उत्तर प्रदेश

420 करोड़ के रेल सह सड़क पुल के पिलर में दिखी दरार सुरक्षा और गुणवत्ता पर उठे सवाल

Kavita2
11 Sept 2026 3:32 PM IST
420 करोड़ के रेल सह सड़क पुल के पिलर में दिखी दरार सुरक्षा और गुणवत्ता पर उठे सवाल
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गाजीपुर : गंगा नदी पर करीब 420 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित रेल सह सड़क पुल के एक पिलर के आसपास दरार जैसी स्थिति दिखाई देने के बाद निर्माण की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सामने आई तस्वीरों में पिलर के दोनों ओर बने कंक्रीट के हिस्से पर लंबी दरारनुमा रेखा स्पष्ट नजर आ रही है। मामला सामने आने के बाद पुल की तकनीकी जांच कराने और स्थिति स्पष्ट करने की मांग तेज हो गई है।

यह रेल सह सड़क पुल यातायात के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके जरिए रेलगाड़ियों के साथ सड़क वाहनों का भी आवागमन होता है। ऐसे में पिलर के आसपास किसी प्रकार की दरार दिखाई देना लोगों के लिए चिंता का विषय बन गया है। हालांकि, तकनीकी निरीक्षण के बिना यह स्पष्ट नहीं किया जा सकता कि दिखाई दे रही दरार केवल सतही प्लास्टर अथवा कंक्रीट की परत में है या इसका संबंध पुल की मुख्य संरचना से है।

तस्वीरों में पिलर के दोनों तरफ बने कंक्रीट के हिस्से पर लंबी रेखा जैसी संरचना नजर आ रही है। स्थानीय लोगों और यात्रियों का कहना है कि इतनी बड़ी लागत से बने पुल पर इस तरह के निशान दिखाई देना सामान्य बात नहीं मानी जानी चाहिए। उनका कहना है कि संबंधित विभाग को विशेषज्ञ इंजीनियरों की टीम भेजकर तत्काल निरीक्षण कराना चाहिए और जांच के नतीजे सार्वजनिक करने चाहिए।

गंगा नदी के बीच स्थित किसी पुल के पिलर और उसके आसपास निर्मित सुरक्षा ढांचे की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। पुल का पूरा भार पिलरों के माध्यम से नींव तक पहुंचता है। इसके अलावा नदी का तेज बहाव, पानी का दबाव, जलस्तर में लगातार बदलाव, कटाव और बाढ़ के दौरान बहकर आने वाली सामग्री भी ढांचे को प्रभावित कर सकती है। ऐसी परिस्थितियों में प्रत्येक पिलर की नियमित निगरानी और समय-समय पर संरचनात्मक परीक्षण आवश्यक होता है।

जानकारों के अनुसार, नदी पर बने पुलों की जांच में केवल दिखाई देने वाली सतह का निरीक्षण पर्याप्त नहीं होता। पिलर की मजबूती, नींव के आसपास कटाव, कंक्रीट की गुणवत्ता, सरियों की स्थिति तथा जोड़ वाले हिस्सों की तकनीकी जांच भी जरूरी होती है। इसके लिए विशेषज्ञ दृश्य परीक्षण के साथ आधुनिक उपकरणों और गैर-विनाशकारी परीक्षण तकनीकों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि दरार सतही है या पुल की संरचना को प्रभावित करने वाली है।

फिलहाल संबंधित दरार की प्रकृति के बारे में कोई अंतिम तकनीकी निष्कर्ष सामने नहीं आया है। इसलिए तस्वीर के आधार पर पुल को असुरक्षित घोषित करना जल्दबाजी होगी। इसके बावजूद रेल और सड़क यातायात से जुड़े इस ढांचे की संवेदनशीलता को देखते हुए मामले को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लोगों का कहना है कि एहतियात के तौर पर तत्काल विस्तृत निरीक्षण कराया जाना चाहिए।

करीब 420 करोड़ रुपये की लागत से बने इस पुल की गुणवत्ता पर सवाल उठने के बाद निर्माण एजेंसी और संबंधित विभाग की जवाबदेही भी चर्चा में है। इतनी बड़ी सार्वजनिक परियोजना में उपयोग की गई निर्माण सामग्री, निर्धारित मानकों के पालन तथा काम की निगरानी से जुड़े दस्तावेजों की समीक्षा की मांग की जा रही है। यह भी जांच का विषय हो सकता है कि पुल बनने के बाद निर्धारित समय पर उसका रखरखाव और सुरक्षा ऑडिट किया गया या नहीं।

रेल सह सड़क पुल सामान्य सड़क पुलों की तुलना में अधिक संवेदनशील होते हैं क्योंकि इन पर अलग-अलग प्रकार का भार पड़ता है। रेलगाड़ी गुजरने के दौरान पैदा होने वाला कंपन और भारी वाहनों का लगातार आवागमन संरचना पर दबाव डालता है। ऐसे पुलों के डिजाइन में सुरक्षा के कई स्तर शामिल किए जाते हैं, लेकिन नियमित रखरखाव नहीं होने पर छोटी खराबी भी समय के साथ बड़ी समस्या का रूप ले सकती है।

स्थानीय लोगों ने आशंका व्यक्त की है कि बरसात और बाढ़ के मौसम में गंगा का बढ़ा हुआ जलस्तर पिलर के आसपास बने हिस्से पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। नदी की धारा में बदलाव होने पर नींव के आसपास मिट्टी या बालू का कटाव भी हो सकता है। इसलिए पिलर के ऊपरी हिस्से के साथ नदी के भीतर स्थित नींव और आसपास के तल का सर्वेक्षण कराने की आवश्यकता बताई जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कंक्रीट में दरारें अलग-अलग कारणों से बन सकती हैं। तापमान में बदलाव, सामग्री का सिकुड़ना, निर्माण जोड़, नमी, पानी का प्रवेश, भार और नींव में हलचल इनके संभावित कारण हो सकते हैं। कुछ दरारें केवल सतही होती हैं और मरम्मत के बाद खतरा नहीं रहता, जबकि कुछ संरचनात्मक कमजोरी की ओर संकेत कर सकती हैं। वास्तविक कारण का पता विस्तृत इंजीनियरिंग परीक्षण से ही चल सकता है।

मामले में संबंधित विभाग से आधिकारिक स्पष्टीकरण की अपेक्षा की जा रही है। विभाग को यह बताना होगा कि दिखाई दे रही रेखा वास्तव में दरार है या निर्माण के दौरान बने किसी जोड़ का हिस्सा। यदि यह दरार है तो इसकी लंबाई, चौड़ाई और गहराई कितनी है तथा क्या इससे पुल की भार वहन क्षमता पर कोई प्रभाव पड़ सकता है। लोगों को आश्वस्त करने के लिए जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करना भी जरूरी माना जा रहा है।

यदि प्रारंभिक जांच में किसी प्रकार की कमजोरी सामने आती है तो वाहनों और ट्रेनों की आवाजाही को नियंत्रित करने जैसे एहतियाती कदम उठाए जा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर प्रभावित हिस्से की मरम्मत, कंक्रीट ग्राउटिंग, अतिरिक्त मजबूती या सुरक्षा घेरा तैयार किया जा सकता है। इसके साथ ही अन्य सभी पिलरों का भी निरीक्षण कराया जाना चाहिए, ताकि संभावित कमियों की समय रहते पहचान हो सके।

इस घटना ने एक बार फिर बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की नियमित निगरानी की आवश्यकता को सामने ला दिया है। सार्वजनिक धन से बने किसी भी पुल की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी, लेकिन तब तक संबंधित एजेंसी से त्वरित निरीक्षण और पारदर्शी जानकारी की मांग की जा रही है।

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