उत्तर प्रदेश

CM योगी बोले संस्कृति ही जीवन को सही दिशा देने का आधार

Ratna Netam
4 Oct 2026 5:30 PM IST
CM योगी बोले संस्कृति ही जीवन को सही दिशा देने का आधार
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लखनऊ। गायत्री तीर्थ शांतिकुंज के निर्देशों के तहत देशभर में कक्षा 5 से लेकर कॉलेज स्तर तक के विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों, जीवन आदर्शों और सामाजिक जिम्मेदारियों से जोड़ने के उद्देश्य से **‘भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा’** आयोजित की जा रही है। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित राम मनोहर लोहिया नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में शिक्षकों और सहयोगियों के लिए **‘प्रांतीय शिक्षक गरिमा कार्यशाला’** का आयोजन किया गयाकार्यशाला के उद्घाटन सत्र में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता देव संस्कृति विश्वविद्यालय के उपाध्यक्ष चिन्मय पांड्या ने की। इस दौरान भारतीय संस्कृति, शिक्षा व्यवस्था में नैतिक मूल्यों
की भूमिका और नई पीढ़ी को देश की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने जैसे विषयों पर चर्चा हुई।मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति केवल परंपराओं और रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं है। यह उन मूल्यों की आधारशिला है, जो व्यक्ति के जीवन को सही दिशा देने का काम करते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में मानवता, कर्तव्य, अनुशासन, सेवा, त्याग और नैतिकता जैसे मूल्यों को विशेष स्थान दिया गया है।उन्होंने कहा कि बच्चों और युवाओं के व्यक्तित्व निर्माण में शिक्षा की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना या रोजगार प्राप्त करना नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके माध्यम से विद्यार्थियों में जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और समाज के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण भी विकसित होना चाहिए।
संस्कृति और शिक्षा के बीच मजबूत संबंध
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति की विशेषता इसकी व्यापक सोच में है। इसमें व्यक्ति के साथ-साथ समाज, प्रकृति और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना को भी महत्व दिया गया है। ऐसे मूल्यों को विद्यार्थियों तक पहुंचाने में शिक्षक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।उन्होंने कहा कि शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले व्यक्ति नहीं होते, बल्कि वे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व और सोच को आकार देने में भी योगदान देते हैं। इसलिए शिक्षकों को स्वयं भी सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूक रहना चाहिए, ताकि वे बच्चों को केवल किताबों का ज्ञान न देकर जीवन के जरूरी मूल्यों से भी परिचित करा सकें।
भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का उद्देश्य
‘भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा’ का आयोजन विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों से परिचित कराने के उद्देश्य से किया जा रहा है। इस परीक्षा में कक्षा 5 से लेकर कॉलेज स्तर तक के विद्यार्थी शामिल हो सकते हैं।इस पहल के जरिए विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति की विविधता, महान परंपराओं, नैतिक मूल्यों और जीवन आदर्शों के बारे में जानकारी देने का प्रयास किया जा रहा है। इसका उद्देश्य बच्चों और युवाओं में अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति समझ और रुचि विकसित करना भी है।कार्यशाला में शिक्षकों और सहयोगियों को परीक्षा की प्रक्रिया, उद्देश्य और विद्यार्थियों तक इसके संदेश को पहुंचाने की भूमिका के बारे में जानकारी दी गई। आयोजकों का जोर इस बात पर रहा कि अधिक से अधिक विद्यार्थी इस पहल से जुड़ें और भारतीय संस्कृति के मूल तत्वों को समझें।
शिक्षकों की भूमिका पर जोर
‘प्रांतीय शिक्षक गरिमा कार्यशाला’ में शिक्षकों की भूमिका को विशेष महत्व दिया गया। शिक्षकों को विद्यार्थियों के मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण कड़ी बताया गया। कार्यक्रम में यह विचार सामने रखा गया कि यदि शिक्षक बच्चों को पढ़ाई के साथ नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ते हैं तो इसका प्रभाव उनके व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन पर भी पड़ सकता है।शिक्षक विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराने के साथ उन्हें अपने आसपास के समाज के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इससे शिक्षा और संस्कार के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने में मदद मिल सकती है।
भारतीय संस्कृति केवल परंपरा नहीं
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में इस बात पर विशेष जोर दिया कि भारतीय संस्कृति को केवल परंपराओं के रूप में देखने की जरूरत नहीं है। उन्होंने इसे जीवन को दिशा देने वाले मूल्यों से जोड़ा।उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में सत्य, अनुशासन, सेवा, त्याग और कर्तव्य जैसे विचारों का महत्व रहा है। यही मूल्य व्यक्ति के चरित्र निर्माण में भूमिका निभाते हैं। आधुनिक समय में तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से बदलाव हो रहा है, ऐसे में विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास में नैतिक आधार को मजबूत करना भी जरूरी है।उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और विरासत की जानकारी होने से उनमें आत्मविश्वास और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना विकसित हो सकती है। साथ ही भारतीय संस्कृति की विविधता और समावेशी दृष्टिकोण को समझने से समाज में सकारात्मक सोच को बढ़ावा मिल सकता है।
युवाओं को मूल्यों से जोड़ने की पहल
भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा को युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने की एक पहल के रूप में देखा जा रहा है। परीक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति से संबंधित विषयों को समझने और उनके बारे में जानकारी हासिल करने का अवसर मिलेगा।कार्यक्रम में मौजूद शिक्षकों और सहयोगियों से अपेक्षा की गई कि वे अपने-अपने संस्थानों में विद्यार्थियों को इस पहल के बारे में जानकारी दें और उन्हें परीक्षा में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें। इससे स्कूलों और कॉलेजों के स्तर पर भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों को लेकर संवाद को बढ़ावा मिल सकता है।
चिन्मय पांड्या ने की अध्यक्षता
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता देव संस्कृति विश्वविद्यालय के उपाध्यक्ष चिन्मय पांड्या ने की। कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति और शिक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श हुआ।चिन्मय पांड्या की अध्यक्षता में आयोजित इस सत्र में शिक्षकों और सहयोगियों को सांस्कृतिक शिक्षा के महत्व और विद्यार्थियों के बीच भारतीय जीवन मूल्यों को पहुंचाने की आवश्यकता पर चर्चा की गई। कार्यक्रम का उद्देश्य शिक्षकों को इस अभियान से जोड़ना और उन्हें विद्यार्थियों तक इसके संदेश को प्रभावी ढंग से पहुंचाने के लिए तैयार करना रहा।
राष्ट्र निर्माण में शिक्षा की भूमिका
कार्यशाला में शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम बताया गया। विद्यार्थियों को केवल अकादमिक ज्ञान देने के साथ उनके चरित्र और व्यक्तित्व का विकास भी जरूरी माना गया।भारतीय संस्कृति में व्यक्ति के विकास को समाज और राष्ट्र के विकास से जोड़कर देखा जाता है। इसी दृष्टिकोण के तहत विद्यार्थियों में अनुशासन, जिम्मेदारी, सेवा और सामाजिक संवेदनशीलता जैसे गुण विकसित करने पर जोर दिया गया।आयोजकों का मानना है कि यदि विद्यार्थी अपनी संस्कृति और मूल्यों को समझते हुए आधुनिक शिक्षा प्राप्त करते हैं तो वे भविष्य में समाज और देश के विकास में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं।
देशभर में आयोजित हो रही परीक्षा
गायत्री तीर्थ शांतिकुंज के निर्देशों के तहत ‘भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा’ को देशभर में आयोजित किया जा रहा है। इसमें अलग-अलग शैक्षणिक स्तरों के विद्यार्थियों को शामिल करने का प्रयास किया जा रहा है।कक्षा 5 से कॉलेज स्तर तक विद्यार्थियों को इस अभियान से जोड़कर आयोजक इसे व्यापक स्तर तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। लखनऊ में आयोजित शिक्षक कार्यशाला इसी अभियान को उत्तर प्रदेश में मजबूत करने की दिशा में एक कदम है।कार्यशाला के माध्यम से शिक्षकों को अभियान की जानकारी देने के साथ विद्यार्थियों तक भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों का संदेश पहुंचाने पर जोर दिया गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी भारतीय संस्कृति को जीवन को सही दिशा देने वाली मूल्य व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया।
कुल मिलाकर, लखनऊ में आयोजित ‘प्रांतीय शिक्षक गरिमा कार्यशाला’ ने शिक्षा, संस्कृति और नैतिक मूल्यों के बीच संबंध को केंद्र में रखा। भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के जरिए विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत और जीवन आदर्शों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। आने वाले समय में इस पहल की पहुंच कितनी व्यापक होती है, यह विद्यार्थियों, शिक्षकों और शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी पर निर्भर करेगा।

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