उत्तर प्रदेश

ताजमहल के सफेद संगमरमर पर भूरे दाग, कीड़ों ने फिर बिगाड़ी खूबसूरती

nidhi
17 Oct 2026 7:51 AM IST
ताजमहल के सफेद संगमरमर पर भूरे दाग, कीड़ों ने फिर बिगाड़ी खूबसूरती
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दीवारों और पच्चीकारी पर दिखे निशान
आगरा: अपनी सफेद संगमरमरी खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध ताजमहल पर एक बार फिर भूरे दाग दिखाई देने लगे हैं। यमुना की ओर स्थित मुख्य मकबरे के कुछ हिस्सों पर गोल्डीकाइरोनोमस कीड़ों द्वारा छोड़ी गई गंदगी के निशान नजर आ रहे हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रसायन शाखा के निदेशक डॉ. एमके भटनागर के अनुसार, इन निशानों से संगमरमर पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ता और इन्हें धुलाई से साफ कराया जाएगा। फिलहाल मामला स्मारक की सतह पर जमा गंदगी और उसकी सुंदरता प्रभावित होने से जुड़ा है।
ताजा जानकारी के मुताबिक, उत्तरी दिशा में मेहराब, दीवारों, जाली और पच्चीकारी वाले हिस्सों पर निशान देखे गए हैं। नदी के इस हिस्से में बहकर आने वाली गंदगी तथा कम जलप्रवाह को कीड़ों के पनपने की अनुकूल परिस्थिति बताया गया है। मार्च-अप्रैल और सितंबर-अक्टूबर में इनकी सक्रियता बढ़ती है। ऐसे में मौसम के इस दौर में स्मारक की नियमित निगरानी और सतह की सफाई का महत्व बढ़ जाता है। सफेद पृष्ठभूमि पर भूरे धब्बे उभरने से बारीक सजावटी काम भी प्रभावित दिखाई देता है।
यह परेशानी पहली बार सामने नहीं आई है। वर्ष 2015 से ताजमहल पर इस प्रकार के कीड़ों और उनसे बनने वाले निशानों की समस्या दर्ज होती रही है। पहले भी संगमरमर और पच्चीकारी पर हरे तथा गहरे रंग के धब्बे दिखाई दिए थे। इसलिए मौजूदा घटनाक्रम को समझने के लिए पुराने अनुभव भी महत्वपूर्ण हैं। बार-बार निशान उभरना बताता है कि सतह साफ करने के साथ उन परिस्थितियों पर ध्यान देना जरूरी है, जिनमें कीड़ों की संख्या बढ़ती है।
नवंबर 2023 में भी यह विषय चर्चा में आया था। उस समय एएसआई ने समस्या के दीर्घकालिक समाधान के लिए अध्ययन शुरू करने की जानकारी दी थी। अध्ययन का उद्देश्य कीड़ों के प्रजनन चक्र, उनके बढ़ने की परिस्थितियों और स्मारक की सतह तक पहुंचने से रोकने के उपाय समझना था। तब अधिकारियों ने बताया था कि तापमान घटने के बावजूद कीड़े मौजूद थे, जबकि पिछले वर्षों में अक्टूबर के अंत तक उनकी सक्रियता कम हो जाती थी। यह जानकारी 2023 की स्थिति से संबंधित है।
पुरानी रिपोर्टों में उत्तरी दीवार के अधिक प्रभावित होने का उल्लेख मिलता है। यह हिस्सा नदी की ओर है। कीड़े पानी के आसपास से छोटी उड़ान भरकर स्मारक तक पहुंचते हैं और सतह पर बैठने के दौरान गंदगी छोड़ते हैं। इससे समस्या का संबंध केवल इमारत के भीतर की साफ-सफाई तक सीमित नहीं रहता। नदी और उसके आसपास के पर्यावरण की स्थिति भी संरक्षण की व्यापक तस्वीर का हिस्सा बनती है। हालांकि, अलग-अलग वर्षों में कीड़ों की संख्या और सक्रियता एक जैसी हो, यह मानना उचित नहीं होगा।
सफाई के तरीके में भी सावधानी आवश्यक है। वर्ष 2019 में सामने आई जानकारी के अनुसार, एएसआई ने निशान हटाने के लिए आसुत जल का इस्तेमाल किया था। उस समय अधिकारियों ने लगातार रगड़कर सफाई करने से संगमरमर की चमक प्रभावित होने की आशंका भी बताई थी। इस पुराने अनुभव से समझ आता है कि ऐतिहासिक इमारत की सतह की सफाई सामान्य भवन जैसी नहीं होती। उद्देश्य गंदगी हटाना होता है, साथ ही मूल सतह और सजावटी काम को सुरक्षित रखना भी जरूरी होता है।
यहां दो बातों में अंतर समझना जरूरी है। सतह पर दिखाई देने वाले धब्बे और पत्थर को स्थायी नुकसान पहुंचना अलग स्थितियां हैं। मौजूदा मामले में रसायन शाखा ने संगमरमर पर दुष्प्रभाव नहीं होने की बात कही है। इसलिए भूरे निशानों के आधार पर ताजमहल की संरचना कमजोर होने या संगमरमर खराब हो जाने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। वहीं, बार-बार सफाई की जरूरत संरक्षण व्यवस्था के लिए अतिरिक्त जिम्मेदारी जरूर पैदा करती है।
समस्या का स्थायी समाधान खोजने में नदी की स्थिति महत्वपूर्ण बनी हुई है। वर्ष 2019 में भी एएसआई के तत्कालीन अधिकारी ने यमुना की सफाई को दीर्घकालिक उपाय बताया था। प्रदूषित जल में कीड़ों के पनपने की परिस्थिति बनी रहने पर धब्बे हटाने के बाद दोबारा उभर सकते हैं। इसीलिए स्मारक की नियमित देखभाल और आसपास के पर्यावरण में सुधार को साथ देखने की जरूरत है। ताजमहल की सुंदरता बनाए रखने की चुनौती उसके परिसर से आगे नदी तक फैली हुई दिखाई देती है।
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