उत्तर प्रदेश

जर्जर भवन में पढ़ने को मजबूर बच्चे, स्कूल की छत टपकी और दीवारों से उखड़ा प्लास्टर

Kavita2
15 Sept 2026 5:22 PM IST
जर्जर भवन में पढ़ने को मजबूर बच्चे, स्कूल की छत टपकी और दीवारों से उखड़ा प्लास्टर
x

रतलाम। मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय की बदहाल स्थिति ने ग्रामीण क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था और बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सैलाना क्षेत्र के कसाखारी गांव में शिवगढ़ मार्ग पर स्थित इस विद्यालय की छत से बारिश का पानी टपक रहा है। दीवारों का प्लास्टर उखड़ चुका है, पीने के पानी के नल टूटे और अनुपयोगी पड़े हैं, जबकि शौचालयों में भी उचित सुविधाओं का अभाव बताया जा रहा है। ऐसी स्थिति में छोटे बच्चों को विद्यालय में बैठाकर पढ़ाना शिक्षकों के लिए चुनौती और अभिभावकों के लिए चिंता का विषय बन गया है।

विद्यालय परिसर की स्थिति देखकर पता चलता है कि भवन लंबे समय से मरम्मत का इंतजार कर रहा है। बारिश होने पर छत से पानी कक्षाओं के भीतर पहुंच जाता है। इससे बच्चों के बैठने की जगह प्रभावित होने के साथ उनकी किताबें, कॉपियां और विद्यालय की अन्य सामग्री खराब होने का खतरा बना रहता है। लगातार नमी रहने से भवन की दीवारें भी कमजोर होती जा रही हैं। कई स्थानों पर प्लास्टर उखड़ने के कारण ईंटें और सीमेंट दिखाई देने लगे हैं।

विद्यालय का एक कमरा नीले रंग से रंगा हुआ है, लेकिन रंगी हुई दीवारें परिसर में मौजूद बुनियादी समस्याओं को नहीं छिपा पा रही हैं। कक्षा की बाहरी सजावट और भवन की वास्तविक हालत के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। बच्चों को सुरक्षित कक्षा, स्वच्छ पेयजल और उपयोग योग्य शौचालय जैसी आवश्यक सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। इससे न केवल उनकी पढ़ाई प्रभावित होने की आशंका है, बल्कि विद्यालय आने में उनकी रुचि भी कम हो सकती है।

स्कूल के एक शिक्षक के अनुसार पिछले दो से तीन वर्षों के दौरान भवन की स्थिति लगातार खराब हुई है। पहले विद्यालय में आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध थीं, लेकिन समय पर देखरेख और मरम्मत नहीं होने के कारण समस्याएं बढ़ती चली गईं। शिक्षक का कहना है कि अब भवन को प्रशासन के तत्काल ध्यान की जरूरत है। बारिश के दौरान छत से पानी टपकने के कारण बच्चों को सुरक्षित स्थान पर बैठाने की व्यवस्था करनी पड़ती है।

विद्यालय में पीने के पानी की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली बताई गई है। परिसर में लगे नल टूटे हुए हैं अथवा उनमें पानी उपलब्ध नहीं है। इससे विद्यार्थियों और शिक्षकों को पेयजल के लिए दूसरी व्यवस्था पर निर्भर रहना पड़ सकता है। छोटे बच्चों वाले प्राथमिक विद्यालय में स्वच्छ पेयजल का अभाव उनके स्वास्थ्य के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकता है। ग्रामीणों का कहना है कि नल और जलापूर्ति व्यवस्था को ठीक करने के लिए संबंधित विभाग को शीघ्र कदम उठाने चाहिए।

शौचालयों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं बताई जा रही है। कुछ शौचालयों में दरवाजों और पानी की समुचित व्यवस्था नहीं होने की बात सामने आई है। खुले अथवा उपयोग योग्य नहीं रहे शौचालय विशेष रूप से छात्राओं की परेशानी बढ़ा सकते हैं। स्कूल में स्वच्छ और सुरक्षित शौचालय नहीं होने से बच्चों को असुविधा होती है तथा स्वच्छता संबंधी समस्याएं पैदा होने का खतरा रहता है।

अभिभावकों की सबसे बड़ी चिंता बच्चों की सुरक्षा को लेकर है। उनका कहना है कि उखड़ते प्लास्टर और कमजोर छत के नीचे बच्चों का बैठना जोखिमपूर्ण हो सकता है। यदि छत या दीवार से अचानक मलबा गिरा तो कोई गंभीर दुर्घटना हो सकती है। बारिश के दिनों में यह खतरा और बढ़ जाता है, क्योंकि लगातार पानी का रिसाव भवन को अधिक कमजोर कर सकता है। ग्रामीणों ने विद्यालय भवन का तकनीकी निरीक्षण कराने की मांग की है।

ग्रामीणों के अनुसार स्कूल भवन की केवल ऊपरी मरम्मत करने के बजाय उसकी मजबूती का आकलन कराया जाना चाहिए। यदि भवन सुरक्षित पाया जाता है तो छत की जलरोधक मरम्मत, प्लास्टर, नल और शौचालयों को ठीक किया जाए। यदि भवन उपयोग के योग्य नहीं है तो बच्चों के लिए वैकल्पिक सुरक्षित कक्ष उपलब्ध कराते हुए नए भवन या अतिरिक्त कक्षों का निर्माण कराया जाना चाहिए।

सरकारी विद्यालय ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों की शिक्षा का प्रमुख आधार हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के अधिकांश बच्चे इन्हीं विद्यालयों में पढ़ते हैं। ऐसे में स्कूल भवन में बुनियादी सुविधाओं की कमी सीधे तौर पर बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य, उपस्थिति और भविष्य को प्रभावित करती है। विद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ सुरक्षित परिसर उपलब्ध कराना भी उतना ही आवश्यक है।

स्थानीय लोगों ने शिक्षा विभाग, जनपद पंचायत और जिला प्रशासन से स्कूल का निरीक्षण कराने की मांग की है। ग्रामीण चाहते हैं कि मरम्मत के लिए आवश्यक राशि जल्द स्वीकृत की जाए और काम की समयसीमा तय हो। उनका कहना है कि केवल निरीक्षण या आश्वासन देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। भवन की छत, दीवारों, पेयजल व्यवस्था और शौचालयों को प्राथमिकता के आधार पर दुरुस्त करना जरूरी है।

विद्यालय की बदहाली ने ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों के रखरखाव की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। भवनों का नियमित निरीक्षण किया जाए तो ऐसी समस्याओं की पहचान समय रहते हो सकती है। छोटे नुकसान की तत्काल मरम्मत नहीं होने पर वही समस्या बाद में बड़े खतरे और अधिक खर्च का कारण बन जाती है।

फिलहाल इस मामले में शिक्षा विभाग अथवा जिला प्रशासन का विस्तृत आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है। विद्यालय की कमियों और भवन की सुरक्षा का अंतिम आकलन विभागीय निरीक्षण के बाद ही स्पष्ट होगा। शिक्षक, अभिभावक और ग्रामीण अब प्रशासन की ओर देख रहे हैं, ताकि बच्चों को जर्जर भवन के खतरे से निकालकर सुरक्षित वातावरण में पढ़ाई का अवसर मिल सके।

Next Story