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उत्तर प्रदेश
अफगान सीमा पर झड़पों से पाकिस्तान में आतंकी हमलों में तेज़ी: रिपोर्ट
SHIDDHANT
1 Jan 2026 11:06 PM IST

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Islamabad/Kabul इस्लामाबाद/काबुल। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच हालिया सीमा झड़पों का असर पाकिस्तान के भीतर आतंकी गतिविधियों में तेज बढ़ोतरी के रूप में सामने आया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में आत्मघाती हमलों और सुरक्षा बलों पर हमलों की संख्या में उल्लेखनीय इज़ाफा हुआ है। इस्लामाबाद स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज़ के हवाले से बताया गया है कि वर्ष 2025 के पहले 11 महीनों में कम से कम 3,187 लोगों की मौत हुई, जिनमें आम नागरिक और सुरक्षा कर्मी शामिल हैं, जबकि 1,981 लोग घायल हुए। यह आंकड़ा 2024 की तुलना में आतंकी हिंसा से होने वाली मौतों में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्शाता है।
‘यूरोपियन टाइम्स’ में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान के साथ जारी सीमा संघर्ष पाकिस्तान को भारी पड़ रहा है। एक ओर पड़ोसी देश से निपटने के लिए सैन्य खर्च बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर देश के भीतर बढ़ते आतंकी हमलों से निपटने की चुनौती भी सामने है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय ने इस साल पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर बढ़े तनाव के बीच रक्षा खरीद और सेवाओं के लिए नई मांगों को मंज़ूरी दी है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अफगानिस्तान के साथ लंबा चला संघर्ष पाकिस्तान को आर्थिक रूप से कमजोर करता जाएगा।
रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामाबाद ने पाकिस्तान के भीतर हमलों के लिए तालिबान समर्थित संगठनों को ज़िम्मेदार ठहराया है, जबकि काबुल ने इन आरोपों को “गलत सूचना” बताते हुए खारिज किया है। उलटे अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर इस्लामिक स्टेट (आईएस) जैसे आतंकी संगठनों का इस्तेमाल कर अफगानिस्तान की स्थिरता और संप्रभुता को कमजोर करने का आरोप लगाया है। पाकिस्तान का कहना है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी), जिसे पाकिस्तान तालिबान भी कहा जाता है, ने तालिबान के काबुल में सत्ता में लौटने के बाद से पाकिस्तान में हमलों को तेज़ किया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अफगानिस्तान के भीतर पाकिस्तान द्वारा किए गए हालिया हवाई हमले को टीटीपी गतिविधियों पर अंकुश लगाने में इस्लामाबाद की हताशा और असमर्थता के रूप में देखा जा रहा है। इसके जवाब में तालिबान ने सीमा पार भारी गोलीबारी की, जिसमें पाकिस्तान को बड़ा नुकसान हुआ। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, मध्य दिसंबर तक अफगानिस्तान की ओर से हुई गोलीबारी में कम से कम 44 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, जबकि तालिबान सरकार ने अक्टूबर में मृतकों की संख्या 58 बताई थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि भले ही तालिबान की ताकत पाकिस्तान की सशस्त्र सेनाओं के बराबर न हो, लेकिन उसकी गुरिल्ला रणनीति इस्लामाबाद के लिए परेशानी का सबब बन सकती है।
पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक जावेद हुसैन ने चेतावनी देते हुए कहा, “इतिहास से सीख लेते हुए, हमें अफगानिस्तान में लंबे समय तक किसी भी जमीनी सैन्य कार्रवाई की गलती नहीं करनी चाहिए। दक्षिण एशियाई भू-राजनीति के विशेषज्ञ मीर मुस्तफिज़ुर रहमान ने कहा कि यह लंबा चला संघर्ष पाकिस्तान की आर्थिक चुनौतियों को और गहरा कर सकता है। उन्होंने कहा, “पाकिस्तान इस समय बेहद नाज़ुक मोड़ पर खड़ा है। देश की अर्थव्यवस्था आईएमएफ कार्यक्रम के सहारे चल रही है, मुद्रा लगातार गिर रही है और महंगाई आम लोगों की कमर तोड़ रही है। ऐसे में कोई भी लंबा सैन्य टकराव या कम तीव्रता वाला सीमा संघर्ष देश की नाज़ुक आर्थिक सुधार प्रक्रिया को पटरी से उतार सकता है और विकास के लिए ज़रूरी संसाधनों को रक्षा पर खर्च करने के लिए मजबूर कर देगा।”
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