उत्तर प्रदेश

देवशयनी एकादशी से शुरू हुआ चातुर्मास, चार महीने शुभ कार्यों पर रोक

Saba Naaz
23 July 2026 3:08 PM IST
देवशयनी एकादशी से शुरू हुआ चातुर्मास, चार महीने शुभ कार्यों पर रोक
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उत्तर प्रदेश: आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और चार महीने तक चलने वाले चातुर्मास की शुरुआत होती है। वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी 25 जुलाई, शनिवार को मनाई जाएगी। इस अवधि को हिंदू धर्म में भक्ति, साधना, तप और आत्म चिंतन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना गया है।

मान्यता है कि देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु राजा बलि के आग्रह पर पाताल लोक में चार महीने के लिए विश्राम करने जाते हैं। इसके बाद कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागते हैं। इसी के साथ चातुर्मास का समापन होता है और दोबारा सभी शुभ एवं मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है।

चातुर्मास का अर्थ है चार महीने का समय। हिंदू पंचांग के अनुसार इसमें मुख्य रूप से श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक महीने शामिल होते हैं। इस दौरान धार्मिक गतिविधियों, पूजा-पाठ, व्रत और दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। साधु-संत भी इस अवधि में भ्रमण रोककर एक ही स्थान पर रहकर साधना और धार्मिक प्रवचन करते हैं।

इन कार्यों पर लग जाती है रोक

चातुर्मास के दौरान विवाह जैसे मांगलिक कार्यों को नहीं किया जाता है। इसके अलावा गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार, जनेऊ संस्कार और नए व्यापार या नए कार्य की शुरुआत जैसे शुभ कार्य भी रोक दिए जाते हैं। मान्यता है कि भगवान विष्णु के योगनिद्रा में रहने के कारण इस समय किए गए मांगलिक कार्यों का शुभ फल नहीं मिलता।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान लोग अपने जीवन में संयम और सात्विकता अपनाते हैं। कई श्रद्धालु चार महीने तक विशेष नियमों का पालन करते हैं। कुछ लोग एक समय भोजन करने, जमीन पर सोने या किसी विशेष वस्तु का त्याग करने का संकल्प लेते हैं।

देवशयनी एकादशी पर विशेष पूजा का महत्व

देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है। श्रद्धालु सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और व्रत का संकल्प लेते हैं। भगवान विष्णु को पीले वस्त्र, पीले फूल, तुलसी दल, चंदन, धूप और दीप अर्पित किए जाते हैं।

पूजा के दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करना और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना शुभ माना जाता है। शाम के समय तुलसी के पौधे के सामने दीप जलाने की परंपरा भी है। इस दिन जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना और पीली वस्तुओं का दान करना भी पुण्यदायी माना जाता है।

खान-पान में भी रखे जाते हैं नियम

चातुर्मास के दौरान खान-पान को लेकर भी कई धार्मिक नियम बताए गए हैं। इस समय सात्विक भोजन करने की परंपरा है। कई लोग तामसिक भोजन, प्याज-लहसुन और कुछ विशेष खाद्य पदार्थों का त्याग करते हैं।

मान्यता के साथ-साथ इसका वैज्ञानिक कारण भी बताया जाता है। चातुर्मास का समय बारिश का मौसम होता है, जिसमें पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए हल्का और सात्विक भोजन करने की सलाह दी जाती है।

देवउठनी एकादशी पर खत्म होगा चातुर्मास

वर्ष 2026 में चातुर्मास का समापन 20 नवंबर को देवउठनी एकादशी के दिन होगा। इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागेंगे। इसके बाद तुलसी विवाह की परंपरा निभाई जाएगी और विवाह सहित अन्य मांगलिक कार्य दोबारा शुरू हो जाएंगे।

धार्मिक दृष्टि से चातुर्मास केवल नियमों और प्रतिबंधों का समय नहीं है, बल्कि यह आत्म सुधार, आध्यात्मिक उन्नति और ईश्वर भक्ति का अवसर माना जाता है। इस दौरान किए गए जप, तप, ध्यान और दान का विशेष फल मिलने की मान्यता है।

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