उत्तर प्रदेश

बेलहट वन भूमि प्रकरण पहुंचा शासन तक

Kavita2
21 Sept 2026 3:17 PM IST
बेलहट वन भूमि प्रकरण पहुंचा शासन तक
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प्रयागराज। यमुनापार क्षेत्र के कोरांव तहसील अंतर्गत बेलहट गांव में वन भूमि से जुड़े एक पुराने मामले ने अब शासन स्तर पर दस्तक दी है। गांव में करीब 468 बीघे वन भूमि के रिकॉर्ड से गायब होने के मामले में तहसील स्तर पर कार्रवाई नहीं होने के बाद राजस्व परिषद ने इसे गंभीरता से लिया है।

राजस्व परिषद के आयुक्त एवं सचिव ने मामले का संज्ञान लेते हुए जिलाधिकारी को तत्काल प्रकरण का निस्तारण कराने के निर्देश दिए हैं। इसके बाद अब प्रशासनिक स्तर पर इस मामले की जांच और रिकॉर्ड की समीक्षा की तैयारी शुरू हो गई है।

चकबंदी के बाद बदला भूमि रिकॉर्ड

जानकारी के अनुसार, बेलहट गांव में वन विभाग की करीब 2044 बीघे भूमि दर्ज है। बताया जा रहा है कि कई दशक पहले गांव में चकबंदी प्रक्रिया हुई थी। चकबंदी से पहले तक यह जमीन वन विभाग के नाम पर राजस्व अभिलेखों में दर्ज थी।

लेकिन चकबंदी प्रक्रिया पूरी होने के बाद करीब 472 बीघे जमीन से वन विभाग का नाम हट गया। इसके बाद यह जमीन किसके नाम दर्ज कर दी गई, इसका स्पष्ट रिकॉर्ड सामने नहीं आ पाया है।

मामला सामने आने के बाद सवाल उठने लगे कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में वन भूमि किसके खाते में चली गई और राजस्व अभिलेखों में इसका बदलाव किस आधार पर किया गया।

तहसील स्तर पर दबा रहा मामला

बताया जा रहा है कि वन भूमि गायब होने से जुड़ी फाइल लंबे समय तक तहसील स्तर पर लंबित रही। आरोप है कि मामले को गंभीरता से आगे नहीं बढ़ाया गया और रिकॉर्ड की जांच प्रक्रिया पूरी नहीं की गई।

अब जब यह मामला शासन स्तर तक पहुंचा है तो राजस्व परिषद ने अधिकारियों से पूरे मामले की जानकारी मांगी है।

रिकॉर्ड की होगी जांच

प्रशासन अब पुराने राजस्व रिकॉर्ड, चकबंदी अभिलेख और वर्तमान खतौनी समेत अन्य दस्तावेजों की जांच करेगा। यह पता लगाया जाएगा कि चकबंदी के दौरान भूमि रिकॉर्ड में किस तरह का बदलाव हुआ और इसके पीछे कौन-कौन अधिकारी या व्यक्ति जिम्मेदार रहे।

जांच के दौरान यह भी देखा जाएगा कि जमीन किसी व्यक्ति, संस्था या अन्य खाते में दर्ज की गई है या नहीं।

वन विभाग की जमीन को लेकर उठे सवाल

वन भूमि सरकारी संपत्ति मानी जाती है और इसके रिकॉर्ड में किसी भी तरह का बदलाव नियमों के तहत ही किया जा सकता है। ऐसे में 472 बीघे जमीन से वन विभाग का नाम हटना प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।

पर्यावरण और वन संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि वन भूमि के रिकॉर्ड सुरक्षित रहना जरूरी है, क्योंकि ऐसी जमीनों का संबंध पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों से होता है।

डीएम को दिए गए निर्देश

राजस्व परिषद के आयुक्त एवं सचिव ने जिलाधिकारी को निर्देश दिया है कि मामले का जल्द निस्तारण किया जाए। इसके तहत संबंधित विभागों से जानकारी लेकर पूरी रिपोर्ट तैयार करने को कहा गया है।

जिलाधिकारी स्तर से अब तहसील प्रशासन और राजस्व अधिकारियों को जांच प्रक्रिया तेज करने के निर्देश दिए जा सकते हैं।

वर्षों पुराने मामले में अब होगी कार्रवाई

बेलहट की वन भूमि से जुड़ा यह मामला कई वर्षों पुराना बताया जा रहा है। अब शासन स्तर से संज्ञान लिए जाने के बाद उम्मीद है कि रिकॉर्ड की वास्तविक स्थिति सामने आएगी।

यदि जांच में रिकॉर्ड में अनियमितता या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

फिलहाल प्रशासन का ध्यान इस बात पर है कि गायब हुई वन भूमि का वास्तविक रिकॉर्ड सामने लाया जाए और यह पता लगाया जाए कि भूमि किसके नाम दर्ज हुई।

मामले की जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि वन विभाग की जमीन रिकॉर्ड से कैसे हट गई और इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं।

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