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गुणवत्ता जांच में फेल हुई सरकारी अस्पतालों की एंटीबायोटिक दवा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में मरीजों के उपचार के लिए खरीदी गई एक महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक दवा गुणवत्ता जांच में फेल हो गई है। मामले का संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाईज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (यूपीएमएससीएल) ने दवा की आपूर्ति करने वाली हिमाचल प्रदेश स्थित कंपनी एथेंस लाइफ साइंस के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए उसे तीन वर्ष के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया है। यह कदम सरकारी अस्पतालों में गुणवत्तापूर्ण दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने और मरीजों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।
जानकारी के अनुसार, निमोनिया और विभिन्न प्रकार के बैक्टीरियल संक्रमणों के उपचार में व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली अमोक्सिसिलिन एवं पोटेशियम क्लैवुलानेट ओरल सस्पेंशन आईपी 200 मिलीग्राम की दो अलग-अलग बैच गुणवत्ता परीक्षण में निर्धारित मानकों पर खरी नहीं उतरीं। नियमित गुणवत्ता नियंत्रण प्रक्रिया के तहत दवा के नमूने जांच के लिए भेजे गए थे, जहां परीक्षण में इन बैचों को मानक के अनुरूप नहीं पाया गया।
दवा की गुणवत्ता में कमी सामने आने के बाद यूपीएमएससीएल ने तत्काल कार्रवाई करते हुए संबंधित कंपनी को कारण बताओ नोटिस जारी किया। उपलब्ध रिपोर्टों और तकनीकी परीक्षण के आधार पर कंपनी का पक्ष सुनने के बाद निगम ने उसे तीन वर्षों के लिए ब्लैकलिस्ट करने का निर्णय लिया। इस अवधि के दौरान कंपनी उत्तर प्रदेश सरकार की किसी भी दवा खरीद प्रक्रिया में भाग नहीं ले सकेगी।
अमोक्सिसिलिन एवं पोटेशियम क्लैवुलानेट एक व्यापक प्रभाव वाली एंटीबायोटिक दवा है, जिसका उपयोग विशेष रूप से बच्चों और वयस्कों में निमोनिया, श्वसन तंत्र के संक्रमण, कान, गले और अन्य बैक्टीरियल संक्रमणों के इलाज में किया जाता है। सरकारी अस्पतालों में यह दवा बड़ी मात्रा में मरीजों को उपलब्ध कराई जाती है। ऐसे में गुणवत्ता में कमी पाए जाने का मामला स्वास्थ्य विभाग के लिए गंभीर माना जा रहा है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि घटिया गुणवत्ता वाली दवाएं मरीजों के उपचार की प्रभावशीलता को प्रभावित कर सकती हैं। यदि दवा निर्धारित गुणवत्ता की नहीं हो, तो संक्रमण पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो पाता, उपचार की अवधि बढ़ सकती है और एंटीबायोटिक प्रतिरोध (एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस) जैसी गंभीर समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं। इसी कारण सरकारी खरीद में दवाओं की नियमित लैब जांच और गुणवत्ता परीक्षण को अनिवार्य बनाया गया है।
उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाईज कॉर्पोरेशन लिमिटेड राज्य के सरकारी अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और अन्य चिकित्सा संस्थानों के लिए दवाओं एवं चिकित्सा उपकरणों की खरीद और आपूर्ति का कार्य करता है। निगम द्वारा खरीदी गई प्रत्येक दवा की निर्धारित प्रक्रिया के तहत गुणवत्ता जांच कराई जाती है। जांच में मानक से कम गुणवत्ता मिलने पर संबंधित आपूर्तिकर्ता के खिलाफ अनुबंध की शर्तों के अनुसार कार्रवाई की जाती है।
सूत्रों के अनुसार, संबंधित दवा के जिन बैचों में गुणवत्ता संबंधी खामियां मिली हैं, उन्हें सरकारी अस्पतालों में उपयोग से रोकने और आवश्यकतानुसार वापस लेने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है, ताकि मरीजों तक घटिया गुणवत्ता की दवा न पहुंचे। साथ ही अस्पतालों को आवश्यकतानुसार वैकल्पिक बैच या अन्य स्वीकृत कंपनियों की दवा उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है, जिससे उपचार सेवाएं प्रभावित न हों।
विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में दवाओं की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। सरकारी अस्पतालों में आने वाले अधिकांश मरीज आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से होते हैं और वे पूरी तरह सरकारी दवाओं पर निर्भर रहते हैं। इसलिए गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली का प्रभावी ढंग से लागू होना बेहद आवश्यक है।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में भी दवा आपूर्ति करने वाली कंपनियों की गुणवत्ता पर लगातार निगरानी रखी जाएगी। यदि किसी भी कंपनी की दवा निर्धारित मानकों पर खरी नहीं उतरती है, तो उसके खिलाफ अनुबंध की शर्तों के अनुरूप कठोर कार्रवाई की जाएगी। विभाग का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी अस्पतालों में केवल सुरक्षित, प्रभावी और मानक गुणवत्ता वाली दवाएं ही मरीजों को उपलब्ध कराई जाएं।
एथेंस लाइफ साइंस को तीन वर्ष के लिए ब्लैकलिस्ट किए जाने की कार्रवाई यह स्पष्ट संदेश देती है कि राज्य सरकार और यूपीएमएससीएल दवाओं की गुणवत्ता को लेकर किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं करेंगे। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की सख्त कार्रवाई से अन्य दवा कंपनियां भी गुणवत्ता मानकों का अधिक गंभीरता से पालन करेंगी और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में मरीजों का भरोसा मजबूत होगा।
यह मामला एक बार फिर दवा खरीद प्रक्रिया में गुणवत्ता परीक्षण की अहमियत को रेखांकित करता है। समय पर हुई जांच और त्वरित कार्रवाई से संभावित जोखिम को कम करने में मदद मिली है। अब स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों को निर्बाध रूप से उच्च गुणवत्ता वाली दवाएं उपलब्ध होती रहें और उपचार सेवाओं पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।





