उत्तर प्रदेश

बाल विवाह पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

Ratna Netam
15 Sept 2026 3:49 PM IST
बाल विवाह पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
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प्रयागराज। उत्तर प्रदेश में नाबालिगों की शादी के बाद उसका आधिकारिक रजिस्ट्रेशन तक हो जाने के मामलों पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने साफ कहा है कि विवाह का पंजीकरण करने से पहले दूल्हा और दुल्हन की उम्र की सही तरीके से जांच करना जरूरी है। अगर विवाह के समय दोनों में से कोई भी कानून के मुताबिक निर्धारित न्यूनतम उम्र से कम है तो ऐसे विवाह का रजिस्ट्रेशन नहीं किया जाना चाहिए। हाई कोर्ट ने राज्य के विवाह पंजीकरण अधिकारियों को इस संबंध में सख्त निर्देश दिए हैं।
यह मामला गाजियाबाद में एक नाबालिग लड़की की शादी के रजिस्ट्रेशन से जुड़ी सुनवाई के दौरान सामने आया। जस्टिस तेज प्रताप तिवारी की एकलपीठ ने कहा कि नाबालिगों की शादी के रजिस्ट्रेशन के मामले इक्का-दुक्का नहीं हैं। अदालत के सामने इस तरह के कई मामले आ चुके हैं। हाई कोर्ट ने इसे गंभीर चिंता का विषय बताते हुए व्यवस्था में सुधार की जरूरत पर जोर दिया।
शादी से पहले उम्र की जांच जरूरी
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह पंजीकरण अधिकारी केवल आवेदन में दी गई जानकारी पर भरोसा करके प्रमाणपत्र जारी नहीं कर सकते। उन्हें दूल्हा और दुल्हन दोनों की उम्र विश्वसनीय दस्तावेजों के आधार पर सत्यापित करनी होगी।
बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के तहत विवाह के संदर्भ में **18 साल से कम उम्र की लड़की और 21 साल से कम उम्र के लड़के को 'child' माना जाता है।** अदालत ने इसी कानूनी व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए अधिकारियों को निर्देश दिया कि उम्र की जांच में लापरवाही नहीं होनी चाहिए।
अगर जांच में यह सामने आता है कि विवाह के समय कोई एक पक्ष निर्धारित उम्र से कम था तो विवाह पंजीकरण की सामान्य प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जानी चाहिए।
नाबालिग मिले तो संबंधित अधिकारी को दें सूचना
अदालत ने सिर्फ रजिस्ट्रेशन रोकने तक बात सीमित नहीं रखी। हाई कोर्ट ने कहा कि अगर दस्तावेजों की जांच के दौरान दूल्हा या दुल्हन निर्धारित उम्र से कम पाया जाता है तो मामले की जानकारी संबंधित **बाल विवाह निषेध अधिकारी और जिले के सक्षम अधिकारी** को दी जानी चाहिए, ताकि कानून के मुताबिक आगे कदम उठाए जा सकें।
इस निर्देश का उद्देश्य केवल गलत विवाह प्रमाणपत्र जारी होने से रोकना नहीं, बल्कि बाल विवाह से जुड़े मामलों को संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचाना भी है।
अदालत ने बाल विवाह पंजीकरण पर लगी रोक का सख्ती से पालन करने को कहा है।
POCSO केस की सुनवाई में सामने आया मामला
हाई कोर्ट के सामने यह मुद्दा एक आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान आया। यह अपील दीपक पाल नाम के व्यक्ति की ओर से दाखिल की गई थी। मामला POCSO एक्ट सहित अन्य कानूनी प्रावधानों से जुड़ा है। मथुरा की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश/POCSO विशेष अदालत ने 26 नवंबर 2025 को मामले में फैसला सुनाया था, जिसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की गई।
अपीलकर्ता की तरफ से दलील दी गई कि संबंधित लड़की घटना के समय बालिग थी और उसने अपनी इच्छा से विवाह किया था। अपनी दलील के समर्थन में विवाह का रजिस्ट्रेशन और प्रमाणपत्र भी पेश किया गया।
लेकिन राज्य सरकार की ओर से इस दावे का विरोध किया गया।
सरकार की तरफ से अदालत को बताया गया कि ट्रायल कोर्ट उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर लड़की को नाबालिग मान चुका है। यह भी कहा गया कि कथित तौर पर सही उम्र छिपाकर विवाह का पंजीकरण कराया गया था।
कोर्ट ने रजिस्ट्रार को बुलाकर पूछा सवाल
मामले में विवाह प्रमाणपत्र सामने आने के बाद हाई कोर्ट ने संबंधित विवाह पंजीकरण अधिकारी को तलब किया। अदालत यह जानना चाहती थी कि अगर लड़की नाबालिग थी तो विवाह का रजिस्ट्रेशन आखिर कैसे हो गया।
सुनवाई के दौरान संबंधित अधिकारी की ओर से बताया गया कि उन्होंने पिछले प्रभारी अधिकारी से कार्यभार संभाला था और उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि संबंधित विवाह का पंजीकरण किस तरह हुआ।
इस जवाब पर अदालत ने गंभीर चिंता जाहिर की। कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि विभागीय निर्देशों में पहले से ही विवाह का पंजीकरण करने से पहले वर-वधू की जन्मतिथि की जांच करना आवश्यक है।
ऐसे में उम्र की सही जांच किए बिना प्रमाणपत्र जारी होना व्यवस्था की गंभीर खामी की ओर इशारा करता है।
अकेला मामला नहीं, कई केस आ चुके सामने
हाई कोर्ट की चिंता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि अदालत ने इसे केवल एक विवाह पंजीकरण की गलती नहीं माना।
जस्टिस तेज प्रताप तिवारी ने कहा कि अदालत के सामने ऐसे कई मामले आ चुके हैं, जिनमें नाबालिगों से जुड़े विवाह का पंजीकरण हुआ है। इसी वजह से कोर्ट ने पूरे प्रदेश के विवाह पंजीकरण अधिकारियों के लिए निर्देश जारी किए।
इससे सवाल उठता है कि जब जन्मतिथि और उम्र की जांच पहले से जरूरी है तो नाबालिगों के विवाह प्रमाणपत्र कैसे जारी हो रहे हैं।
अदालत के निर्देश इसी प्रशासनिक कमी को दूर करने की कोशिश के तौर पर देखे जा सकते हैं।
ऑनलाइन सिस्टम में भी बदलाव का निर्देश
हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को तकनीक की मदद लेने की भी सलाह दी है। अदालत ने कहा कि ऑनलाइन विवाह पंजीकरण व्यवस्था में ऐसा तंत्र विकसित किया जाए, जिससे उम्र से संबंधित संदिग्ध आवेदनों को स्वतः चिह्नित किया जा सके।
इस तरह की व्यवस्था बनने से आवेदन के समय दर्ज जन्मतिथि के आधार पर अधिकारी को चेतावनी मिल सकती है कि संबंधित व्यक्ति की उम्र की विशेष रूप से जांच करने की जरूरत है।
हालांकि इस तकनीकी व्यवस्था का अंतिम स्वरूप क्या होगा और इसे कब तक लागू किया जाएगा, इसकी विस्तृत जानकारी सामने आना बाकी है।
बाल विवाह और विवाह रजिस्ट्रेशन में अंतर समझना जरूरी
यहां एक कानूनी बात समझना भी महत्वपूर्ण है। बाल विवाह निषेध अधिनियम का उद्देश्य निर्धारित उम्र से पहले होने वाले विवाहों को रोकना और उनसे जुड़े मामलों में कानूनी संरक्षण तथा कार्रवाई की व्यवस्था करना है।
विवाह का रजिस्ट्रेशन एक प्रशासनिक प्रक्रिया है। किसी नाबालिग से जुड़े विवाह का प्रमाणपत्र जारी हो जाने मात्र से उसकी उम्र बदल नहीं जाती और न ही POCSO जैसे मामलों में वह प्रमाणपत्र अपने आप निर्णायक सबूत बन जाता है।
यही मुद्दा मौजूदा मामले में भी महत्वपूर्ण रहा। अपीलकर्ता की ओर से विवाह प्रमाणपत्र के आधार पर लड़की के बालिग होने की दलील दी गई, जबकि राज्य की तरफ से कहा गया कि ट्रायल कोर्ट के साक्ष्यों में वह नाबालिग पाई गई थी।
अधिकारियों की जवाबदेही पर बड़ा सवाल
हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद अब विवाह पंजीकरण अधिकारियों की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। केवल आवेदन स्वीकार करना और प्रमाणपत्र जारी करना पर्याप्त नहीं होगा। उम्र से जुड़े दस्तावेजों का सत्यापन करना जरूरी होगा।
खासकर ऐसे मामलों में जहां दस्तावेजों में अलग-अलग जन्मतिथि हो, उम्र संदिग्ध दिखाई दे या किसी पक्ष के नाबालिग होने की आशंका हो, अधिकारियों को अधिक सतर्क रहना होगा।
अदालत ने साफ संदेश दिया है कि बाल विवाह के पंजीकरण पर रोक का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए।
बाल विवाह रोकने में मदद कर सकता है नया सिस्टम
अगर ऑनलाइन विवाह पंजीकरण पोर्टल में उम्र की स्वतः जांच या संदिग्ध आवेदन को फ्लैग करने वाली व्यवस्था विकसित होती है तो इससे शुरुआती स्तर पर ही कई मामलों को पकड़ा जा सकता है।
इसके साथ दस्तावेजों का वास्तविक सत्यापन भी जरूरी रहेगा। सिर्फ आवेदन में लिखी जन्मतिथि के आधार पर फैसला करने के बजाय विश्वसनीय प्रमाणों की जांच करनी होगी।
हाई कोर्ट के निर्देशों का असर केवल विवाह प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। नाबालिग का मामला सामने आते ही बाल विवाह निषेध अधिकारी और जिला प्रशासन को सूचना देने से संभावित बाल विवाह को रोकने में भी मदद मिल सकती है।
फिलहाल इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि **नाबालिगों की शादी का रजिस्ट्रेशन गंभीर मामला है और इसे सामान्य प्रशासनिक चूक मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।** अदालत ने प्रदेशभर के संबंधित अधिकारियों को उम्र सत्यापन सुनिश्चित करने और नाबालिग पाए जाने पर मामला सक्षम अधिकारियों तक पहुंचाने का निर्देश दिया है।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि राज्य सरकार ऑनलाइन सिस्टम में अदालत के निर्देशों के अनुरूप क्या बदलाव करती है और जमीनी स्तर पर विवाह पंजीकरण के दौरान उम्र सत्यापन को कितना प्रभावी बनाया जाता है।
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