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उत्तर प्रदेश
सस्ती खेती का गजब मंत्र! इस तकनीक से किसान ने बचाए हजारों रुपये, फसल भी लहलहाई
nidhi
21 July 2026 7:13 AM IST

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यूरिया पर खर्च लगभग खत्म! किसान के 'संजीवनी मंत्र' ने बढ़ाई मिट्टी की ताकत और पैदावार
UTTAR-PRADESH: मुरादाबाद जिले के एक प्रगतिशील किसान ने खेती में ऐसा मॉडल अपनाया है, जिसने न केवल उनकी लागत कम की बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ा दी। किसान का दावा है कि पिछले करीब 15 वर्षों से उन्हें यूरिया की जरूरत बेहद कम पड़ती है, क्योंकि उन्होंने खेत की सेहत सुधारने के लिए प्राकृतिक और जैविक तरीकों को अपनाया है। उनकी इस तकनीक को आसपास के किसान भी अपनाने लगे हैं और बेहतर उत्पादन के साथ कम लागत का लाभ उठा रहे हैं।
आज जब रासायनिक उर्वरकों की बढ़ती कीमतें किसानों की चिंता बढ़ा रही हैं, तब यह तरीका खेती को अधिक टिकाऊ और लाभदायक बनाने का उदाहरण बनकर सामने आया है।
क्या है किसान का 'संजीवनी मंत्र'?
किसान का सबसे बड़ा मंत्र है जीवामृत, गोबर की सड़ी हुई खाद, फसल अवशेषों का उपयोग, हरी खाद और जैविक सूक्ष्मजीवों का संतुलित प्रयोग। इन उपायों से मिट्टी में जैविक कार्बन और लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है, जिससे पौधों को प्राकृतिक रूप से पोषण मिलने लगता है।
किसान बताते हैं कि पहले वे हर सीजन में भारी मात्रा में यूरिया डालते थे, लेकिन धीरे-धीरे जैविक तरीकों को अपनाने के बाद यूरिया की आवश्यकता लगातार कम होती गई।
मिट्टी की सेहत बनी सबसे बड़ी ताकत
विशेषज्ञों के अनुसार लगातार अधिक मात्रा में यूरिया के इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसके विपरीत जैविक खाद और फसल अवशेषों का उपयोग मिट्टी की संरचना, जल धारण क्षमता और पोषक तत्वों की उपलब्धता को बेहतर बनाता है।
मुरादाबाद के किसान ने हर फसल के बाद खेत में पराली जलाने के बजाय उसे मिट्टी में मिलाना शुरू किया। इसके साथ गोबर की खाद और हरी खाद का नियमित उपयोग किया गया। इससे मिट्टी में प्राकृतिक पोषक तत्वों का स्तर बढ़ता गया।
लागत में आई बड़ी कमी
रासायनिक उर्वरकों पर होने वाला खर्च खेती की कुल लागत का बड़ा हिस्सा होता है। किसान का कहना है कि जैविक तरीकों के कारण यूरिया की खरीद लगभग नगण्य हो गई, जिससे हर सीजन में हजारों रुपये की बचत होने लगी।
कम लागत के साथ उत्पादन में भी संतुलन बना रहा, जिससे खेती की लाभप्रदता बढ़ी।
फसल उत्पादन पर क्या पड़ा असर?
किसान के अनुसार शुरुआत के एक-दो वर्षों में बदलाव धीरे-धीरे दिखाई दिया, लेकिन बाद में मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होने से फसलों की बढ़वार, जड़ों का विकास और उत्पादन में सकारात्मक परिणाम मिलने लगे।
विशेषज्ञ भी मानते हैं कि यदि जैविक और रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग किया जाए तो लंबे समय में मिट्टी अधिक उपजाऊ बनी रहती है और फसल की गुणवत्ता में सुधार होता है।
किन फसलों में मिला फायदा?
इस तकनीक का उपयोग गेहूं, धान, गन्ना, दलहन और सब्जियों जैसी कई फसलों में किया गया। किसान का कहना है कि हर फसल की जरूरत के अनुसार पोषण प्रबंधन करने से बेहतर परिणाम मिले।
विशेष रूप से जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ने से मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे सिंचाई की आवश्यकता भी कुछ हद तक कम हो सकती है।
कृषि विशेषज्ञों की सलाह
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि किसानों को बिना मिट्टी की जांच के यूरिया की मात्रा कम या बंद नहीं करनी चाहिए। पहले मिट्टी की जांच करानी चाहिए और उसके आधार पर संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाना चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार—
नियमित मिट्टी परीक्षण कराएं।
गोबर की अच्छी तरह सड़ी हुई खाद का उपयोग करें।
फसल अवशेष न जलाएं।
हरी खाद और जैव उर्वरकों को बढ़ावा दें।
रासायनिक उर्वरकों का संतुलित और आवश्यकता अनुसार प्रयोग करें।
दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा
मुरादाबाद के किसान की यह पहल दिखाती है कि यदि खेती में वैज्ञानिक सोच और प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग किया जाए तो लागत कम करते हुए बेहतर उत्पादन हासिल किया जा सकता है। इससे न केवल किसान की आय बढ़ती है बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी लंबे समय तक बनी रहती है।
सरकार और कृषि विभाग भी प्राकृतिक खेती, जैविक खेती और संतुलित पोषण प्रबंधन को बढ़ावा दे रहे हैं ताकि खेती अधिक टिकाऊ, पर्यावरण-अनुकूल और लाभकारी बन सके।
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