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Linepar के नए नाम को लेकर विवाद, सैनी समाज ने स्थानीय पहचान का मुद्दा उठाया

Moradabad मुरादाबाद : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुरादाबाद दौरे के दौरान की गई एक महत्वपूर्ण घोषणा के बाद शहर में सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर नई चर्चा शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री ने जनसभा को संबोधित करते हुए घोषणा की कि मुरादाबाद के लाइनपार क्षेत्र को अब ‘दाऊदयाल खन्ना नगर’ के नाम से जाना जाएगा। उन्होंने बताया कि यह निर्णय श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ नेता और मुरादाबाद की प्रमुख राजनीतिक हस्ती रहे दाऊदयाल खन्ना के सम्मान में लिया गया है। इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने गुरु जंभेश्वर मंदिर कॉरिडोर के विकास की भी घोषणा की।
मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद सैनी समाज के कई नेताओं और सामाजिक संगठनों ने इस फैसले पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि लाइनपार क्षेत्र में सैनी समाज की बड़ी आबादी निवास करती है और इस इलाके की सामाजिक तथा सांस्कृतिक पहचान लंबे समय से इस समाज से जुड़ी रही है। ऐसे में क्षेत्र का नाम बदलने से पहले स्थानीय लोगों की राय और भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए था।सैनी समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि सरकार क्षेत्र का नाम बदलना चाहती है तो किसी ऐसे समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी या महापुरुष के नाम पर विचार किया जाना चाहिए, जिनका संबंध स्थानीय इतिहास और समाज से रहा हो। उनका कहना है कि नामकरण जैसे निर्णय स्थानीय पहचान और जनभावनाओं को ध्यान में रखकर किए जाने चाहिए।
समाज के नेताओं ने स्पष्ट किया कि वे दाऊदयाल खन्ना के योगदान का सम्मान करते हैं और उनके सार्वजनिक जीवन की सराहना भी करते हैं। हालांकि उनका मानना है कि किसी क्षेत्र का नाम बदलते समय वहां के निवासियों की सामाजिक संरचना और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को भी महत्व दिया जाना चाहिए।मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में कहा था कि राज्य सरकार मुरादाबाद के समग्र विकास के लिए लगातार कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि गुरु जंभेश्वर मंदिर कॉरिडोर का विकास और लाइनपार क्षेत्र का नया नाम शहर की ऐतिहासिक विरासत को नई पहचान देने की दिशा में उठाया गया कदम है।
मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद अब इस विषय पर विभिन्न सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। सैनी समाज के प्रतिनिधियों ने सरकार से मांग की है कि नामकरण जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों से पहले स्थानीय नागरिकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों से व्यापक संवाद किया जाए, ताकि सभी वर्गों की भावनाओं का सम्मान सुनिश्चित हो सके।फिलहाल सरकार की ओर से इस संबंध में कोई नया स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है। ऐसे में यह मुद्दा आने वाले दिनों में सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर चर्चा का विषय बना रह सकता है।





