उत्तर प्रदेश

नीरज चौहान की कामयाबी के पीछे पिता का संघर्ष, कुक की नौकरी से ढाबे तक का सफर

Kavita2
5 Oct 2026 1:21 PM IST
नीरज चौहान की कामयाबी के पीछे पिता का संघर्ष, कुक की नौकरी से ढाबे तक का सफर
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मेरठ। जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीतकर मेरठ के तीरंदाज नीरज चौहान ने देश और शहर का नाम रोशन किया है। नीरज की इस उपलब्धि के पीछे जितनी मेहनत उनकी अपनी है, उतना ही बड़ा योगदान उनके परिवार के संघर्ष का भी रहा है। आर्थिक परेशानियों के बावजूद नीरज ने तीरंदाजी को अपना लक्ष्य बनाया और उनके पिता अच्छेलाल चौहान ने बेटे के सपने को पूरा करने के लिए अपनी पूरी जिंदगी की दिशा ही बदल दी।

घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। परिवार के सीमित साधनों के बीच नीरज चौहान के सामने खिलाड़ी बनने का सपना था। ऐसे में पिता ने बेटे की प्रतिभा को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव कोशिश की। उन्होंने सबसे पहले कैलाश प्रकाश स्टेडियम की रसोई में कुक की नौकरी की। इस नौकरी से मिलने वाली आय से परिवार की जरूरतें पूरी करना मुश्किल था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

बेटे के सपने के लिए पिता ने किया संघर्ष

पीडब्ल्यूडी कॉलोनी निवासी अच्छेलाल चौहान बताते हैं कि वह कैलाश प्रकाश स्टेडियम में कुक के तौर पर काम करते थे। उनकी कोशिश थी कि परिवार की आर्थिक स्थिति चाहे जैसी भी हो, लेकिन उनके बेटों को खेल के लिए बेहतर माहौल मिले।

अच्छेलाल के मुताबिक, उस समय उनके दोनों बेटे नीरज चौहान और सुनील चौहान कभी-कभी उनके साथ स्टेडियम पहुंच जाते थे। स्टेडियम का माहौल और वहां होने वाली खेल गतिविधियों से दोनों बच्चों का जुड़ाव बढ़ता गया। बाद में दोनों ने बॉक्सिंग खेलना शुरू कर दिया।

नीरज ने खेल के क्षेत्र में अपना रास्ता आगे बढ़ाया, जबकि उनके भाई सुनील चौहान भी बॉक्सिंग में सक्रिय रहे। परिवार के लिए यह सिर्फ खेल नहीं था, बल्कि बेहतर भविष्य की उम्मीद भी थी।

कुक की नौकरी से नहीं चला काम

अच्छेलाल चौहान के सामने सबसे बड़ी चुनौती परिवार का खर्च और बच्चों के खेल प्रशिक्षण को संभालना था। स्टेडियम की रसोई में कुक की नौकरी से मिलने वाले वेतन से परिवार की जरूरतें और बेटों की खेल संबंधी आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पा रही थीं।

इसके बाद उन्होंने नौकरी के साथ एक और रास्ता चुना। उन्होंने ढाबा चलाना शुरू किया। इस फैसले का मकसद अतिरिक्त आय जुटाना था, ताकि दोनों बेटों के खेल को आगे बढ़ाया जा सके। पिता के संघर्ष का यही दौर परिवार के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।

अच्छेलाल ने अपने दोनों बेटों को खिलाड़ी बनाने के लिए आर्थिक कठिनाइयों के बीच लगातार मेहनत की। एक तरफ वह ढाबा चलाते रहे, दूसरी तरफ बच्चों के खेल से जुड़े सपनों को पूरा करने के लिए संसाधन जुटाते रहे।

दोनों बेटे खेल की राह पर आगे बढ़े

परिवार में खेल का माहौल धीरे-धीरे मजबूत होता गया। नीरज और उनके भाई सुनील दोनों बॉक्सिंग से जुड़े, हालांकि आगे चलकर नीरज ने तीरंदाजी में अपनी पहचान बनाई। सुनील अभी भी बॉक्सिंग खेलते हैं और कई बार नेशनल स्तर की प्रतियोगिताओं में पदक जीतकर परिवार का नाम रोशन कर चुके हैं।

अच्छेलाल चौहान के लिए यह सफर किसी आसान रास्ते की तरह नहीं था। सीमित आमदनी के बावजूद उन्होंने दोनों बेटों को खेल के लिए प्रोत्साहित किया। आज जब नीरज चौहान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कांस्य पदक जीता है, तो उनके पिता की वर्षों पुरानी मेहनत का परिणाम भी सामने दिखाई दे रहा है।

स्टेडियम से शुरू हुआ खेल का जुड़ाव

नीरज और सुनील के लिए कैलाश प्रकाश स्टेडियम केवल उनके पिता की नौकरी की जगह नहीं था। यही वह स्थान था, जहां दोनों ने खेल के वातावरण को करीब से देखा और धीरे-धीरे खेलों की ओर बढ़े।

अच्छेलाल बताते हैं कि वह जब स्टेडियम में कुक की नौकरी करते थे, तब उनके दोनों बेटे कई बार उनके साथ वहां आते थे। बच्चों का स्टेडियम आना और खेल गतिविधियों को देखना आगे चलकर उनके लिए एक अलग दुनिया का दरवाजा खोलने जैसा रहा।

यहीं से दोनों भाइयों का खेलों से जुड़ाव बढ़ा और उन्होंने बॉक्सिंग शुरू की। बाद में नीरज ने तीरंदाजी को अपना क्षेत्र बनाया और लगातार मेहनत के जरिए अपने खेल को आगे बढ़ाया।

नीरज की उपलब्धि से परिवार में खुशी

जापान के आइची-नागोया में हुए एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीतना नीरज चौहान के करियर की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस सफलता के बाद मेरठ के उनके परिवार और परिचितों में खुशी का माहौल है।

नीरज की कामयाबी को सिर्फ एक पदक के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि यह उस संघर्ष की कहानी भी है जिसमें एक पिता ने अपने बच्चों के सपनों के लिए आर्थिक मुश्किलों के बीच रास्ता बनाया। कुक की नौकरी से शुरुआत करने के बाद ढाबा चलाने का फैसला और दोनों बेटों को खिलाड़ी बनाने की कोशिश ने परिवार को खेल की दुनिया से जोड़े रखा।

पिता की मेहनत बनी बेटे की ताकत

अच्छेलाल चौहान की कहानी इस बात को सामने लाती है कि किसी खिलाड़ी की सफलता के पीछे केवल मैदान में की गई मेहनत नहीं होती। कई बार परिवार का संघर्ष, आर्थिक मुश्किलों के बावजूद मिला साथ और माता-पिता का भरोसा भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

नीरज चौहान ने अपनी मेहनत से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई, लेकिन इस सफर की नींव उनके पिता ने रखी। सीमित साधनों के बावजूद उन्होंने बेटे के सपने को रोकने के बजाय उसे पूरा करने का रास्ता खोजा।

कैलाश प्रकाश स्टेडियम की रसोई से शुरू हुआ यह सफर ढाबे तक पहुंचा और फिर उसी संघर्ष ने दो बेटों को खेल की दुनिया में आगे बढ़ाया। सुनील ने बॉक्सिंग में राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीते, जबकि नीरज ने तीरंदाजी में एशियन गेम्स का कांस्य पदक हासिल किया।

नीरज चौहान की यह उपलब्धि मेरठ के लिए गर्व का विषय है, लेकिन इसके पीछे उनके पिता अच्छेलाल चौहान का संघर्ष भी उतनी ही बड़ी कहानी है। आर्थिक परेशानियों के बावजूद उन्होंने बेटों के सपनों को टूटने नहीं दिया। यही मेहनत आज नीरज की अंतरराष्ट्रीय सफलता के रूप में सामने आई है।

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