजी और श्रीगिरिराजजी के विशेष दर्शन तथा छप्पनभोग प्रमुख रहेंगे। शरद पूर्णिमा के उत्सव में श्वेत रंग का विशेष स्थान दिखाई देता है। सफेद पोशाक, धवल सजावट और चांदनी से जुड़ी झांकियां पर्व के धार्मिक भाव को सामने लाती हैं। बांकेबिहारी मंदिर में भी इसी भाव के अनुरूप ठाकुरजी का स्वरूप सजाया जाता है। भक्तों के लिए यह अवसर अपने आराध्य की ऐसी छवि देखने का है, जो रोजमर्रा के दर्शन से अलग होती है। मुरली और महारास मुद्रा इस दिन की पहचान बनते हैं।
इस तिथि पर ठाकुरजी को मुरली अर्पित करने की परंपरा भी है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और श्रद्धा के अनुसार सोने या चांदी की मुरली चढ़ाते हैं। धार्मिक विश्वास है कि ऐसा कर भक्त सुख, शांति और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हैं। यह आस्था से जुड़ी परंपरा है। मंदिर सेवायतों द्वारा बताए गए विधान में मुरली का संबंध भगवान के महारास स्वरूप से है। इसी भाव के साथ लोग दर्शन और अर्पण में भाग लेते हैं। वृंदावन में इस उत्सव का संबंध व्यापक कृष्णभक्ति परंपरा से भी है। बांकेबिहारी के प्राकट्य स्थल के रूप में प्रसिद्ध निधिवन और महारास से जुड़ी ब्रज की मान्यताएं श्रद्धालुओं की आस्था का हिस्सा हैं। शरद पूर्णिमा पर मंदिरों में प्रस्तुत झांकियां इन्हीं धार्मिक स्मृतियों को जीवंत करती हैं। विभिन्न मंदिर अपनी सेवा पद्धति के अनुसार पर्व मनाते हैं, इसलिए शृंगार और दर्शन की व्यवस्था हर स्थान पर एक जैसी नहीं होती।
ब्रज में शरद उत्सव का केंद्र भगवान के विशेष स्वरूप के दर्शन और सामूहिक आराधना रहती है। श्रद्धालु पूजा, प्रसाद अर्पण और भजन के माध्यम से पर्व में शामिल होते हैं। वर्ष में एक बार होने वाले बांकेबिहारी के मुरली दर्शन के कारण इस दिन की अलग पहचान है। मंदिर की परंपरा से परिचित भक्तों के साथ पहली बार आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी यह झांकी आकर्षण का विषय रहती है। शरद पूर्णिमा की शाम ब्रज के इन आयोजनों में शृंगार, संगीत और भक्ति का संगम दिखाई देगा। वृंदावन में बांकेबिहारी का महारास स्वरूप और मथुरा में जन्मस्थान की चंद्रलोक झांकी पर्व के प्रमुख आकर्षण होंगे। विशेष आयोजनों में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं के लिए संबंधित मंदिर की वर्तमान दर्शन व्यवस्था की जानकारी लेना उपयोगी रहेगा।
Next Story