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उत्तर प्रदेश
5 मौतों के बाद बाघिन ‘मिठ्ठी’ की आजादी खत्म, चिड़ियाघर बना नया ठिकाना
nidhi
4 Oct 2026 8:31 AM IST

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5 मौतों के बाद कानपुर चिड़ियाघर बना नया ठिकाना
पीलीभीत : जंगल में स्वतंत्र रूप से घूमने वाली बाघिन ‘मिठ्ठी’ की जिंदगी अब कानपुर चिड़ियाघर के बाड़े तक सीमित हो गई है। पांच लोगों की मौत से जुड़ी घटनाओं के बाद उसे जंगल से पकड़कर चिड़ियाघर लाया गया। अब उसके दोबारा प्राकृतिक आवास में लौटने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। शांत स्वभाव वाली बताई जा रही इस बाघिन की कहानी इंसान और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष की गंभीर तस्वीर भी पेश करती है।
मिठ्ठी का प्राकृतिक ठिकाना जंगल था, लेकिन इंसानी आबादी और जंगल के बीच घटती दूरी ने परिस्थितियां बदल दीं। वन क्षेत्रों के आसपास बढ़ती मानवीय गतिविधियों के कारण बाघ जैसे बड़े वन्यजीव कई बार आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंच जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में इंसानों और वन्यजीवों के बीच आमना-सामना होने का खतरा बढ़ जाता है।
मिठ्ठी का नाम पांच लोगों की मौत से जुड़ी घटनाओं में सामने आने के बाद वन विभाग के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी। एक तरफ ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी थी, वहीं दूसरी तरफ संरक्षित वन्यजीव को सुरक्षित पकड़ना भी जरूरी था। आखिरकार बाघिन को पकड़कर सुरक्षित स्थान पर भेजने का फैसला लिया गया और उसे कानपुर चिड़ियाघर पहुंचाया गया। चिड़ियाघर में मिठ्ठी के व्यवहार और स्वास्थ्य पर नजर रखी जा रही है। बताया जाता है कि बाड़े में उसका व्यवहार अपेक्षाकृत शांत है। इसके बावजूद इंसानों के साथ संघर्ष के पुराने घटनाक्रम को देखते हुए उसे दोबारा जंगल में छोड़ना जोखिम भरा माना जा सकता है। ऐसे मामलों में वन्यजीव विशेषज्ञों और संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर ही आगे का फैसला किया जाता है।
जंगल में रहने वाले बाघ के लिए प्राकृतिक क्षेत्र काफी बड़ा होता है। वह भोजन, पानी और सुरक्षित स्थान की तलाश में लंबी दूरी तय कर सकता है। इसके मुकाबले चिड़ियाघर का बाड़ा सीमित क्षेत्र होता है। हालांकि यहां भोजन, चिकित्सा और सुरक्षा की नियमित व्यवस्था रहती है, लेकिन प्राकृतिक जंगल जैसी स्वतंत्रता उपलब्ध नहीं होती। मिठ्ठी की कहानी वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास की सुरक्षा से जुड़े सवाल भी उठाती है। जंगलों के आसपास निर्माण, सड़कें, खेती और दूसरी मानवीय गतिविधियां बढ़ने से वन्यजीवों के पारंपरिक रास्ते प्रभावित हो सकते हैं। इसके कारण बाघ, तेंदुए और हाथी जैसे जानवर आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं और संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है।
ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए केवल वन्यजीव को पकड़ना स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। जंगल और आबादी के बीच सुरक्षित दूरी, वन्यजीव गलियारों का संरक्षण, ग्रामीणों को समय पर चेतावनी और वन विभाग की त्वरित प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण है। फिलहाल मिठ्ठी कानपुर चिड़ियाघर में है। कभी जंगल में स्वतंत्र घूमने वाली यह बाघिन अब निगरानी में अपना जीवन बिताएगी। उसकी कहानी यह भी बताती है कि इंसान और वन्यजीव के बीच बढ़ता टकराव आखिरकार दोनों के लिए नुकसान का कारण बन सकता है।
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