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- इलाहाबाद HC का फैसला,...

प्रयागराज। पूर्व विधान परिषद सदस्य (MLC) और ग्लोकल यूनिवर्सिटी सहारनपुर के चांसलर हाजी इकबाल उर्फ बाला को इलाहाबाद हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज धोखाधड़ी की एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया है। हालांकि, मामले की जांच को पुलिस और एसटीएफ से हटाकर गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO) को सौंपने का आदेश दिया गया है।
यह आदेश इलाहाबाद हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह और न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ला की खंडपीठ ने हाजी इकबाल की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने कहा कि मामले में समानांतर जांच से बचने और निष्पक्ष जांच के लिए इसे एसएफआईओ को स्थानांतरित करना उचित होगा।
मामला ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-12 स्थित प्लॉट नंबर जीएच-02-डी से जुड़ा हुआ है। यह करीब 12,500 वर्ग मीटर का प्लॉट था, जिसे ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण ने मेसर्स एनचैंट इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड को आवंटित किया था। आरोप है कि शिकायतकर्ता नावेद अहमद ने वर्ष 2013-14 के दौरान प्लॉट के विकास के लिए कंपनी को कुल 6.33 करोड़ रुपये का भुगतान किया था।
शिकायत के अनुसार, रकम लेने के बाद भी प्लॉट पर कोई निर्माण कार्य शुरू नहीं किया गया और कंपनी ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की किस्तों का भुगतान भी नहीं कर सकी। इसके बाद अगस्त 2022 में प्राधिकरण ने करीब 29.30 करोड़ रुपये के बकाये का हवाला देते हुए प्लॉट का आवंटन रद्द कर दिया था।
इसके बाद शिकायतकर्ता नावेद अहमद ने सितंबर 2023 में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। मामले की प्रारंभिक जांच एसटीएफ गौतमबुद्धनगर द्वारा की गई, जिसके आधार पर थाना इकोटेक तृतीय में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।
हाजी इकबाल की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि इस मामले में पहले से ही एसएफआईओ जांच कर रही है और नई एफआईआर उसी मामले से जुड़े तथ्यों पर आधारित है। याचिकाकर्ता के वकीलों ने तर्क दिया कि एक ही मामले में दो अलग-अलग जांच चलना उचित नहीं है।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल ने इन दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि एफआईआर और एसएफआईओ की जांच का दायरा अलग-अलग है। उन्होंने आरोप लगाया कि हाजी इकबाल विदेश से सफेदपोश अपराधियों का गिरोह चला रहे हैं और मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच जरूरी है।
कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि एसएफआईओ की जांच और दर्ज एफआईआर में कई समानताएं हैं। अदालत ने कंपनीज एक्ट 2013 की धारा 212(2) का उल्लेख करते हुए कहा कि जब किसी मामले की जांच एसएफआईओ को सौंप दी जाती है तो अन्य जांच एजेंसियों का अधिकार सीमित हो जाता है।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता नावेद अहमद के नुकसान से जुड़े लेन-देन का विवरण एसएफआईओ की जांच में शामिल नहीं था। इसलिए अदालत ने एसटीएफ को निर्देश दिया कि वह मामले की केस डायरी, बयान, दस्तावेज और जांच से जुड़े सभी रिकॉर्ड एसएफआईओ को सौंप दे।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच को एसएफआईओ को सौंपना हाजी इकबाल की मांग पर नहीं किया गया है, बल्कि हाई कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए न्याय के हित में यह आदेश दिया है। अदालत का उद्देश्य एक ही मामले में अलग-अलग एजेंसियों द्वारा समानांतर और विरोधाभासी जांच को रोकना है।
गौरतलब है कि हाजी इकबाल के खिलाफ पहले से ही एसएफआईओ की जांच चल रही है। यह जांच सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एनजीओ "सेव इंडिया" की याचिका पर शुरू हुई थी। एसएफआईओ ने इस मामले में दिल्ली की द्वारका कोर्ट में शिकायत भी दर्ज कराई है, जिसमें मेसर्स एनचैंट इंफ्रास्ट्रक्चर और मस्तिफ इंडिया जैसी कंपनियों की भूमिका की जांच की गई है।
फिलहाल हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब इस पूरे मामले की जांच एसएफआईओ करेगी। जांच एजेंसी को एसटीएफ से सभी दस्तावेज और रिकॉर्ड मिलने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। मामले में आने वाले दिनों में जांच की दिशा पर सभी की नजरें रहेंगी।





