उत्तर प्रदेश

80 हजार किसानों पर संकट, दो चीनी मिलों पर मंडराया बिक्री का खतरा

Saba Naaz
25 July 2026 7:18 PM IST
80 हजार किसानों पर संकट, दो चीनी मिलों पर मंडराया बिक्री का खतरा
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बरेली: बहेड़ी और नवाबगंज चीनी मिलें आर्थिक संकट के कारण बंद होने और बिकने की कगार पर पहुंच गई हैं। इन मिलों से जुड़े करीब 80 हजार किसानों और 1650 कर्मचारियों की आजीविका पर संकट मंडरा रहा है। किसानों का करोड़ों रुपये का गन्ना मूल्य भुगतान अब तक लंबित है, वहीं मिलों की जमीन की नीलामी को लेकर भी विवाद बढ़ता जा रहा है। स्थानीय किसानों और कर्मचारियों का कहना है कि यदि दोनों चीनी मिलें बंद हो गईं तो क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ेगा।

बहेड़ी की केसर चीनी मिल और नवाबगंज की ओसवाल चीनी मिल कभी हजारों परिवारों के लिए रोजगार और आर्थिक मजबूती का बड़ा आधार हुआ करती थीं। इन मिलों से जुड़े किसान अपनी गन्ने की फसल बेचकर परिवार का पालन-पोषण करते थे, जबकि बड़ी संख्या में मजदूर और कर्मचारी यहां काम करते थे। अब आर्थिक बदहाली के कारण इन मिलों के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं।

बहेड़ी स्थित केसर चीनी मिल की स्थापना वर्ष 1933 में किलाचंद समूह ने की थी। यह क्षेत्र की सबसे पुरानी औद्योगिक इकाइयों में शामिल रही है। शुरुआती दौर में इसकी पेराई क्षमता 800 टन प्रतिदिन थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 7200 टन प्रतिदिन तक कर दिया गया। मिल में चीनी उत्पादन के साथ-साथ डिस्टिलरी, इथेनाल और खोई आधारित बिजली उत्पादन जैसी गतिविधियां भी संचालित होती थीं।

मिल पर किसानों का करीब 146 करोड़ रुपये का गन्ना मूल्य बकाया बताया जा रहा है। भुगतान नहीं होने के कारण किसानों और मिल प्रबंधन के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है। प्रशासन की ओर से कार्रवाई करते हुए संपत्तियों की कुर्की और नीलामी की प्रक्रिया शुरू की गई। इसी क्रम में तहसील प्रशासन ने केसर चीनी मिल की करीब 11.447 हेक्टेयर जमीन को 28.05 करोड़ रुपये में नीलाम किया था।

हालांकि किसानों और स्थानीय लोगों ने इस नीलामी पर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि हाईवे किनारे स्थित करीब 100 करोड़ रुपये मूल्य की जमीन को कम कीमत में बेचने का प्रयास किया गया। इसके बाद गन्ना समिति बोर्ड और किसानों ने नीलामी प्रक्रिया को रद्द कर नए सिरे से कराने की मांग उठाई। विवाद बढ़ने के बाद प्रशासन ने दोबारा प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी की है।

वहीं नवाबगंज स्थित ओसवाल चीनी मिल की स्थापना वर्ष 1996 में हुई थी। इस मिल की शुरुआत से क्षेत्र के किसानों को काफी फायदा मिला था। मिल शुरू होने के बाद गन्ने का उत्पादन बढ़ा और करीब 40 हजार किसान परिवार इससे जुड़ गए। मिल में 50 स्थायी कर्मचारियों के अलावा लगभग 300 सीजनल कर्मचारी काम करते थे।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण मिल पर करीब 55 करोड़ रुपये का गन्ना मूल्य बकाया हो गया। भुगतान नहीं होने पर प्रशासन ने कार्रवाई शुरू की और नीलामी की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। बीते पेराई सत्र में शासन की ओर से मिल को गन्ना आवंटन भी नहीं किया गया, जिससे इसके बंद होने की आशंका और बढ़ गई है।

किसानों का कहना है कि चीनी मिलों को बंद करने के बजाय सरकार को किसानों के बकाया भुगतान की व्यवस्था करनी चाहिए और मिलों को दोबारा शुरू कराने के लिए मदद करनी चाहिए। उनका कहना है कि मिलें बंद होने से केवल उद्योग प्रभावित नहीं होगा, बल्कि हजारों परिवारों की आय का जरिया भी खत्म हो जाएगा।

गन्ना समिति के निदेशक चौधरी ओमवीर सिंह ने कहा कि किसानों की इच्छा मिल बंद करने की नहीं है। अगर किसान चाहते तो गन्ने की आपूर्ति रोककर मिल को पहले ही बंद कर सकते थे, लेकिन उनकी मांग है कि सरकार समाधान निकालकर मिलों को बचाए और किसानों का भुगतान कराए।

प्रशासन का कहना है कि मिलों को बंद होने से बचाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार किसानों के भुगतान और मिलों की स्थिति सुधारने को लेकर लगातार बातचीत जारी है। हालांकि अभी तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है। आने वाले समय में सरकार और प्रशासन क्या कदम उठाते हैं, इस पर हजारों किसानों और कर्मचारियों की नजरें टिकी हुई हैं।

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